"सफ़र" मन में जिज्ञासा लिए रात भर ना सोया था सफ़र शुरू होने से पहले उस के ख़्यालों में खोया था सुब्ह हुआ उत्सुक्ता का न था कोई ठिकाना श्री गणेश किया सफ़र का मैं ने बस अब मंज़िल को था बस पाना पहुँचा स्टेशन सुबह-सुबह जल्दी से मैं ने टिकट कटाई वहीं कहानी भारतीय रेल की फिर समय से ट्रेन न आईं शुरु हुआ मेरा सफ़र अब वो मंज़िल का रहा, न घर का बीच राह पर चल रहा हूँ हूँ तो केवल अब सफ़र का भारतीय सफ़र में पाया एक अनोखा अहसास कहने को लोग अनजान थे पर लग रहे थे सभी अपने लिए ख़ास सफ़र का अकेलापन मिटाने चला लोगों में मेरा संवाद कहीं मिल रही थी लोगों की बातें कहीं हो रहे थे वाद विवाद और विवादपद माहौल बना पर छड़ो में परिणाम सामने आए बातें थी वृदाजनो की जिन में जीवन के रहस्य समाए यात्रा अब मेरी रोचक हुई सूनापन अब दूर भगा परायो सा लग रहा था जो कल लोगों ने अपनापन का उस में समा बाँधा ख़त्म हुई गंभीर मुद्दे अब हसीं ठहाके लगाए गए हृदयस्पशृक था वो पल जब लोगों के ग़म भगाए गए मंज़िल थी मेरी पास मगर उसे पाने का न अब मन था इतने तजुर्बे संजोए मैं ने उस एक सफ़र में सारा जीवन था मंज़िल को था अब पा चुका सफ़र मेरा कारगार रहा सफ़र ख़ुबसूरत था मंज़िल से मेरी सारा सफ़र यादगार रहा
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"नशेड़ी" दो घूँट में चढ़ जाए जो, वैसा ये कोई जाम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं कोई योद्धा जंग लड़ रहा, किसी के लिए ये खेती है एक कश मार के देख इस की, जो पूरी ज़िन्दगी बदल देती है दिन का तपता सूरज है ये, ख़ुशियों में मचलती शाम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं हिम्मत की यहाँ सलामी देते, हौसले की होती सौगात है पूर्णिमा का कोई चाँद नहीं ये, अमावस की काली रात है न कर कोई तीरथ बंदे, इस सेे पवित्र कोई धाम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं लत की चाह लिऐ सर पे, कई काफ़िर परेशान घूम रहे सँभाल ली जिन्होंने कश्ती अपनी, वो आज आसमान चूम रहे शूरवीर ही टिक पाते यहाँ, निकम्मो का कोई काम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं
Aniket
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"ख़ुद के वास्ते क्या करूँँ" अब सुकून के वास्ते क्या करूँँ क्या ख़ुद ही ख़ुद को रिहा करो रातों में हो जाया करूँँ ठंडा क्या मैं भी दिन को जला करूँँ कोई तो आया है आहट किस की है बताओ किस सेे मैं ये पता करूँँ मुझे बिगाड़ा गया है तबीयत से किसी का कैसे में क्या भला करूँँ सुना है नींद तक आते हैं ख़्वाब क्या मैं भी नींदों में चला करूँँ
Aniket
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