कुछ ज़ादा ही अपनों से घिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो अकेला हूँ और कहता फिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो हर परिंदा घोंसले का खाब नहीं देखता ये सफ़र बिन हम सफ़र के ही सही मुझे चिढ़ होती है , मुझे मत बुलाओ माना तुम लोग मेरे घर के ही सही तुम कहते हो के मैं ये अब कह रहा हूँ पर अकेला रह ना पाऊँगा पर मैं अपने फ़ैसलों पे स्थिर रहा हूँ जानता हूँ किस कुँए में गिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो अकेला हूँ और कहता फिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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मेरे बिस्तर से रोज़ एक इंसान उठता है मेरे बिस्तर पे रोज़ एक लाश सोती है मुझे आता है इंसान से लाश हो जाना ग़म के बादलों का आकाश हो जाना यक़ीन भरे वादों का काश हो जाना टूट जाना और पाश पाश हो जाना वक़्त के हाथों में इक ताश हो जाना दफ्तर के कामों से हताश हो जाना मुझे आता है इंसान से लाश हो जाना मैं ऐसे नशे में सोता हूँ बिछौने पे जैसे पालकी में कोई बच्ची अय्याश सोती है मेरे बिस्तर से रोज़ एक इंसान उठता है मेरे बिस्तर पे रोज़ एक लाश सोती है
Yuvraj Dutt
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आज माँ ने मेरी आँखों पे हथेलिआं रखीं पलकों के नीचे उबल रहे जवालामुखी एक पल में बर्फ हो गए मानो माँ को पता हो मेरी तपती हुई पुतलिओं का राज़ मानो माँ ने मेरी आँखों से कभी पढ़ लिया हो नाम तेरा कई बार लगा के माँ ने मुझे रोते हुए देख लिया है रोने से पहले ही कई बार लगा के माँ ने वो सारी बातें सुन लीं हैं जो तू ने बिछड़ते वक़्त छिपालीं मुझ सेे और तो और कई बार लगता है माँ ने मेरी वो कवितायेँ भी पढ़ी हैं जो अभी लिखनी हैं मैं ने
Yuvraj Dutt
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मैं एक मदारी होता हूँ जब दुनिया आई होती है याद की एक बंदरिआ कंधे पर बैठाई होती है बिखरी बिखरी ज़ुल्फ़ें अक्सर खोया खोया सा लगता हूँ मैं इसीलिए जग जाऊँ भी तो सोया सोया सा लगता हूँ जीवन की लंबी तार पर मन नंगे पाँव चलता है आँखें डूब जाती हैं जब शाम को सूरज ढलता है साँसों की ढ़ोलक पे जब मन कोई नगमा गाता है रूह तांडव करने लगती है रोम रोम चिल्लाता है कौन लौट कर आता है यहाँ हर कोई आगे बढ़ता है पीतल के गहनों पर कोई नीलम थोड़ा जड़ता है इक मैं ही हूँ जो हस्ता हुआ भी रोया रोया सा लगता हूँ मैं इसीलिए जग जाऊँ भी तो सोया सोया सा लगता हूँ
Yuvraj Dutt
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