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मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी सारे घर में चाँदनी फैलाएगी हर नज़र में रौशनी आ जाएगी हूर-ए-जन्नत से निछावर लाएगी मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी बाप के दिल की कली खिल जाएगी माँ की नज़रों में जवानी आएगी और वो ता'लीम आ'ला पाएगी उस की शादी की घड़ी फिर आएगी मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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तीन फ़ित्नों का क़िस्सा पुराना हुआ चार फ़ित्नों का सुनिए ज़रा माजरा एक लम्बे हैं आलिम भी फ़ाज़िल भी हैं सच तो ये है कि थोड़े से काहिल भी हैं शे'र का शौक़ भी इल्म का ज़ौक़ भी और गले में अलीगढ़ का है तौक़ भी मुर्ग़-ओ-माही की रग रग से ये आश्ना दोस्तों पर फ़िदा और घर से जुदा खाने पीने का कोई नहीं है निज़ाम तीर तिक्के पे चलता है सब इन का काम दूसरी जो हैं पढ़ने में गो तेज़ हैं उन को देखो तो बिल्कुल ही अंग्रेज़ हैं रास आया है लिखने का चक्कर उन्हें मिलते रहते हैं इनआ'म अक्सर उन्हें हैं नफ़ासत-पसंद और ख़ल्वत-पसंद दोस्ती में भी रहती हैं कुछ बंद बंद बोलती हैं तो लफ़्ज़ों का ग़ाएब सिरा जुमला उन का अधूरा ही पल्ले पड़ा तीसरी तेज़ है और हर फ़न में ताक़ हर घड़ी दिल-लगी क़हक़हे और मज़ाक़ पढ़ती लिखती भी है और गाती भी है अपनी बातों से सब को लुभाती भी है वहम ये है कि हैं दाँत मेरे बड़े मुझ से पूछो तो लगते हैं मोती जड़े सुब्ह को रोज़ अख़बार पढ़ती है ये भाई बहनों से फिर जा के लड़ती है ये और छोटी है गुड़िया सी मासूम सी कुछ तो संजीदा सी थोड़ी मग़्मूम सी शर्त अम्माँ से कहिए कहानी नई एक अपनी सी लड़की से है दोस्ती घर सजाने का उस को बड़ा शौक़ है फ़िल्म का और गाने का भी ज़ौक़ है सब से मिलने की ज़हमत उठाती नहीं ऐरे-ग़ैरे को ख़ातिर में लाती नहीं चार फूलों से गुलशन में अपने बहार चार फूलों पे सारी बहारें निसार चार फ़ित्ने नहीं हैं ये हैं चार यार इन से अपने उफ़ुक़ को लगे चार चाँद इन की किरनों से जग में उजाला रहे इन का हर बज़्म में बोल-बाला रहे

Aale Ahmad Suroor

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गो रात की जबीं से सियाही न धुल सकी लेकिन मिरा चराग़ बराबर जला किया जिस से दिलों में अब भी हरारत की है नुमूद बरसों मिरी लहद से वो शो'ला उठा किया फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया मेरे लहू की बूँद में ग़लताँ थीं बिजलियाँ ख़ाक-ए-दकन को मैं ने शरर-आश्ना किया साहिल की आँख में मगर आई न कुछ कमी दरिया में लाख लाख तलातुम हुआ किया ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया ये बज़्म ऐसी सोई कि जागी न आज तक फ़ितरत का कारवाँ है कि आगे बढ़ा किया मारा हुआ हूँ गो ख़लिश-ए-इंतिज़ार का मुश्ताक़ आज भी हूँ पयाम-ए-बहार का

Aale Ahmad Suroor

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नंबर एक बड़ा ही नेक खाए केक पिए मिल्क-शेक नंबर दो कहे को रो मंगाओ को को पिलाओ सब को मुझे भी दो मुझे भी दो नंबर तीन बड़ी मिस्कीन पहने मारकीन बजाए बीन जाए चीन नंबर चार बड़ी होशियार अभी फुलवार अभी तलवार हमारी यार हमारी यार

Aale Ahmad Suroor

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यूँँ तो बच्चे और भी हैं लम्बे और चौकोर भी हैं उर्फ़ी की क्या बात भाई उर्फ़ी की क्या बात काले बादल आएँगे साथ में बारिश लाएँगे बरसेगी बरसात भाई बरसेगी बरसात उर्फ़ी की क्या बात भाई उर्फ़ी की क्या बात

Aale Ahmad Suroor

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ये नई पौद अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ रा'द है तूफ़ान है आतिश-फ़िशाँ खेलने में जोश पढ़ने में ख़रोश हरकतों से इन की उड़ जाते हैं होश नाश्ते की मेज़ पर छीन और झपट फेंक दें चमचे रकाबी दें उलट और फिर तय्यारियाँ स्कूल की शामत आए मेज़ की स्टूल की ये गए और जैसे तूफ़ान थम गया एक सन्नाटा हवा में थम गया शाम को आते ही नौकर पर ख़फ़ा आज अण्डा है न मुर्ग़ी खाएँ क्या दाल में गर घी नहीं तो है इताब गर पसंदे कम पड़ें तो हैं कबाब फ़िक्र उन के पेट भरने की करो और फिर स्कूल के क़िस्से सुनो आज मोटे मास्टर चकरा गए उठते ही दीवार से टकरा गए बोर्ड पर जो कल लिखा था मिट गया एक बड़ा शैतान लड़का पिट गया मुश्किल अंग्रेज़ी है हिन्दी बोर है ये पड़ोसी का भतीजा चोर है लड़कियों के मदरसे की क्या है बात रोज़ रस्ते में नई इक वारदात बस में इक टीचर का टख़ना मुड़ गया एक लड़की का दुपट्टा उड़ गया एक उस्तानी की हैं छे उँगलियाँ उम्र में हैं उन से कम उन के मियाँ हर तरफ़ गूँजी हुई आवाज़ है वाह क्या संगीत है क्या साज़ है कोई ख़रगोशों को दौड़ाता फिरे कोई फ़िल्मी गीत ही गाता फिरे हैं बहन बैठी हुई इस ताक में भाई से कैसे खिलौना छीन लें फ़र्ज़ मामा का कहानी भी सुनाएँ ख़ुद भी जागें दूसरों को भी जगाएँ क्या मजाल उस वक़्त तक ये सो सकें जब तलक अम्मी की घुड़की सुन न लें

Aale Ahmad Suroor

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