nazmKuch Alfaaz

मेरे बिस्तर से रोज़ एक इंसान उठता है मेरे बिस्तर पे रोज़ एक लाश सोती है मुझे आता है इंसान से लाश हो जाना ग़म के बादलों का आकाश हो जाना यक़ीन भरे वादों का काश हो जाना टूट जाना और पाश पाश हो जाना वक़्त के हाथों में इक ताश हो जाना दफ्तर के कामों से हताश हो जाना मुझे आता है इंसान से लाश हो जाना मैं ऐसे नशे में सोता हूँ बिछौने पे जैसे पालकी में कोई बच्ची अय्याश सोती है मेरे बिस्तर से रोज़ एक इंसान उठता है मेरे बिस्तर पे रोज़ एक लाश सोती है

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है

Ammar Iqbal

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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कुछ ज़ादा ही अपनों से घिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो अकेला हूँ और कहता फिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो हर परिंदा घोंसले का खाब नहीं देखता ये सफ़र बिन हम सफ़र के ही सही मुझे चिढ़ होती है , मुझे मत बुलाओ माना तुम लोग मेरे घर के ही सही तुम कहते हो के मैं ये अब कह रहा हूँ पर अकेला रह ना पाऊँगा पर मैं अपने फ़ैसलों पे स्थिर रहा हूँ जानता हूँ किस कुँए में गिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो अकेला हूँ और कहता फिर रहा हूँ मुझे अकेला छोड़ दो

Yuvraj Dutt

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आज माँ ने मेरी आँखों पे हथेलिआं रखीं पलकों के नीचे उबल रहे जवालामुखी एक पल में बर्फ हो गए मानो माँ को पता हो मेरी तपती हुई पुतलिओं का राज़ मानो माँ ने मेरी आँखों से कभी पढ़ लिया हो नाम तेरा कई बार लगा के माँ ने मुझे रोते हुए देख लिया है रोने से पहले ही कई बार लगा के माँ ने वो सारी बातें सुन लीं हैं जो तू ने बिछड़ते वक़्त छिपालीं मुझ सेे और तो और कई बार लगता है माँ ने मेरी वो कवितायेँ भी पढ़ी हैं जो अभी लिखनी हैं मैं ने

Yuvraj Dutt

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मैं एक मदारी होता हूँ जब दुनिया आई होती है याद की एक बंदरिआ कंधे पर बैठाई होती है बिखरी बिखरी ज़ुल्फ़ें अक्सर खोया खोया सा लगता हूँ मैं इसीलिए जग जाऊँ भी तो सोया सोया सा लगता हूँ जीवन की लंबी तार पर मन नंगे पाँव चलता है आँखें डूब जाती हैं जब शाम को सूरज ढलता है साँसों की ढ़ोलक पे जब मन कोई नगमा गाता है रूह तांडव करने लगती है रोम रोम चिल्लाता है कौन लौट कर आता है यहाँ हर कोई आगे बढ़ता है पीतल के गहनों पर कोई नीलम थोड़ा जड़ता है इक मैं ही हूँ जो हस्ता हुआ भी रोया रोया सा लगता हूँ मैं इसीलिए जग जाऊँ भी तो सोया सोया सा लगता हूँ

Yuvraj Dutt

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