nazmKuch Alfaaz

"दास्तान-ए-इश्क़" दुनिया ने टाँग दी है तस्वीर-ए-इश्क़ खुल कर ताले सी जड़ रहेगी दरिया किनारे रुल कर गो फेंक दी ख़ला में सब चाबियाँ हैं इस की लेकिन मिसाल दुनिया ही देगी शोर-ग़ुल कर

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है

ABhishek Parashar

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"आसमानी क़र्ज़" अंबर तुम इतने आला हो लेकिन तुम भी हमारे जैसे बे-हद क़र्ज़ में क्यूँँ जीते हो धरती से न मिलो हरगिज़ तुम पर ख़ासी यारी रखते हो उस की बेहद दौलत पर क्यूँँ आँख गड़ाए तुम रहते हो अब ये तुम ही जानो कैसे ये इफ़रात उधारी ले कर तुम बुनते हो तारे उन सेे दो-शाला अपना सीते हो सुनते आए हैं बचपन से सदियों से ऐसा करते हो अच्छा वो सब ठीक है लेकिन अंबर बस इतना बतला दो धरती का ये क़र्ज़ चुकाने की परवाह कभी करते हो

kapil verma

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'फ़ुर्सत' अलसायी सी दुपहरी में फ़िक्रों की तेज़ धूप से बचकर बेफ़िक्री की छाँव में जब तुम बैठोगे थोड़ी देर तब सुनना अपने अंदर गुज़रे सालों से छनकर नज़्म सी इक बन कर बचपन के घर तुम सेे ये पूछेंगे- यार कहाँ गुम थे इतने दिन से मिले नहीं तुम शायद ये बोलोगे यारों दूर बहुत पड़ते हो एक जगह फ़ुर्सत में कहीं बैठा हूँ तब जा कर मैं अब तुम तक आ पाया हूँ।

kapil verma

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"तो लिखता हूँ" बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब तो लिखता हूँ सीधे बोल न पाऊँ उलझी बातें जब पैने दाँतों को चपटा करना हो जब काटे से न कटे फ़ुर्क़त की रातें जब तो लिखता हूँ गहरी शब में सोते हों जब यार सभी यादें भड़का दें ख़्वाबीदा प्रीत कभी धड़कन ज़ेर-ए-लब गाती हैं गीत कभी तो लिखता हूँ राह दिखाता तारा छिपता जाए जब पंछी-पेड़ भी कुछ बतलाते जाऍं जब साया बिसरा सा गर्दिश कर जाए जब तो लिखता हूँ रंग-ए-दिल में सुर्ख़ी फिर से लानी हो गिरवी दिल का कोई हिस्सा करना हो चस्पाँ दिल में कोई क़िस्सा करना हो तो लिखता हूँ ख़ुश-चेहरा मुस्काते जाए मन में जब कुछ अरमान जगाए ताज़ा बातें जब बेघर सी फ़िक्र जो लागे इस दिल में जब तो लिखता हूँ अपने से कब कुछ लिखता हूँ जो है सो इन बातों का ज़ोर है रह-रह कर लिखना जाने क्या ही मिलता है लिख कर शायद समझाता हूँ समझ लेता हूँ ख़ुद को तब

kapil verma

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"तदबीर" आजकल ज़िंदगी मुझे क्यूँँ ये आश्नाओं सी रास आती है रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे ख़्वाब जैसे पयाम लाती है सुब्ह बुझते हुए सभी तारे इन दिनों हाल पूछ लेते हैं गर्म-चश्में कड़क सी सर्दी में किस तरह मुझ को खोज लेते हैं मेरी राहों के फूल-पत्ते ये सब मिरे साथ में टहलते हैं आज ऊँचे दरख़्त भी झुक कर छाँव मुझ को शदीद देते हैं वादियाँ और ये पहाड़ सभी गर्म-जोशी के साथ मिलते हैं चाँद-सूरज नए लिबासों में कुछ अदब से सलाम करते हैं काम सब भूल कर ये पंछी भी ख़ास नग़्में नुमायाँ करते हैं इत्तिफ़ाक़न नहीं मुझे तो ये सब तिरे इंतिज़ाम लगते हैं

kapil verma

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"तेरे पीछे हम खड़े" जंग में मरने के ख़्वाहिश-मंद दीवाने बड़े कोई वजह तो दे हम किन वास्ते लड़े चिंगारी दोनों जानिब ही लगे तो बेहतर इकतरफ़ा झुलसन में हम भला काहे पड़े नज़्म जो मुँह पर लटकी सीने में अटकी अश्कों में लिखी को कोई अश्कों में पढ़े हारने के लिए किस ने खेले जोखिमी खेल सिला मिले गर कोई तो हम पहाड़ चढ़े ढलते दो फ़ानी पलों के साथ का क्या है 'उम्रों की बात जो हो तो तेरे पीछे हम खड़े

kapil verma

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