"नशेड़ी" दो घूँट में चढ़ जाए जो, वैसा ये कोई जाम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं कोई योद्धा जंग लड़ रहा, किसी के लिए ये खेती है एक कश मार के देख इस की, जो पूरी ज़िन्दगी बदल देती है दिन का तपता सूरज है ये, ख़ुशियों में मचलती शाम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं हिम्मत की यहाँ सलामी देते, हौसले की होती सौगात है पूर्णिमा का कोई चाँद नहीं ये, अमावस की काली रात है न कर कोई तीरथ बंदे, इस सेे पवित्र कोई धाम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं लत की चाह लिऐ सर पे, कई काफ़िर परेशान घूम रहे सँभाल ली जिन्होंने कश्ती अपनी, वो आज आसमान चूम रहे शूरवीर ही टिक पाते यहाँ, निकम्मो का कोई काम नहीं मेहनत का नशा कहते है, ये नशा आम नहीं
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"ख़ुद के वास्ते क्या करूँँ" अब सुकून के वास्ते क्या करूँँ क्या ख़ुद ही ख़ुद को रिहा करो रातों में हो जाया करूँँ ठंडा क्या मैं भी दिन को जला करूँँ कोई तो आया है आहट किस की है बताओ किस सेे मैं ये पता करूँँ मुझे बिगाड़ा गया है तबीयत से किसी का कैसे में क्या भला करूँँ सुना है नींद तक आते हैं ख़्वाब क्या मैं भी नींदों में चला करूँँ
Aniket
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"सफ़र" मन में जिज्ञासा लिए रात भर ना सोया था सफ़र शुरू होने से पहले उस के ख़्यालों में खोया था सुब्ह हुआ उत्सुक्ता का न था कोई ठिकाना श्री गणेश किया सफ़र का मैं ने बस अब मंज़िल को था बस पाना पहुँचा स्टेशन सुबह-सुबह जल्दी से मैं ने टिकट कटाई वहीं कहानी भारतीय रेल की फिर समय से ट्रेन न आईं शुरु हुआ मेरा सफ़र अब वो मंज़िल का रहा, न घर का बीच राह पर चल रहा हूँ हूँ तो केवल अब सफ़र का भारतीय सफ़र में पाया एक अनोखा अहसास कहने को लोग अनजान थे पर लग रहे थे सभी अपने लिए ख़ास सफ़र का अकेलापन मिटाने चला लोगों में मेरा संवाद कहीं मिल रही थी लोगों की बातें कहीं हो रहे थे वाद विवाद और विवादपद माहौल बना पर छड़ो में परिणाम सामने आए बातें थी वृदाजनो की जिन में जीवन के रहस्य समाए यात्रा अब मेरी रोचक हुई सूनापन अब दूर भगा परायो सा लग रहा था जो कल लोगों ने अपनापन का उस में समा बाँधा ख़त्म हुई गंभीर मुद्दे अब हसीं ठहाके लगाए गए हृदयस्पशृक था वो पल जब लोगों के ग़म भगाए गए मंज़िल थी मेरी पास मगर उसे पाने का न अब मन था इतने तजुर्बे संजोए मैं ने उस एक सफ़र में सारा जीवन था मंज़िल को था अब पा चुका सफ़र मेरा कारगार रहा सफ़र ख़ुबसूरत था मंज़िल से मेरी सारा सफ़र यादगार रहा
Aniket
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