nazmKuch Alfaaz

यूँँ तो बच्चे और भी हैं लम्बे और चौकोर भी हैं उर्फ़ी की क्या बात भाई उर्फ़ी की क्या बात काले बादल आएँगे साथ में बारिश लाएँगे बरसेगी बरसात भाई बरसेगी बरसात उर्फ़ी की क्या बात भाई उर्फ़ी की क्या बात

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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गो रात की जबीं से सियाही न धुल सकी लेकिन मिरा चराग़ बराबर जला किया जिस से दिलों में अब भी हरारत की है नुमूद बरसों मिरी लहद से वो शो'ला उठा किया फीका है जिस के सामने अक्स-ए-जमाल-ए-यार अज़्म-ए-जवाँ को मैं ने वो ग़ाज़ा अता किया मेरे लहू की बूँद में ग़लताँ थीं बिजलियाँ ख़ाक-ए-दकन को मैं ने शरर-आश्ना किया साहिल की आँख में मगर आई न कुछ कमी दरिया में लाख लाख तलातुम हुआ किया ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया ये बज़्म ऐसी सोई कि जागी न आज तक फ़ितरत का कारवाँ है कि आगे बढ़ा किया मारा हुआ हूँ गो ख़लिश-ए-इंतिज़ार का मुश्ताक़ आज भी हूँ पयाम-ए-बहार का

Aale Ahmad Suroor

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तीन फ़ित्नों का क़िस्सा पुराना हुआ चार फ़ित्नों का सुनिए ज़रा माजरा एक लम्बे हैं आलिम भी फ़ाज़िल भी हैं सच तो ये है कि थोड़े से काहिल भी हैं शे'र का शौक़ भी इल्म का ज़ौक़ भी और गले में अलीगढ़ का है तौक़ भी मुर्ग़-ओ-माही की रग रग से ये आश्ना दोस्तों पर फ़िदा और घर से जुदा खाने पीने का कोई नहीं है निज़ाम तीर तिक्के पे चलता है सब इन का काम दूसरी जो हैं पढ़ने में गो तेज़ हैं उन को देखो तो बिल्कुल ही अंग्रेज़ हैं रास आया है लिखने का चक्कर उन्हें मिलते रहते हैं इनआ'म अक्सर उन्हें हैं नफ़ासत-पसंद और ख़ल्वत-पसंद दोस्ती में भी रहती हैं कुछ बंद बंद बोलती हैं तो लफ़्ज़ों का ग़ाएब सिरा जुमला उन का अधूरा ही पल्ले पड़ा तीसरी तेज़ है और हर फ़न में ताक़ हर घड़ी दिल-लगी क़हक़हे और मज़ाक़ पढ़ती लिखती भी है और गाती भी है अपनी बातों से सब को लुभाती भी है वहम ये है कि हैं दाँत मेरे बड़े मुझ से पूछो तो लगते हैं मोती जड़े सुब्ह को रोज़ अख़बार पढ़ती है ये भाई बहनों से फिर जा के लड़ती है ये और छोटी है गुड़िया सी मासूम सी कुछ तो संजीदा सी थोड़ी मग़्मूम सी शर्त अम्माँ से कहिए कहानी नई एक अपनी सी लड़की से है दोस्ती घर सजाने का उस को बड़ा शौक़ है फ़िल्म का और गाने का भी ज़ौक़ है सब से मिलने की ज़हमत उठाती नहीं ऐरे-ग़ैरे को ख़ातिर में लाती नहीं चार फूलों से गुलशन में अपने बहार चार फूलों पे सारी बहारें निसार चार फ़ित्ने नहीं हैं ये हैं चार यार इन से अपने उफ़ुक़ को लगे चार चाँद इन की किरनों से जग में उजाला रहे इन का हर बज़्म में बोल-बाला रहे

Aale Ahmad Suroor

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ये नई पौद अल-हफ़ीज़-ओ-अल-अमाँ रा'द है तूफ़ान है आतिश-फ़िशाँ खेलने में जोश पढ़ने में ख़रोश हरकतों से इन की उड़ जाते हैं होश नाश्ते की मेज़ पर छीन और झपट फेंक दें चमचे रकाबी दें उलट और फिर तय्यारियाँ स्कूल की शामत आए मेज़ की स्टूल की ये गए और जैसे तूफ़ान थम गया एक सन्नाटा हवा में थम गया शाम को आते ही नौकर पर ख़फ़ा आज अण्डा है न मुर्ग़ी खाएँ क्या दाल में गर घी नहीं तो है इताब गर पसंदे कम पड़ें तो हैं कबाब फ़िक्र उन के पेट भरने की करो और फिर स्कूल के क़िस्से सुनो आज मोटे मास्टर चकरा गए उठते ही दीवार से टकरा गए बोर्ड पर जो कल लिखा था मिट गया एक बड़ा शैतान लड़का पिट गया मुश्किल अंग्रेज़ी है हिन्दी बोर है ये पड़ोसी का भतीजा चोर है लड़कियों के मदरसे की क्या है बात रोज़ रस्ते में नई इक वारदात बस में इक टीचर का टख़ना मुड़ गया एक लड़की का दुपट्टा उड़ गया एक उस्तानी की हैं छे उँगलियाँ उम्र में हैं उन से कम उन के मियाँ हर तरफ़ गूँजी हुई आवाज़ है वाह क्या संगीत है क्या साज़ है कोई ख़रगोशों को दौड़ाता फिरे कोई फ़िल्मी गीत ही गाता फिरे हैं बहन बैठी हुई इस ताक में भाई से कैसे खिलौना छीन लें फ़र्ज़ मामा का कहानी भी सुनाएँ ख़ुद भी जागें दूसरों को भी जगाएँ क्या मजाल उस वक़्त तक ये सो सकें जब तलक अम्मी की घुड़की सुन न लें

Aale Ahmad Suroor

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नंबर एक बड़ा ही नेक खाए केक पिए मिल्क-शेक नंबर दो कहे को रो मंगाओ को को पिलाओ सब को मुझे भी दो मुझे भी दो नंबर तीन बड़ी मिस्कीन पहने मारकीन बजाए बीन जाए चीन नंबर चार बड़ी होशियार अभी फुलवार अभी तलवार हमारी यार हमारी यार

Aale Ahmad Suroor

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मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी सारे घर में चाँदनी फैलाएगी हर नज़र में रौशनी आ जाएगी हूर-ए-जन्नत से निछावर लाएगी मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी बाप के दिल की कली खिल जाएगी माँ की नज़रों में जवानी आएगी और वो ता'लीम आ'ला पाएगी उस की शादी की घड़ी फिर आएगी मेरी बेटी जब बड़ी हो जाएगी

Aale Ahmad Suroor

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