nazmKuch Alfaaz

शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से ज़ीना ज़ीना उतर रही है रात यूँँ सबा पास से गुज़रती है जैसे कह दी किसी ने प्यार की बात सहन-ए-ज़िंदाँ के बे-वतन अश्जार सर-निगूँ महव हैं बनाने में दामन-ए-आसमाँ पे नक़्श-ओ-निगार शाना-ए-बाम पर दमकता है मेहरबाँ चाँदनी का दस्त-ए-जमील ख़ाक में घुल गई है आब-ए-नुजूम नूर में घुल गया है अर्श का नील सब्ज़ गोशों में नील-गूँ साए लहलहाते हैं जिस तरह दिल में मौज-ए-दर्द-ए-फ़िराक़-ए-यार आए दिल से पैहम ख़याल कहता है इतनी शीरीं है ज़िंदगी इस पल ज़ुल्म का ज़हर घोलने वाले कामराँ हो सकेंगे आज न कल जल्वा-गाह-ए-विसाल की शमएँ वो बुझा भी चुके अगर तो क्या चाँद को गुल करें तो हम जानें

Related Nazm

मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी किसी गेसू किसी आंचल का सहारा भी नहीं रास्ते में कोई धुंदला सा सितारा भी नहीं मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए रौशनी लेने को निकला तो अंधेरे पाए रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

Sahir Ludhianvi

9 likes

ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

37 likes

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

23 likes

"आँखों की ख़ातिर" उस की आँखों की ख़ातिर या उस की आँखों के वास्ते उस से जुदा होना एक गुनाह है मुझे कि हाँ ये भी एक सबब है उस से जुदा या महजूर न होने का कि जब जब ख़याल-ए-फ़िराक़ आता है मेरे ज़ेहन में तो मैं उस की वो आँखें ही तो याद करता हूँ कि क्या होगा जब छोड़ दूँगा उन आँखों को दरमियान-ए-सफ़र क्या वो अफ़सुर्दा आँखें फिर सह पाएँगी ये महजूरी मेरी वो आँखें जिन में एक उम्र तलक खोया रहा हूँ मैं वो आँखें जो मुझे मुझ से ज़्यादा जानती हैं वो आँखें जिन में महफ़ूज़ हैं सारी यादें सारी बातें सारे लम्हें और सब आलम अपने सुख दुख के वो आँखें जो मेरे हर ख़्वाब को अपना ख़्वाब मानती हैं और जिस के ख़ुद के ख़्वाब मा-तहती हुए हैं वो आँखें जो अपने माज़ी में बड़ी परेशान रही हैं वो आँखें जो मुझे एक उम्मीद से देखती हैं अभी और अब इस मौजूदा हाल में एक सुकून तलाशती हैं मुझ में कहीं वो आँखें जो अभी भी सहमी हुई हैं पर एक कशिश लौटी है मेरे आने से वो आँखें जिन से वा'दा कर चुका हूँ मैं कि कभी सबब-ए-गिर्या न बनूँगा और कभी दरमियान-ए-सफ़र न छोड़ूँगा उन्हें

Zaan Farzaan

7 likes

More from Faiz Ahmad Faiz

"याद" दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हाथ यूँँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात

Faiz Ahmad Faiz

3 likes

वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ वो हुस्न जिस की तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ हज़ार फ़ित्ने तह-ए-पा-ए-नाज़ ख़ाक-नशीं हर इक निगाह ख़ुमार-ए-शबाब से रंगीं शबाब जिस से तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसें वक़ार जिस की रफ़ाक़त को शोख़ियाँ तरसें अदा-ए-लग़्ज़िश-ए-पा पर क़यामतें क़ुर्बां बयाज़-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां सियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्ता निकहतों का हुजूम तवील रातों की ख़्वाबीदा राहतों का हुजूम वो आँख जिस के बनाव प ख़ालिक़ इतराए ज़बान-ए-शेर को ता'रीफ़ करते शर्म आए वो होंट फ़ैज़ से जिन के बहार लाला-फ़रोश बहिश्त ओ कौसर ओ तसनीम ओ सलसबील ब-दोश गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे ग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहीं वो हसन जिस का तसव्वुर बशर का काम नहीं किसी ज़माने में इस रह-गुज़र से गुज़रा था ब-सद ग़ुरूर ओ तजम्मुल इधर से गुज़रा था और अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसीं है इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकीं हवा में शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैं फ़ज़ा में नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैं ग़रज़ वो हुस्न अब इस रह का जुज़्व-ए-मंज़र है नियाज़-ए-इश्क़ को इक सज्दा-गह मुयस्सर है

Faiz Ahmad Faiz

0 likes

सच है हमीं को आप के शिकवे बजा न थे बे-शक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे हाँ जो जफ़ा भी आप ने की क़ाएदे से की हाँ हम ही कारबंद-ए-उसूल-ए-वफ़ा न थे आए तो यूँँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबाँ भूले तो यूँँ कि जैसे कभी आश्ना न थे क्यूँँ दाद-ए-ग़म हमीं ने तलब की बुरा किया हम से जहाँ में कुश्ता-ए-ग़म और क्या न थे गर फ़िक्र-ए-ज़ख्म की तो ख़ता-वार हैं कि हम क्यूँँ महव-ए-मद्ह-ए-खूबी-ए-तेग़-ए-अदा न थे हर चारा-गर को चारागरी से गुरेज़ था वर्ना हमें जो दुख थे बहुत ला-दवा न थे लब पर है तल्ख़ी-ए-मय-ए-अय्याम वर्ना 'फ़ैज़' हम तल्ख़ी-ए-कलाम पे माइल ज़रा न थे

Faiz Ahmad Faiz

0 likes

1 दूर जा कर क़रीब हो जितने हम से कब तुम क़रीब थे इतने अब न आओगे तुम न जाओगे वस्ल-ए-हिज्राँ बहम हुए कितने 2 चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का गर्मी-ए-रश्क से हर अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ तज़्किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का सहन-ए-गुलशन में कभी ऐ शह-ए-शमशाद-क़दाँ फिर नज़र आए सलीक़ा तिरी रा'नाई का एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ कोई वा'दा कोई इक़रार मसीहाई का साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का 3 कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो अपने बस की बात ही क्या है हम से क्या मनवाओगे किस ने वस्ल का सूरज देखा किस पर हिज्र की रात ढली गेसुओं वाले कौन थे क्या थे उन को क्या जतलाओगे 'फ़ैज़' दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी तुम इस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर कितने दिन इतराओगे

Faiz Ahmad Faiz

1 likes

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

Faiz Ahmad Faiz

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Faiz Ahmad Faiz.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Faiz Ahmad Faiz's nazm.