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मैं उस के नाम की मेहंदी सजा कर अपने हाथों पर उन्हें ता-देर तकती हूँ कि जितना प्यार वो करता है रंग उतना ही गहरा हो मगर ये देख कर हैरान होती हूँ न-जाने क्यूँँ मिरे हाथों पे हर मेहंदी का रंग कच्चा ही आता है

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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कितनी अच्छी होती हैं इस से होने वाली कुछ आख़िरी मुलाक़ातें वक़्त वो ही होता है रंग वो ही होता है और बात करने का ढंग वो ही होता है जाते हैं वहीं जिस जा पहली बार देखा हो दूर जाते रिश्ते भी एक पल को लगता है जैसे पास आते हों दिल धड़कने लगता है सर्द जिस्म में यक-दम ज़ीस्त दौड़ जाती है एक लम्हे को जैसे दुनिया ठहर जाती है बस उस एक लम्हे में जितना अर्सा भी उस के साथ में बिताया हो दिल में और आँखों में घूम घूम जाता है जब वो लम्हा चलता है तब ये याद आता है वक़्त जा चुका अच्छा अब हैं तो फ़क़त यादें कितनी अच्छी होती हैं उस से होने वाली कुछ आख़िरी मुलाक़ातें

Urooj Zehra Zaidi

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मुझे मालूम था तुम रस्ता बदलोगे तभी आँखों में ख़्वाबों को ज़रा सी भी जगह न दी मगर ये दिल मगर ये दिल बहुत कम्बख़्त है सुनता नहीं मेरी सो अब जो तुम ने अपनी राह बदली है तो अब मासूम बन के रोता-धोता है मुझे कहता है फिर आग़ोश में ले लो मुझे सीने में फिर रख लो मैं अब हो बात मानूँगा मगर वो क्या है नाँ उस पर तुम्हारा नाम कंदा है तुम्हारा नाम अब वहशत से बढ़ कर कुछ नहीं देता उसी की चीज़ होती है कि जिस का नाम लिक्खा हो तुम्हारी सारी चीज़ें तो तुम्हें लौटा चुकी हूँ मैं सुनो ये दिल भी ले जाओ और अपनी चीज़ें अब सँभाल कर रखना दोबारा से तुम्हारे नाम का कुछ भी कभी भी और कहीं से भी किसी तरह भी मेरे पास न आए मैं सय्यद हूँ मैं जो इक बार दे दूँ फिर उसे वापस नहीं लेती

Urooj Zehra Zaidi

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सुनो बेज़ार सा रहना किसी की बात न सुनना किसी का भी कहीं पर भी कोई एहसास न करना बहुत सजता है तुम पे पर तुम्हारे ऐसा करने से जिसे तुम अपना कहते हो वो तुम से रूठ जाता है तुम्हारी बे-नियाज़ी से मिरा दिल टूट जाता है

Urooj Zehra Zaidi

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अपनी मोहब्बत के हाँ करने छुप के निकाह के दो बोलों पर ख़ुश होने और उस ही ख़ुशी में अपने हाथों को मेहंदी से रँगने वाली हर-पल शोख़ी से मुस्काती पागल लड़की इस मेहंदी का रंग फीका पड़ने से पहले तेरे सय्याँ छोड़ के बैय्याँ अपनी एक नई दुनिया में मगन हुए हैं इक दो दिन में तुझ से जो कुछ लेना है वो सब कुछ ले कर और तलाक़ की कालक तेरे मुँह पर मल कर महर के नाम पर एहसाँ कर के तुझ को ऐसा ज़ेर करेंगे कि सब शोख़ी आँखों में मौजूद ये मस्ती तेरी हस्ती सब कुछ बस इक पल में उल्टा हो जाएगा तेरी क़िस्मत के दुख जितने संजीदा हैं पागल लड़की तू भी यक-दम वैसी ही संजीदा होगी

Urooj Zehra Zaidi

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