nazmKuch Alfaaz

मैं जिन को छोड़ आया था शनासाई की बस्ती के वो सारे रास्ते आवाज़ देते हैं नहीं मालूम अब किस वास्ते आवाज़ देते हैं लहू में ख़ाक उड़ती है बदन ख़्वाहिश-ब-ख़्वाहिश ढह रहा है और नफ़स की आमद-ओ-शुद दिल की ना-हमवारियों पर बैन करती है वो सारे ख़्वाब एक इक कर के रुख़्सत हो चुके हैं जिन से आँखें जागती थीं और उम्मीदों के रौज़न शहर-ए-आइंदा में खिलते थे बहुत आहिस्ता आहिस्ता अँधेरा दिल में, आँखों में, लहू में, बहते बहते जम गया है वक़्त जैसे थम गया है

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था और किस की खेंच अच्छी थी? हवा किस की तरफ़ थी, कौन सी पाली की बैरी थी? पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम? उन्हें तो बस बसंत आते ही अपनी अपनी डाँगेँ ले के मैदानों में आना है गली-कूचों में काँटी मारना है पतंगें लूटना है लूट के जौहर दिखाना है पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी?

Iftikhar Arif

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शाख़-ए-ज़ैतून पर कम-सुख़न फ़ाख़्ताओं के इतने बसेरे उजाड़े गए और हवा चुप रही बे-कराँ आसमानों की पिहनाइयाँ बे-नशेमन शिकस्ता परों की तग-ओ-ताज़ पर बैन करती रहीं और हवा चुप रही ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा और हवा चुप रही आरज़ूमंद आँखें बशारत-तलब दिल दु'आओं को उट्ठे हुए हाथ सब बे-समर रह गए और हवा चुप रही और तब हब्स के क़हरमाँ मौसमों के अज़ाब इन ज़मीनों पे भेजे गए और मुनादी करा दी गई जब कभी रंग की ख़ुशबुओं की उड़ानों की आवाज़ की और ख़्वाबों की तौहीन की जाएगी ये अज़ाब इन ज़मीनों पे आते रहेंगे

Iftikhar Arif

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जिस्म के रास्तों से गुज़र कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आया रूह की वहशतों में उलझ कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आया लोग फिर देखते क्यूँँ नहीं हैं लोग फिर सोचते क्यूँँ नहीं हैं लोग फिर बोलते क्यूँँ नहीं हैं

Iftikhar Arif

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बचपन की गलियों में जिन जिन घरों के शीशे मेरी गेंद से टूटे थे उन सब की किर्चें कभी कभी मेरी आँखों में चुभने लगती हैं जलती दोपहरों में मेरे हाथों उजड़े हुए घोंसलों के बेहाल परिंदों की चीख़ें फ़रियादें मेरी बे-घर शामों में कोहराम मचाती रहती हैं चकनाचूर दिनों रेज़ा रेज़ा रातों में सोए हुए सब ख़्वाब जगाती रहती हैं अपने ख़ंजर अपने ही सीने में उतरने लगते हैं ज़िंदा चेहरे जलते बुझते लम्हों की आग़ोश में मरने लगते हैं

Iftikhar Arif

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अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए उसे रोकिए कि पड़ोसियों के घरों में झूले पड़े हुए हैं तो उस से क्या उसे क्या पड़ी कि कबूतरों को बताए कैसे हवाएँ उस की पतंग छीन के ले गईं 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए कहीं यूँँ न हो कि फिर एक बार भरी बहार में ए'तिबार के सारे ज़ख़्म महक उठें कहीं यूँँ न हो कि नए सिरे से हमारे ज़ख़्म महक उठें 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए

Iftikhar Arif

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