nazmKuch Alfaaz

मेरे अतरंगी यार हर कुछ महीनों में तुम सेे मिलने आ जाता हूँ तुम सेे मिल कर ख़ुद को थोड़ा और ज़्यादा मिलता हूँ तुम सेे बातें करूँँ तो लगता है मानो ख़ुद से गुफ़्तगू चल रही है तुम सेे मिल कर सारे ग़म सारे दुख बहुत छोटे लगते हैं अपनी यारी है ही कुछ अतरंगी सी कुछ हम सेंगी सी तुम यूँँ ही रहना मेरे दोस्त कम हैं मैं जल्द ही आऊँगा तुम सेे मिलने दिल की बातें करने तब तक अपना ख़याल रखना मेरे अतरंगी यार मेरे पहाड़

Related Nazm

"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

27 likes

वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

160 likes

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

81 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

107 likes

More from Saurabh Yadav Kaalikhh

"ऐश ट्रे" एक आग ज़माने में लगी हुई है और एक ज़माने भर के लोगों में और एक लगी हुई है इस सिगरेट में जो मेरी उँगलियों के बीच में फँसी हुई है जलने और सुलगने में बहुत फ़र्क़ है ये फ़र्क़ आप को समझ आएगा जब आप किसी जलती हुई लाश के सामने बैठ कर कुछ कश लगाएँगे मेरी सिगरेट सुलग सुलग कर झड़ने के लिए ऐश ट्रे की तरफ़ भागती है इंसान कहाँ भागता है नहीं भाग पाता ना ता'उम्र जलकर झड़ने के वक़्त चार कंधों पर ले जाया जाता है और फूँक दिया जाता है बड़ी आसानी से जैसे मैं ये सिगरेट फूँक रहा हूँ तब्दील हो जाता है राख में मिट्टी में मेरी जलती हुई सिगरेट की तरह हम सब भी क़तार में हैं जैसे क़तार में लगी हुई हैं सिगरेटें डिब्बी में जलकर किसी के होंठों में लग कर सुलगने को बेताब राख होने को बेताब दफ़्न होने को बेताब सिगरेटें हम सिगरेट ही तो हैं और ये दुनिया एक ऐश ट्रे

Saurabh Yadav Kaalikhh

1 likes

"कैसे हो तुम" काफ़ी वक़्त गुज़र गया तुम सेे बात नहीं हुई उम्मीद है तुम अच्छे होगे ख़ैर मैं भी ठीक हूँ या यूँँ कहा जाए तेरा जो हाल है मेरा वो हाल है सब कितना तेज़ बदलता है ना वक़्त बदलता है बदल जाता है मौसम बदले हैं हम साथ बदल जाते हैं हमारे चेहरे चेहरे की शिकन माथे पर लकीरें भी बढ़ जाती हैं वक़्त के साथ साथ उम्र के साथ साथ सूरज भी डूब गया ये शाम भी गुज़र जाएगी धीरे धीरे ये आग भी बुझ जाएगी बुझ जाएगी ये सिगरेट भी और बुझ जाऊँगा मैं भी इस इंतिज़ार में कि तुम कभी तो मुझ सेे पूछोगे कैसे हो तुम कैसे हो तुम

Saurabh Yadav Kaalikhh

0 likes

"ज़िंदगी ख़्वाब सी" आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं लोग जैसे पेड़ों से छीनी हुई छाँव जैसे समुंदर में दूर खोई हुई नाव ये वक़्त भी अजीब चीज़ होती है ना वक़्त गुजरते वक़्त नहीं लगता है ना और जब आगे देखता हूँ तो ख़्वाब दिखते हैं वो ख़्वाब जिन में मैं बस खो जाना चाहता हूँ जिन में खो कर बह जाना चाहता हूँ वो सारे ख़्वाब जिन का होकर रह जाना चाहता हूँ आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं

Saurabh Yadav Kaalikhh

1 likes

सब सीमित है यहाँ कोई रिक्त नहीं है सिवाए लाल कोई रक्त नहीं है किसी के पास है थोड़ा ज़्यादा तो कोई बिस्तर पर पड़े सोचता कि वक़्त कम है या वक़्त ही नहीं है सब सीमित है सीमित ज़मीं है सीमित है ये खुला आसमान सीमित इस आसमान तले रह रहे हम इंसान सीमित है आप का मकान भी सीमित आप की मौत का सामान भी सीमित है धड़कन की रफ़्तार भी ये दहर भी ये दयार भी सीमित हैं यहाँ यार भी यारों की बातें मुलाक़ातें दिन का वक़्त हो या ये रातें सीमित हैं ग़म यहाँ ग़म के बा'द की ख़ुशी सीमित सी है रस्सी और उस में पड़ने वाली गाँठ लोगों के अपने नवाबी ठाठ सीमित रिश्ते हैं नहीं दिखते फ़रिश्ते हैं सीमित आप के घर गाड़ी मोबाइल की किश्तें हैं जिन्हें भरने के लिए आप अपने सीमित जीवन में सीमित कमाई के लिए सीमित संख्या में काम करते हैं सीमित है आप का वक़्त भी सीमित हैं ज़िंदगी के पड़ाव हर पड़ाव के दरख़्त भी सीमित है आप की जवानी जिस्म में रवानी ये सारी हवा ये पानी हमारी तुम्हारी वाणी सूरज का उगना डूबना सीमित है डूबता सूरज देख समझ आया उजाला सीमित है और उगता सूरज देख समझ आया कि अँधेरे से सीमित रिश्ता ही स्थिरता की राह है स्थिरता सीमित है सीमित है राह भी ख़ुद की परवाह भी सीमित उम्र है निश्चित मृत्यु है सीमित है आप की काठी सीमित है लकड़ी लाठी सीमित है आप के ताबूत का वज़न सीमित है आप के ऊपर पहनाया गया कफ़न आप के लिए तय हुई दो गज़ भर ज़मीन आप के नीचे बिछी आख़िरी कालीन सीमित है सीमित शब्दों से जितना लिख पाए लिखते गए मुँह उठा कर कहीं से कालिख़ आए पढ़ते गए जितना पढ़ पाए क्योंकि वक़्त बेहद सीमित था सीमित है सीमित रहेगा

Saurabh Yadav Kaalikhh

1 likes

एक दिन एक दिन जब दिल और दिमाग़ आलस के सफ़र में होंगे जब ज़िन्दगी भी थोड़ा आराम फ़रमा रही होगी वो दिन अलग सी छुट्टी का दिन होगा जब पुरानी यादों के रहगुज़र से गुज़रने के बजाए मैं नई यादों के तलाश में होऊँगा कुछ नया करने का जुनून होगा मेरी बाहों के आग़ोश में सिर्फ़ सुकून होगा जब साहिल पर पहाड़ खड़े हुए दिखेंगे और झरने समुंदर में मिलते दिखेंगे मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जिस दिन सूरज भी देर तक सफ़र में हो जब चाँद का भी घर जाने का मन न करे जैसे कभी कभी मैं दफ़्तर में देर तक रहता हूँ तारे भी थोड़ा सा ओवरटाइम करें या फिर कोई दिन जो खुले आसमाँ की तरह अपनी बाँहों को खोले मुझे ऐसा एक दिन चाहिए जब मैं अपने दिल में दबी यादों को ज़ख़्मों को ग़मों को बे-रंग आँसुओं में तब्दील कर के ख़ुशी के झरनों में तब्दील कर के किसी समुंदर में घोल दूँ मुझे ऐसा एक दिन चाहिए

Saurabh Yadav Kaalikhh

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Saurabh Yadav Kaalikhh.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Saurabh Yadav Kaalikhh's nazm.