"तदबीर" आजकल ज़िंदगी मुझे क्यूँँ ये आश्नाओं सी रास आती है रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे ख़्वाब जैसे पयाम लाती है सुब्ह बुझते हुए सभी तारे इन दिनों हाल पूछ लेते हैं गर्म-चश्में कड़क सी सर्दी में किस तरह मुझ को खोज लेते हैं मेरी राहों के फूल-पत्ते ये सब मिरे साथ में टहलते हैं आज ऊँचे दरख़्त भी झुक कर छाँव मुझ को शदीद देते हैं वादियाँ और ये पहाड़ सभी गर्म-जोशी के साथ मिलते हैं चाँद-सूरज नए लिबासों में कुछ अदब से सलाम करते हैं काम सब भूल कर ये पंछी भी ख़ास नग़्में नुमायाँ करते हैं इत्तिफ़ाक़न नहीं मुझे तो ये सब तिरे इंतिज़ाम लगते हैं
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
Ammar Iqbal
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
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"तसलसुल" इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है जाते लम्हों वाली ट्रेन में देखूँ जब गुम-सुम से बैठे ख़ुद को तो दौड़ लगा कर खिड़की से ही ढाढस की इक चाय के साथ काग़ज़ पर लिख कर कुछ नज़्में दे आता हूँ अक्सर ख़ुद को वैसे ट्रेन की इस बोगी में कुछ बुत जैसे लगने वाले लोग भी बैठे रहते हैं इनसे जब पूछो कि कहाँ तक पहुँचे हैं तो भी कुछ न बताते हैं ये बड़े अजीब से हैं ये सब लोग वो तो छोड़ो गाहे-गाहे लोग ये जाने क्यूँँ इक दम से शक्ल तुम्हारी ले लेते हैं एक अजब सी राह में हूँ मैं अब तो समझने की कोशिश भी छोड़ चुका हूँ इतना सा ही समझ आता है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना ज़ेहन से गुम ये हो जाता है ट्रेन भला है कौन सी आख़िर ट्रेन ख़्यालों वाली है ये ख़्वाबों की है या लम्हों की ख़ैर मुझे परवाह नहीं है जो भी हो मैं ने तो बस इतना ही जाना है इक दिन सरपट धुआँ सा इन साँसों का भरती हुई ये ट्रेन यकायक रुक जाएगी जैसे बे-मतलब ही किसी ने इस की चैन को खींच दिया हो उस दिन से पहले तुम आना हवा का झोंका सा बनकर और तब मेरी ये नींद उड़ाकर ट्रेन तुम्हारे लम्हों की है जो उस में अपने साथ बिठा लेना दरअस्ल ऐसा है मुझ को इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है
kapil verma
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"तो लिखता हूँ" बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब तो लिखता हूँ सीधे बोल न पाऊँ उलझी बातें जब पैने दाँतों को चपटा करना हो जब काटे से न कटे फ़ुर्क़त की रातें जब तो लिखता हूँ गहरी शब में सोते हों जब यार सभी यादें भड़का दें ख़्वाबीदा प्रीत कभी धड़कन ज़ेर-ए-लब गाती हैं गीत कभी तो लिखता हूँ राह दिखाता तारा छिपता जाए जब पंछी-पेड़ भी कुछ बतलाते जाऍं जब साया बिसरा सा गर्दिश कर जाए जब तो लिखता हूँ रंग-ए-दिल में सुर्ख़ी फिर से लानी हो गिरवी दिल का कोई हिस्सा करना हो चस्पाँ दिल में कोई क़िस्सा करना हो तो लिखता हूँ ख़ुश-चेहरा मुस्काते जाए मन में जब कुछ अरमान जगाए ताज़ा बातें जब बेघर सी फ़िक्र जो लागे इस दिल में जब तो लिखता हूँ अपने से कब कुछ लिखता हूँ जो है सो इन बातों का ज़ोर है रह-रह कर लिखना जाने क्या ही मिलता है लिख कर शायद समझाता हूँ समझ लेता हूँ ख़ुद को तब
kapil verma
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"दास्तान-ए-इश्क़" दुनिया ने टाँग दी है तस्वीर-ए-इश्क़ खुल कर ताले सी जड़ रहेगी दरिया किनारे रुल कर गो फेंक दी ख़ला में सब चाबियाँ हैं इस की लेकिन मिसाल दुनिया ही देगी शोर-ग़ुल कर
kapil verma
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"आसमानी क़र्ज़" अंबर तुम इतने आला हो लेकिन तुम भी हमारे जैसे बे-हद क़र्ज़ में क्यूँँ जीते हो धरती से न मिलो हरगिज़ तुम पर ख़ासी यारी रखते हो उस की बेहद दौलत पर क्यूँँ आँख गड़ाए तुम रहते हो अब ये तुम ही जानो कैसे ये इफ़रात उधारी ले कर तुम बुनते हो तारे उन सेे दो-शाला अपना सीते हो सुनते आए हैं बचपन से सदियों से ऐसा करते हो अच्छा वो सब ठीक है लेकिन अंबर बस इतना बतला दो धरती का ये क़र्ज़ चुकाने की परवाह कभी करते हो
kapil verma
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"लाज़मी अहसास" ख़ुश-चेहरे ही अपने नहीं अपनों को भी हसीं मानो दिलकश सपनों का साहिल आँखों तक कामिल जानो उड़ती तितली ही सुंदर मचलो न क़ैद करने को यार का ही दामन थामो जानिब-ए-मंज़िल चलने को क्या ग़म उस का जब खोया वो जिस को पाया ही नहीं यूँँ मुरझाओ नहीं जैसे सर पर कोई साया नहीं तेरे रहबर वही हैं जो रिश्ते आए विरासत में बस दौलत ये साथ लिए चल तू ख़ुद की हिरासत में ज़ख़्मी करता जाए जो उस से क्यूँँ मरहम की आस जान जो वारा करता था रख उस को सिरहाने पास ख़्वाहिश के शो'ले नम करने आँखों को मत कर ख़ाली तेरी झोली में इक दिन अज़ीज़ गुल देगा माली
kapil verma
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