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'फ़ुर्सत' अलसायी सी दुपहरी में फ़िक्रों की तेज़ धूप से बचकर बेफ़िक्री की छाँव में जब तुम बैठोगे थोड़ी देर तब सुनना अपने अंदर गुज़रे सालों से छनकर नज़्म सी इक बन कर बचपन के घर तुम सेे ये पूछेंगे- यार कहाँ गुम थे इतने दिन से मिले नहीं तुम शायद ये बोलोगे यारों दूर बहुत पड़ते हो एक जगह फ़ुर्सत में कहीं बैठा हूँ तब जा कर मैं अब तुम तक आ पाया हूँ।

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"आसमानी क़र्ज़" अंबर तुम इतने आला हो लेकिन तुम भी हमारे जैसे बे-हद क़र्ज़ में क्यूँँ जीते हो धरती से न मिलो हरगिज़ तुम पर ख़ासी यारी रखते हो उस की बेहद दौलत पर क्यूँँ आँख गड़ाए तुम रहते हो अब ये तुम ही जानो कैसे ये इफ़रात उधारी ले कर तुम बुनते हो तारे उन सेे दो-शाला अपना सीते हो सुनते आए हैं बचपन से सदियों से ऐसा करते हो अच्छा वो सब ठीक है लेकिन अंबर बस इतना बतला दो धरती का ये क़र्ज़ चुकाने की परवाह कभी करते हो

kapil verma

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"तसलसुल" इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है जाते लम्हों वाली ट्रेन में देखूँ जब गुम-सुम से बैठे ख़ुद को तो दौड़ लगा कर खिड़की से ही ढाढस की इक चाय के साथ काग़ज़ पर लिख कर कुछ नज़्में दे आता हूँ अक्सर ख़ुद को वैसे ट्रेन की इस बोगी में कुछ बुत जैसे लगने वाले लोग भी बैठे रहते हैं इनसे जब पूछो कि कहाँ तक पहुँचे हैं तो भी कुछ न बताते हैं ये बड़े अजीब से हैं ये सब लोग वो तो छोड़ो गाहे-गाहे लोग ये जाने क्यूँँ इक दम से शक्ल तुम्हारी ले लेते हैं एक अजब सी राह में हूँ मैं अब तो समझने की कोशिश भी छोड़ चुका हूँ इतना सा ही समझ आता है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना ज़ेहन से गुम ये हो जाता है ट्रेन भला है कौन सी आख़िर ट्रेन ख़्यालों वाली है ये ख़्वाबों की है या लम्हों की ख़ैर मुझे परवाह नहीं है जो भी हो मैं ने तो बस इतना ही जाना है इक दिन सरपट धुआँ सा इन साँसों का भरती हुई ये ट्रेन यकायक रुक जाएगी जैसे बे-मतलब ही किसी ने इस की चैन को खींच दिया हो उस दिन से पहले तुम आना हवा का झोंका सा बनकर और तब मेरी ये नींद उड़ाकर ट्रेन तुम्हारे लम्हों की है जो उस में अपने साथ बिठा लेना दरअस्ल ऐसा है मुझ को इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है

kapil verma

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"तदबीर" आजकल ज़िंदगी मुझे क्यूँँ ये आश्नाओं सी रास आती है रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे ख़्वाब जैसे पयाम लाती है सुब्ह बुझते हुए सभी तारे इन दिनों हाल पूछ लेते हैं गर्म-चश्में कड़क सी सर्दी में किस तरह मुझ को खोज लेते हैं मेरी राहों के फूल-पत्ते ये सब मिरे साथ में टहलते हैं आज ऊँचे दरख़्त भी झुक कर छाँव मुझ को शदीद देते हैं वादियाँ और ये पहाड़ सभी गर्म-जोशी के साथ मिलते हैं चाँद-सूरज नए लिबासों में कुछ अदब से सलाम करते हैं काम सब भूल कर ये पंछी भी ख़ास नग़्में नुमायाँ करते हैं इत्तिफ़ाक़न नहीं मुझे तो ये सब तिरे इंतिज़ाम लगते हैं

kapil verma

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घर बहुत से घरों में रहा हूँ मैं अब तक उन्हीं में से इक है वो दादी के क़िस्से सुनाए गए जो बड़े से मकाँ में जिसे अब पुराना कहा जा रहा है जहाँ रह रहे थे कई लोग साझे उसी की फ़ज़ाएँ थी मौजूद उसी दिन कि जब मेरा पहली दफ़ा जन्मदिन उस खुले चौक में था मनाया सभी ने वहीं टिमटिमाती सी आँखें लिए मैं फ़लक से बरसती दु'आओं का प्यारा ज़ख़ीरा मुसलसल तके जा रहा था उन्हीं में से इक है वो इतवार की धूप कहीं छाँव में एक गद्दा बिछाए मिरे हॉस्टल से लगी छत पे लेटे थकन मैं जहाँ-भर की कम कर रहा था मिरा घर है गुमनाम सी शादियाँ भी जहाँ मैं उसी दिन बने दोस्तों को लिए साथ अपने वहीं पर बनाए नए खेल में दौड़ता खेलता बस मज़े से चहकता नज़र आ रहा था मुझे माँ की डाँटों में भी घर मिला है फिर उन सब लतीफ़ों में भी घर है जिन को बड़ा चाव ले कर सुनाते थे पापा मगर घर पुराना कई साल छूटा है पीछे अब आ कर बसे हैं हम ऐसे नए घर में जिस में खुला आसमाँ अब तके कोई ऐसी वजह ही नहीं है मगर हाँ यक़ीनन मिरा घर है ये भी है ज़ाहिर कहे हैं सभी घर इसे भी ख़मोशी में लेकिन लगा है मुझे यूँँ सभी इन घरों से कुछ आवाज़ आती हो जैसे ये मिल कर मुझे बोलते हों कि इतने घरों में मैं ही रह रहा हूँ या घर ये मुझी में बसर कर रहे हैं

kapil verma

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"तो लिखता हूँ" बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब तो लिखता हूँ सीधे बोल न पाऊँ उलझी बातें जब पैने दाँतों को चपटा करना हो जब काटे से न कटे फ़ुर्क़त की रातें जब तो लिखता हूँ गहरी शब में सोते हों जब यार सभी यादें भड़का दें ख़्वाबीदा प्रीत कभी धड़कन ज़ेर-ए-लब गाती हैं गीत कभी तो लिखता हूँ राह दिखाता तारा छिपता जाए जब पंछी-पेड़ भी कुछ बतलाते जाऍं जब साया बिसरा सा गर्दिश कर जाए जब तो लिखता हूँ रंग-ए-दिल में सुर्ख़ी फिर से लानी हो गिरवी दिल का कोई हिस्सा करना हो चस्पाँ दिल में कोई क़िस्सा करना हो तो लिखता हूँ ख़ुश-चेहरा मुस्काते जाए मन में जब कुछ अरमान जगाए ताज़ा बातें जब बेघर सी फ़िक्र जो लागे इस दिल में जब तो लिखता हूँ अपने से कब कुछ लिखता हूँ जो है सो इन बातों का ज़ोर है रह-रह कर लिखना जाने क्या ही मिलता है लिख कर शायद समझाता हूँ समझ लेता हूँ ख़ुद को तब

kapil verma

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