गो रात की जबीं से सियाही न धुल सकी लेकिन मिरा चराग़ बराबर जला किया जिस से दिलों में अब भी हरारत की है नुमूद बरसों मिरी लहद से वो शो'ला उठा किया फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया मेरे लहू की बूँद में ग़लताँ थीं बिजलियाँ ख़ाक-ए-दकन को मैं ने शरर-आश्ना किया साहिल की आँख में मगर आई न कुछ कमी दरिया में लाख लाख तलातुम हुआ किया ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया ये बज़्म ऐसी सोई कि जागी न आज तक फ़ितरत का कारवाँ है कि आगे बढ़ा किया मारा हुआ हूँ गो ख़लिश-ए-इंतिज़ार का मुश्ताक़ आज भी हूँ पयाम-ए-बहार का
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती
Tehzeeb Hafi
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यूँँ तो बच्चे और भी हैं लम्बे और चौकोर भी हैं उर्फ़ी की क्या बात भाई उर्फ़ी की क्या बात काले बादल आएँगे साथ में बारिश लाएँगे बरसेगी बरसात भाई बरसेगी बरसात उर्फ़ी की क्या बात भाई उर्फ़ी की क्या बात
Aale Ahmad Suroor
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नंबर एक बड़ा ही नेक खाए केक पिए मिल्क-शेक नंबर दो कहे को रो मंगाओ को को पिलाओ सब को मुझे भी दो मुझे भी दो नंबर तीन बड़ी मिस्कीन पहने मारकीन बजाए बीन जाए चीन नंबर चार बड़ी होशियार अभी फुलवार अभी तलवार हमारी यार हमारी यार
Aale Ahmad Suroor
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तीन फ़ित्नों का क़िस्सा पुराना हुआ चार फ़ित्नों का सुनिए ज़रा माजरा एक लम्बे हैं आलिम भी फ़ाज़िल भी हैं सच तो ये है कि थोड़े से काहिल भी हैं शे'र का शौक़ भी इल्म का ज़ौक़ भी और गले में अलीगढ़ का है तौक़ भी मुर्ग़-ओ-माही की रग रग से ये आश्ना दोस्तों पर फ़िदा और घर से जुदा खाने पीने का कोई नहीं है निज़ाम तीर तिक्के पे चलता है सब इन का काम दूसरी जो हैं पढ़ने में गो तेज़ हैं उन को देखो तो बिल्कुल ही अंग्रेज़ हैं रास आया है लिखने का चक्कर उन्हें मिलते रहते हैं इनआ'म अक्सर उन्हें हैं नफ़ासत-पसंद और ख़ल्वत-पसंद दोस्ती में भी रहती हैं कुछ बंद बंद बोलती हैं तो लफ़्ज़ों का ग़ाएब सिरा जुमला उन का अधूरा ही पल्ले पड़ा तीसरी तेज़ है और हर फ़न में ताक़ हर घड़ी दिल-लगी क़हक़हे और मज़ाक़ पढ़ती लिखती भी है और गाती भी है अपनी बातों से सब को लुभाती भी है वहम ये है कि हैं दाँत मेरे बड़े मुझ से पूछो तो लगते हैं मोती जड़े सुब्ह को रोज़ अख़बार पढ़ती है ये भाई बहनों से फिर जा के लड़ती है ये और छोटी है गुड़िया सी मासूम सी कुछ तो संजीदा सी थोड़ी मग़्मूम सी शर्त अम्माँ से कहिए कहानी नई एक अपनी सी लड़की से है दोस्ती घर सजाने का उस को बड़ा शौक़ है फ़िल्म का और गाने का भी ज़ौक़ है सब से मिलने की ज़हमत उठाती नहीं ऐरे-ग़ैरे को ख़ातिर में लाती नहीं चार फूलों से गुलशन में अपने बहार चार फूलों पे सारी बहारें निसार चार फ़ित्ने नहीं हैं ये हैं चार यार इन से अपने उफ़ुक़ को लगे चार चाँद इन की किरनों से जग में उजाला रहे इन का हर बज़्म में बोल-बाला रहे
Aale Ahmad Suroor
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ये नई पौद अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ रा'द है तूफ़ान है आतिश-फ़िशाँ खेलने में जोश पढ़ने में ख़रोश हरकतों से इन की उड़ जाते हैं होश नाश्ते की मेज़ पर छीन और झपट फेंक दें चमचे रकाबी दें उलट और फिर तय्यारियाँ स्कूल की शामत आए मेज़ की स्टूल की ये गए और जैसे तूफ़ान थम गया एक सन्नाटा हवा में थम गया शाम को आते ही नौकर पर ख़फ़ा आज अण्डा है न मुर्ग़ी खाएँ क्या दाल में गर घी नहीं तो है इताब गर पसंदे कम पड़ें तो हैं कबाब फ़िक्र उन के पेट भरने की करो और फिर स्कूल के क़िस्से सुनो आज मोटे मास्टर चकरा गए उठते ही दीवार से टकरा गए बोर्ड पर जो कल लिखा था मिट गया एक बड़ा शैतान लड़का पिट गया मुश्किल अंग्रेज़ी है हिन्दी बोर है ये पड़ोसी का भतीजा चोर है लड़कियों के मदरसे की क्या है बात रोज़ रस्ते में नई इक वारदात बस में इक टीचर का टख़ना मुड़ गया एक लड़की का दुपट्टा उड़ गया एक उस्तानी की हैं छे उँगलियाँ उम्र में हैं उन से कम उन के मियाँ हर तरफ़ गूँजी हुई आवाज़ है वाह क्या संगीत है क्या साज़ है कोई ख़रगोशों को दौड़ाता फिरे कोई फ़िल्मी गीत ही गाता फिरे हैं बहन बैठी हुई इस ताक में भाई से कैसे खिलौना छीन लें फ़र्ज़ मामा का कहानी भी सुनाएँ ख़ुद भी जागें दूसरों को भी जगाएँ क्या मजाल उस वक़्त तक ये सो सकें जब तलक अम्मी की घुड़की सुन न लें
Aale Ahmad Suroor
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मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी सारे घर में चाँदनी फैलाएगी हर नज़र में रौशनी आ जाएगी हूर-ए-जन्नत से निछावर लाएगी मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी बाप के दिल की कली खिल जाएगी माँ की नज़रों में जवानी आएगी और वो ता'लीम आ'ला पाएगी उस की शादी की घड़ी फिर आएगी मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी
Aale Ahmad Suroor
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