nazmKuch Alfaaz

"लाज़मी अहसास" ख़ुश-चेहरे ही अपने नहीं अपनों को भी हसीं मानो दिलकश सपनों का साहिल आँखों तक कामिल जानो उड़ती तितली ही सुंदर मचलो न क़ैद करने को यार का ही दामन थामो जानिब-ए-मंज़िल चलने को क्या ग़म उस का जब खोया वो जिस को पाया ही नहीं यूँँ मुरझाओ नहीं जैसे सर पर कोई साया नहीं तेरे रहबर वही हैं जो रिश्ते आए विरासत में बस दौलत ये साथ लिए चल तू ख़ुद की हिरासत में ज़ख़्मी करता जाए जो उस से क्यूँँ मरहम की आस जान जो वारा करता था रख उस को सिरहाने पास ख़्वाहिश के शो'ले नम करने आँखों को मत कर ख़ाली तेरी झोली में इक दिन अज़ीज़ गुल देगा माली

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है

ZafarAli Memon

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"तदबीर" आजकल ज़िंदगी मुझे क्यूँँ ये आश्नाओं सी रास आती है रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे ख़्वाब जैसे पयाम लाती है सुब्ह बुझते हुए सभी तारे इन दिनों हाल पूछ लेते हैं गर्म-चश्में कड़क सी सर्दी में किस तरह मुझ को खोज लेते हैं मेरी राहों के फूल-पत्ते ये सब मिरे साथ में टहलते हैं आज ऊँचे दरख़्त भी झुक कर छाँव मुझ को शदीद देते हैं वादियाँ और ये पहाड़ सभी गर्म-जोशी के साथ मिलते हैं चाँद-सूरज नए लिबासों में कुछ अदब से सलाम करते हैं काम सब भूल कर ये पंछी भी ख़ास नग़्में नुमायाँ करते हैं इत्तिफ़ाक़न नहीं मुझे तो ये सब तिरे इंतिज़ाम लगते हैं

kapil verma

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"तो लिखता हूँ" बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब तो लिखता हूँ सीधे बोल न पाऊँ उलझी बातें जब पैने दाँतों को चपटा करना हो जब काटे से न कटे फ़ुर्क़त की रातें जब तो लिखता हूँ गहरी शब में सोते हों जब यार सभी यादें भड़का दें ख़्वाबीदा प्रीत कभी धड़कन ज़ेर-ए-लब गाती हैं गीत कभी तो लिखता हूँ राह दिखाता तारा छिपता जाए जब पंछी-पेड़ भी कुछ बतलाते जाऍं जब साया बिसरा सा गर्दिश कर जाए जब तो लिखता हूँ रंग-ए-दिल में सुर्ख़ी फिर से लानी हो गिरवी दिल का कोई हिस्सा करना हो चस्पाँ दिल में कोई क़िस्सा करना हो तो लिखता हूँ ख़ुश-चेहरा मुस्काते जाए मन में जब कुछ अरमान जगाए ताज़ा बातें जब बेघर सी फ़िक्र जो लागे इस दिल में जब तो लिखता हूँ अपने से कब कुछ लिखता हूँ जो है सो इन बातों का ज़ोर है रह-रह कर लिखना जाने क्या ही मिलता है लिख कर शायद समझाता हूँ समझ लेता हूँ ख़ुद को तब

kapil verma

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"दास्तान-ए-इश्क़" दुनिया ने टाँग दी है तस्वीर-ए-इश्क़ खुल कर ताले सी जड़ रहेगी दरिया किनारे रुल कर गो फेंक दी ख़ला में सब चाबियाँ हैं इस की लेकिन मिसाल दुनिया ही देगी शोर-ग़ुल कर

kapil verma

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"आसमानी क़र्ज़" अंबर तुम इतने आला हो लेकिन तुम भी हमारे जैसे बे-हद क़र्ज़ में क्यूँँ जीते हो धरती से न मिलो हरगिज़ तुम पर ख़ासी यारी रखते हो उस की बेहद दौलत पर क्यूँँ आँख गड़ाए तुम रहते हो अब ये तुम ही जानो कैसे ये इफ़रात उधारी ले कर तुम बुनते हो तारे उन सेे दो-शाला अपना सीते हो सुनते आए हैं बचपन से सदियों से ऐसा करते हो अच्छा वो सब ठीक है लेकिन अंबर बस इतना बतला दो धरती का ये क़र्ज़ चुकाने की परवाह कभी करते हो

kapil verma

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"तसलसुल" इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है जाते लम्हों वाली ट्रेन में देखूँ जब गुम-सुम से बैठे ख़ुद को तो दौड़ लगा कर खिड़की से ही ढाढस की इक चाय के साथ काग़ज़ पर लिख कर कुछ नज़्में दे आता हूँ अक्सर ख़ुद को वैसे ट्रेन की इस बोगी में कुछ बुत जैसे लगने वाले लोग भी बैठे रहते हैं इनसे जब पूछो कि कहाँ तक पहुँचे हैं तो भी कुछ न बताते हैं ये बड़े अजीब से हैं ये सब लोग वो तो छोड़ो गाहे-गाहे लोग ये जाने क्यूँँ इक दम से शक्ल तुम्हारी ले लेते हैं एक अजब सी राह में हूँ मैं अब तो समझने की कोशिश भी छोड़ चुका हूँ इतना सा ही समझ आता है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना ज़ेहन से गुम ये हो जाता है ट्रेन भला है कौन सी आख़िर ट्रेन ख़्यालों वाली है ये ख़्वाबों की है या लम्हों की ख़ैर मुझे परवाह नहीं है जो भी हो मैं ने तो बस इतना ही जाना है इक दिन सरपट धुआँ सा इन साँसों का भरती हुई ये ट्रेन यकायक रुक जाएगी जैसे बे-मतलब ही किसी ने इस की चैन को खींच दिया हो उस दिन से पहले तुम आना हवा का झोंका सा बनकर और तब मेरी ये नींद उड़ाकर ट्रेन तुम्हारे लम्हों की है जो उस में अपने साथ बिठा लेना दरअस्ल ऐसा है मुझ को इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है

kapil verma

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