nazmKuch Alfaaz

सुना है कि बूढ़ी हवेली में हर शब भटकती है इक रूह जिस के बदन पर पुरानी रिवायात के खोखले-पन का मल्बूस है जिस की पेशानी के ज़ख़्म से ख़ून बहता है माज़ी की तहज़ीब का और वो चीख़ती है कि बूढ़ी हवेली से उस को निकालो पुरानी रिवायात के खोखले-पन के मल्बूस को फाड़ डालो सुनो शहर वालो

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे टाट का मैला फटा हुआ पर्दा तुम्हारे हाथ की जुम्बिश से काँप जाएगा कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे मुझे तो याद नहीं कुछ तुम्हारे सर की क़सम मगर पड़ोस की लड़की बता रही थी कि मैं अब अपनी माँग में अफ़्शाँ नहीं सजाती हूँ तवे पे रोटियाँ अक्सर जलाई हैं मैं ने शकर के बदले नमक चाय में मिलाती हूँ वो कह रही थी कि नंगी कलाइयाँ मेरी तमाम उम्र यूँँही चूड़ियों को तरसेंगी ग़मों की धूप में जलते हुए इस आँगन पर मसर्रतों की घटाएँ कभी न बरसेंगी वो कह रही थी कि तुम अब कभी न आओगे गली के मोड़ पे लेकिन हर एक शाम मुझे तुम्हारे क़दमों की आहट सुनाई देती है हर एक शाम मुझे यूँँ ख़याल आता है कि जैसे तुम अभी दफ़्तर से लौट आओगे

Kafeel Aazar Amrohvi

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कैसी ख़ामोशी है वीरानी है सन्नाटा है कोई आहट है न आवाज़ न कोई धड़कन दिल है या क़ब्र सुलगती हुई तन्हाई की ज़ेहन है या किसी बेवा का अकेला आँगन उड़ गया रंग हर इक सोच के आईने का शब के बे-नूर दुपट्टे से सितारे टूटे जम गई गर्द ख़यालों की हसीं राहों पर मुद्दतें हो गईं उम्मीद का दामन छूटे यक-ब-यक दूर बहुत दूर बहुत दूर कहीं तेरी पाज़ेब छनकने की सदा आने लगी शौक़ ने पाँव बढ़ाए उसी आवाज़ की सम्त तुझ से मिलने की लगन और भी तड़पाने लगी ये खंडर आज जहाँ रात की तारीकी में तू ने भूले हुए अफ़्साने को दोहराया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में कि जहाँ कितने दिन ब'अद तिरा साया नज़र आया है इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में हम ने उम्र भर साथ निभाने की क़सम खाई थी इसी उजड़े हुए वीरान खंडर में तेरे थरथराते हुए होंटों पे दुआ आई थी रस्म कोई हो मगर हम को जुदा कर न सके ये रिवायात न पहनाएँ कभी ज़ंजीरें हम कि इस राज़ से इस बात से ना-वाक़िफ़ थे कि दु'आओं से बदलती ही नहीं तक़दीरें लेकिन अब रस्म कोई कुछ न कहेगी मुझ से अब रिवायात को मजबूर किया है मैं ने अब न रोकेगा मिरी राह ज़माना बढ़ कर जो भी अंजाम हो ये सोच लिया है मैं ने मैं मुक़द्दर से गले मिल के नहीं रो सकता तुझ को पाना मिरा मक़्सद है तुझे पाऊँगा आज ठुकरा के हर इक मस्लहत-अंदेशी को तेरे साए के तआक़ुब में चला जाऊँगा

Kafeel Aazar Amrohvi

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कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी कब तलक स्कूल के बच्चों से दिल बहलाओगी कब तलक मुन्ना से शादी के करोगी तज़्किरे ख़्वाहिशों की आग में जलती रहोगी कब तलक छुट्टियों में कब तलक हर साल दिल्ली जाओगी कब तलक शादी के हर पैग़ाम को ठुकराओगी चाय में पड़ता रहेगा और कितने दिन नमक बंद कमरे में पढ़ोगी और कितने दिन ख़ुतूत ये उदासी कब तलक कब तलक नज़्में लिखोगी रोओगी यूँँ रात की ख़ामोशियों में कब तलक बाइबल में कब तलक ढूँडोगी ज़ख़्मों का इलाज मुस्कुराहट में छुपाओगी कहाँ तक अपने ग़म कब तलक पूछोगी टेलीफ़ोन पर मेरा मिज़ाज फ़ैसला कर लो कि किस रस्ते पे चलना है तुम्हें मेरी बाँहों में सिमटना है हमेशा के लिए या हमेशा दर्द के शो'लों में जलना है तुम्हें कब तलक ख़्वाबों से धोके खाओगी

Kafeel Aazar Amrohvi

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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी लोग बे-वजह उदासी का सबब पूछेंगे ये भी पोछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँँ हो उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़ इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़ चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगे काँपते हाथों पे फ़िक़रे भी कसे जाएँगे लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ता'ना देंगे बातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगे उन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना वर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगे चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन से मेरे बारे में कोई बात न करना उन से बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

Kafeel Aazar Amrohvi

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ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा ऐसे बद-बख़्त ज़माने में हज़ारों होंगे जिन को लोरी भी मुयस्सर नहीं आती होगी मेरी लोरी से तिरी भूक नहीं मिट सकती मैं ने माना कि तुझे भूक सताती होगी लेकिन ऐ मेरी उमीदों के हसीं ताज-महल मैं तिरी भूक को लोरी ही सुना सकती हूँ तेरा रह रह के ये रोना नहीं देखा जाता अब तुझे दूध नहीं ख़ून पिला सकती हूँ भूक तो तेरा मुक़द्दर है ग़रीबी की क़सम भूक की आग में जल जल के ये रोना कैसा तू तो आदी है इसी तरह से सो जाने का भूक की गोद में फिर आज न सोना कैसा आज की रात फ़क़त तू ही नहीं तेरी तरह और कितने हैं जिन्हें भूक लगी है बेटे रोटियाँ बंद हैं सरमाए के तह-ख़ानों में भूक इस मुल्क के खेतों में उगी है बेटे लोग कहते हैं कि इस मुल्क के ग़द्दारों ने सिर्फ़ महँगाई बढ़ाने को छुपाया है अनाज ऐसे नादार भी इस मुल्क में सो जाते हैं हल चलाए हैं जिन्हों ने नहीं पाया है अनाज तू ही इस मुल्क में नादार नहीं है सो जा ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा

Kafeel Aazar Amrohvi

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