आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन पर उस की मदहोश जवानी ने इनायत की है कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रा'नाई के जिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएँ जिन में उस के मल्बूस की अफ़्सुर्दा महक बाक़ी है तुझ पे बरसा है उसी बाम से महताब का नूर जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंट ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने तुझ पे उट्ठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें तुझ को मालूम है क्यूँँ उम्र गँवा दी हम ने हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़म-ए-उल्फ़त के इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी यास-ओ-हिरमान के दुख-दर्द के मअ'नी सीखे ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन के अश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैं ना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब बाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त शाह-राहों पे ग़रीबों का लहू बहता है आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है
Related Nazm
मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
107 likes
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
54 likes
तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
81 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
475 likes
More from Faiz Ahmad Faiz
"याद" दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हाथ यूँँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
Faiz Ahmad Faiz
3 likes
दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे ऐ ख़ाक-नशीनो उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तक कुछ हश्र तो उन से उट्ठेगा कुछ दूर तो नाले जाएँगे
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे
Faiz Ahmad Faiz
0 likes
तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हम दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम नीम-तारीक राहों में मारे गए सूलियों पर हमारे लबों से परे तेरे होंटों की लाली लपकती रही तेरी ज़ुल्फ़ों की मस्ती बरसती रही तेरे हाथों की चाँदी दमकती रही जब घुली तेरी राहों में शाम-ए-सितम हम चले आए लाए जहाँ तक क़दम लब पे हर्फ़-ए-ग़ज़ल दिल में क़िंदील-ए-ग़म अपना ग़म था गवाही तिरे हुस्न की देख क़ाएम रहे इस गवाही पे हम हम जो तारीक राहों पे मारे गए ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थी तेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थी किस को शिकवा है गर शौक़ के सिलसिले हिज्र की क़त्ल-गाहों से सब जा मिले क़त्ल-गाहों से चुन कर हमारे अलम और निकलेंगे उश्शाक़ के क़ाफ़िले जिन की राह-ए-तलब से हमारे क़दम मुख़्तसर कर चले दर्द के फ़ासले कर चले जिन की ख़ातिर जहाँगीर हम जाँ गँवा कर तिरी दिलबरी का भरम हम जो तारीक राहों में मारे गए
Faiz Ahmad Faiz
1 likes
शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से ज़ीना ज़ीना उतर रही है रात यूँँ सबा पास से गुज़रती है जैसे कह दी किसी ने प्यार की बात सहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जार सर-निगूँ महव हैं बनाने में दामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगार शाना-ए-बाम पर दमकता है मेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमील ख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूम नूर में घुल गया है अर्श का नील सब्ज़ गोशों में नील-गूँ साए लहलहाते हैं जिस तरह दिल में मौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए दिल से पैहम ख़याल कहता है इतनी शीरीं है ज़िंदगी इस पल ज़ुल्म का ज़हर घोलने वाले कामराँ हो सकेंगे आज न कल जल्वा-गाह-ए-विसाल की शमएँ वो बुझा भी चुके अगर तो क्या चाँद को गुल करें तो हम जानें
Faiz Ahmad Faiz
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Faiz Ahmad Faiz.
Similar Moods
More moods that pair well with Faiz Ahmad Faiz's nazm.







