शाख़-ए-ज़ैतून पर कम-सुख़न फ़ाख़्ताओं के इतने बसेरे उजाड़े गए और हवा चुप रही बे-कराँ आसमानों की पिहनाइयाँ बे-नशेमन शिकस्ता परों की तग-ओ-ताज़ पर बैन करती रहीं और हवा चुप रही ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा और हवा चुप रही आरज़ूमंद आँखें बशारत-तलब दिल दु'आओं को उट्ठे हुए हाथ सब बे-समर रह गए और हवा चुप रही और तब हब्स के क़हरमाँ मौसमों के अज़ाब इन ज़मीनों पे भेजे गए और मुनादी करा दी गई जब कभी रंग की ख़ुशबुओं की उड़ानों की आवाज़ की और ख़्वाबों की तौहीन की जाएगी ये अज़ाब इन ज़मीनों पे आते रहेंगे
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन पर उस की मदहोश जवानी ने इनायत की है कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रा'नाई के जिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है तुझ पे बरसा है उसी बाम से महताब का नूर जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें तुझ को मालूम है क्यूँँ उम्र गँवा दी हम ने हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़म-ए-उल्फ़त के इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी यास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ'नी सीखे ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन के अश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैं ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है
Faiz Ahmad Faiz
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मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी किसी गेसू किसी आंचल का सहारा भी नहीं रास्ते में कोई धुंदला सा सितारा भी नहीं मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए रौशनी लेने को निकला तो अंधेरे पाए रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
Sahir Ludhianvi
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जब दुख की नदिया में हम ने जीवन की नाव डाली थी था कितना कस-बल बाँहों में लोहू में कितनी लाली थी यूँँ लगता था दो हाथ लगे और नाव पूरम पार लगी ऐसा न हुआ, हर धारे में कुछ अन-देखी मंजधारें थीं कुछ माँझी थे अंजान बहुत कुछ बे-परखी पतवारें थीं अब जो भी चाहो छान करो अब जितने चाहो दोश धरो नदिया तो वही है, नाव वही अब तुम ही कहो क्या करना है अब कैसे पार उतरना है जब अपनी छाती में हम ने इस देस के घाव देखे थे था वेदों पर विश्वाश बहुत और याद बहुत से नुस्ख़े थे यूँँ लगता था बस कुछ दिन में सारी बिपता कट जाएगी और सब घाव भर जाएँगे ऐसा न हुआ कि रोग अपने कुछ इतने ढेर पुराने थे वेद इन की टोह को पा न सके और टोटके सब बे-कार गए अब जो भी चाहो छान करो अब जितने चाहो दोश धरो छाती तो वही है, घाव वही अब तुम ही कहो क्या करना है ये घाव कैसे भरना है
Faiz Ahmad Faiz
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"सफ़र" मन में जिज्ञासा लिए रात भर ना सोया था सफ़र शुरू होने से पहले उस के ख़्यालों में खोया था सुब्ह हुआ उत्सुक्ता का न था कोई ठिकाना श्री गणेश किया सफ़र का मैं ने बस अब मंज़िल को था बस पाना पहुँचा स्टेशन सुबह-सुबह जल्दी से मैं ने टिकट कटाई वहीं कहानी भारतीय रेल की फिर समय से ट्रेन न आईं शुरु हुआ मेरा सफ़र अब वो मंज़िल का रहा, न घर का बीच राह पर चल रहा हूँ हूँ तो केवल अब सफ़र का भारतीय सफ़र में पाया एक अनोखा अहसास कहने को लोग अनजान थे पर लग रहे थे सभी अपने लिए ख़ास सफ़र का अकेलापन मिटाने चला लोगों में मेरा संवाद कहीं मिल रही थी लोगों की बातें कहीं हो रहे थे वाद विवाद और विवादपद माहौल बना पर छड़ो में परिणाम सामने आए बातें थी वृदाजनो की जिन में जीवन के रहस्य समाए यात्रा अब मेरी रोचक हुई सूनापन अब दूर भगा परायो सा लग रहा था जो कल लोगों ने अपनापन का उस में समा बाँधा ख़त्म हुई गंभीर मुद्दे अब हसीं ठहाके लगाए गए हृदयस्पशृक था वो पल जब लोगों के ग़म भगाए गए मंज़िल थी मेरी पास मगर उसे पाने का न अब मन था इतने तजुर्बे संजोए मैं ने उस एक सफ़र में सारा जीवन था मंज़िल को था अब पा चुका सफ़र मेरा कारगार रहा सफ़र ख़ुबसूरत था मंज़िल से मेरी सारा सफ़र यादगार रहा
Aniket
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रात दिन ख़्वाब बुनती हुई ज़िंदगी दिल में नक़्द-ए-इज़ाफ़ी की लौ आँख बार-ए-अमानत से चूर मौज-ए-ख़ूँ बे-नियाज़-ए-मआल दश्त-ए-बे-रंग से दर्द के फूल चुनती हुई ज़िंदगी ख़ौफ़-ए-वामांदगी से ख़जिल आरज़ूओं के आशोब से मुज़्महिल मुँह के बल ख़ाक पर आ पड़ी हर तरफ़ इक भयानक सुकूत कोई नौहा न आँसू न फूल हासिल-ए-जिस्म-ओ-जाँ बे-निशाँ रहगुज़ारों की धूल अजनबी शहर में ख़ाक-बर-सर हुई ज़िंदगी कैसी बे-घर हुई ज़िंदगी
Iftikhar Arif
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पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था और किस की खेंच अच्छी थी? हवा किस की तरफ़ थी, कौन सी पाली की बैरी थी? पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम? उन्हें तो बस बसंत आते ही अपनी अपनी डाँगेँ ले के मैदानों में आना है गली-कूचों में काँटी मारना है पतंगें लूटना है लूट के जौहर दिखाना है पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी?
Iftikhar Arif
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जौहरी को क्या मालूम किस तरह की मिट्टी में कैसे फूल होते हैं किस तरह के फूलों में कैसी बास होती है जौहरी को क्या मालूम जौहरी तो सारी उम्र पत्थरों में रहता है ज़र-गरों में रहता है जौहरी को क्या मालूम ये तो बस वही जाने जिस ने अपनी मिट्टी से अपना एक इक पैमाँ उस्तुवार रक्खा हो जिस ने हर्फ़-ए-पैमाँ का ए'तिबार रक्खा हो जौहरी को क्या मालूम किस तरह की मिट्टी में कैसे फूल होते हैं किस तरह के फूलों में कैसी बास होती है
Iftikhar Arif
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कभी कभी दिल ये सोचता है न जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँँ है हकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना था शजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या था अलीम जाने वो इल्म के कौन से सफ़ीनों का ना-ख़ुदा था मुझे तो बस सिर्फ़ ये ख़बर है वो मेरे मौला की ख़ुशबुओं में रचा-बसा था वो उन के दामान-ए-आतिफ़त में पला बढ़ा था और उस के दिन रात मेरे आक़ा के चश्म ओ अबरू ओ जुम्बिश-ए-लब के मुंतज़िर थे वो रात को दुश्मनों के नर्ग़े में सो रहा था तो उन की ख़ातिर जिदाल में सर से पाँव तक सुर्ख़ हो रहा था तो उन की ख़ातिर सो उस को महबूब जानता हूँ सो उस को मक़्सूद मानता हूँ सआदतें उस के नाम से हैं मोहब्बतें उस के नाम से हैं मोहब्बतों के सभी घरानों की निस्बतें उस के नाम से हैं
Iftikhar Arif
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जिस्म के रास्तों से गुज़र कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आया रूह की वहशतों में उलझ कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आया लोग फिर देखते क्यूँँ नहीं हैं लोग फिर सोचते क्यूँँ नहीं हैं लोग फिर बोलते क्यूँँ नहीं हैं
Iftikhar Arif
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