nazmKuch Alfaaz

ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा ऐसे बद-बख़्त ज़माने में हज़ारों होंगे जिन को लोरी भी मुयस्सर नहीं आती होगी मेरी लोरी से तिरी भूक नहीं मिट सकती मैं ने माना कि तुझे भूक सताती होगी लेकिन ऐ मेरी उमीदों के हसीं ताज-महल मैं तिरी भूक को लोरी ही सुना सकती हूँ तेरा रह रह के ये रोना नहीं देखा जाता अब तुझे दूध नहीं ख़ून पिला सकती हूँ भूक तो तेरा मुक़द्दर है ग़रीबी की क़सम भूक की आग में जल जल के ये रोना कैसा तू तो आदी है इसी तरह से सो जाने का भूक की गोद में फिर आज न सोना कैसा आज की रात फ़क़त तू ही नहीं तेरी तरह और कितने हैं जिन्हें भूक लगी है बेटे रोटियाँ बंद हैं सरमाए के तह-ख़ानों में भूक इस मुल्क के खेतों में उगी है बेटे लोग कहते हैं कि इस मुल्क के ग़द्दारों ने सिर्फ़ महँगाई बढ़ाने को छुपाया है अनाज ऐसे नादार भी इस मुल्क में सो जाते हैं हल चलाए हैं जिन्हों ने नहीं पाया है अनाज तू ही इस मुल्क में नादार नहीं है सो जा ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे टाट का मैला फटा हुआ पर्दा तुम्हारे हाथ की जुम्बिश से काँप जाएगा कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे मुझे तो याद नहीं कुछ तुम्हारे सर की क़सम मगर पड़ोस की लड़की बता रही थी कि मैं अब अपनी माँग में अफ़्शाँ नहीं सजाती हूँ तवे पे रोटियाँ अक्सर जलाई हैं मैं ने शकर के बदले नमक चाय में मिलाती हूँ वो कह रही थी कि नंगी कलाइयाँ मेरी तमाम उम्र यूँँही चूड़ियों को तरसेंगी ग़मों की धूप में जलते हुए इस आँगन पर मसर्रतों की घटाएँ कभी न बरसेंगी वो कह रही थी कि तुम अब कभी न आओगे गली के मोड़ पे लेकिन हर एक शाम मुझे तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे

Kafeel Aazar Amrohvi

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कैसी ख़ामोशी है वीरानी है सन्नाटा है कोई आहट है न आवाज़ न कोई धड़कन दिल है या क़ब्र सुलगती हुई तन्हाई की ज़ेहन है या किसी बेवा का अकेला आँगन उड़ गया रंग हर इक सोच के आईने का शब के बे-नूर दुपट्टे से सितारे टूटे जम गई गर्द ख़यालों की हसीं राहों पर मुद्दतें हो गईं उम्मीद का दामन छूटे यक-ब-यक दूर बहुत दूर बहुत दूर कहीं तेरी पाज़ेब छनकने की सदा आने लगी शौक़ ने पाँव बढ़ाए उसी आवाज़ की सम्त तुझ से मिलने की लगन और भी तड़पाने लगी ये खंडर आज जहाँ रात की तारीकी में तू ने भूले हुए अफ़्साने को दोहराया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में कि जहाँ कितने दिन ब'अद तिरा साया नज़र आया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में हम ने उम्र भर साथ निभाने की क़सम खाई थी इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में तेरे थरथराते हुए होंटों पे दुआ आई थी रस्म कोई हो मगर हम को जुदा कर न सके ये रिवायात न पहनाएँ कभी ज़ंजीरें हम कि इस राज़ से इस बात से ना-वाक़िफ़ थे कि दु'आओं से बदलती ही नहीं तक़दीरें लेकिन अब रस्म कोई कुछ न कहेगी मुझ से अब रिवायात को मजबूर किया है मैं ने अब न रोकेगा मिरी राह ज़माना बढ़ कर जो भी अंजाम हो ये सोच लिया है मैं ने मैं मुक़द्दर से गले मिल के नहीं रो सकता तुझ को पाना मिरा मक़्सद है तुझे पाऊँगा आज ठुकरा के हर इक मस्लहत-अंदेशी को तेरे साए के तआक़ुब में चला जाऊँगा

Kafeel Aazar Amrohvi

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सुना है कि बूढ़ी हवेली में हर शब भटकती है इक रूह जिस के बदन पर पुरानी रिवायात के खोखले-पन का मल्बूस है जिस की पेशानी के ज़ख़्म से ख़ून बहता है माज़ी की तहज़ीब का और वो चीख़ती है कि बूढ़ी हवेली से उस को निकालो पुरानी रिवायात के खोखले-पन के मल्बूस को फाड़ डालो सुनो शहर वालो

Kafeel Aazar Amrohvi

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अभी से उन के लिए इतनी बे-क़रार न हो किया है मुझ को बहुत बे-क़रार छेड़ा है तुम्हारे शे'र सुना कर तुम्हारे सर की क़सम सहेलियों ने मुझे बार बार छेड़ा है कशिश नहीं है तुम्हारे बिना बहारों में ये छत ये चाँद सितारे उदास लगते हैं चमन का रंग नसीम-ए-सहर गुलाब के फूल नहीं हो तुम तो ये सारे उदास लगते हैं ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने की मैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँ गई हूँ दामन-ए-दिल को ख़ुशी से भरने मगर जहान भर की उदासी समेट लाई हूँ कहीं पे गाए गए हैं जो गीत बाबुल के तो अजनबी से ख़यालों में खो गई हूँ मैं तुम्हारी याद के सीने पे बार-हा 'आज़र' तसव्वुरात का सर रख के सो गई हूँ मैं तुम्हें यक़ीन न होगा अकेले कमरे में मैं अपनी जान से प्यारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ तमाम रात तुम्हें याद करती रहती हूँ तमाम रात तुम्हारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ तुम आ भी जाओ कि गुज़रे हुए दिनों की तरह सुलग न जाएँ कहीं हसरतों की तस्वीरें उदास पा के न छेड़ें सहेलियाँ मुझ को बदल भी दो मिरी तन्हाइयों की तक़दीरें

Kafeel Aazar Amrohvi

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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी लोग बे-वजह उदासी का सबब पूछेंगे ये भी पोछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँँ हो उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़ इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़ चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगे काँपते हाथों पे फ़िक़रे भी कसे जाएँगे लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ता'ना देंगे बातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगे उन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना वर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगे चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन से मेरे बारे में कोई बात न करना उन से बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

Kafeel Aazar Amrohvi

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