nazmKuch Alfaaz

"बेबसी" मोहब्बत की मेरी देखो बेबसी कितनी है किसी कटते हुए पेड़ की टहनियों जितनी हैं उस की ज़ुल्फ़ आन पड़ी है चेहरे पर और मैं हूँ कि उन्हें हटा नहीं पा रहा जले जा रहा हूँ आतिश-ए-मोहब्बत में उस की क्या सितम है कि उसे कुछ बता नहीं पा रहा वो सामने आ कर खड़ी हो भी जाए अगर सामने उस के मैं चला भी जाऊँ मगर नफ़स रुक जाएगी ज़बाँ कुछ न कह पाएगी आगे बढ़ाएगी वो हाथ मिलाने को बहती हुई एक महक आएगी मैं तर जाऊँगा गल जाऊँगा मर जाऊँगा छू लिया जो उसे एक बार या-रब तो फिर कैसे मैं घर जाऊँगा

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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"एक लड़की" राह-ए-आम पे चलती वो एक तन्हा लड़की हज़ारों आँखें जिस की ग़फ़लत की ताक में हैं हज़ारों हाथ उसे छूने की कोशिश में बढ़ते हैं हर दिन हर दिन वो हाथ काटे जाते हैं नए दिन नए हाथों से बदले जाते हैं तन्हा होकर भी तन्हाई नहीं हासिल उसे अपनी आह की भी सुनवाई नहीं हासिल उसे किसी ग़ज़ाल सी घूमती ये मासूम लड़की जिस पे ध्यान है पूरे जंगल का जंगल के वहशी समाँ का हवा का अब्र का आसमाँ का सब इसे चाहते हैं ये लड़की सब को चाहिए पर इसे क्या चाहिए क्या चाहिए इसे चाहिए एक पाक कोशिश जिस में जिस्म की हवस न हो चाहिए वो आँखें जो देखे सितारे उस की आँखों के वो आँखें जो देख सके दुनिया वैसे जिस तरह उस की अपनी आँखें देखती हैं जो पहचाने उस में छुपी हुई उस छोटी सी शरारत भरी बच्ची को जिसे दुनिया की घूरती डराती नज़रों ने वक़्त से पहले बड़ा कर दिया उसे चाहिए वो आँखें जो उसे छाँव दे अमान दे, रज़ा दे, वजह दे, रंग दे, ख़्वाब दे, सवाब दे और तसल्ली दे उस के बेबाकपन को बेबाक रहने की हिफ़ाज़ती एहसास दे कि कोई अपना देख रहा है इस गहराते अँधेरे में पर्दा दे दुनिया की नाजायज़ बसीरत से बेसूद बातों से तानों से तोहमतों से उसे चाहिए वो दिल जो खनकने दे उस की पायल उस के झूमके उस के कंगन जिस तौर भी वो खनकना चाहते हैं चमकने दे उस के पैरहन जिस तौर भी वो चमकना चाहते हैं जो आज़ाद रक्खे उस के होंठों की लाली उस की आँखों का मस्कारा उस के नाख़ूनों के ख़द-ओ-ख़ाल को वो हो तो उस के शाद बदन में झिझक न हो किसी सवालात को ले कर किसी हालात को ले कर वो आँखें जो उसे वो आज़ादी दे सके जो रुकी पड़ी है जाने कितनी सदियों से कितने समाजों से उसे चाहिए वो शख़्स जो बाँटे वो राज़ जो सिर्फ़ उस के दर-ओ-दीवार जानते हैं वो राज़ जिस सेे खेलते हैं उस के ख़यालात तो उस में एक अलग हुनर आता है नक्श-कार का जो एक नई दुनिया बनाती है एक मुकम्मल परिवार बनाती है उसे ख़्वाहिश है उस हाथ की जो उस का बदन छूने से पहले उस की रूह से तज़्किरा करे उस के बाल-ओ-पर सँवारे वो ज़ेहन जो उठाए उस की मर्ज़ियाँ उस की नादानियाँ उस की आसूदगी उस की अफ़सुर्दगी वो ठोकर खाए गिरे तो वो हाथ उस का सहारा बने वो खिलकर उड़े तो परवाज़ दे उसे वो सोए तो उस के सोते चेहरे पे पड़ती ज़ुल्फ़ का एहतियात करे रुख़्सार सहलाए और चूम के पेशानी इस्तिकबाल करे उस की मासूमियत का उस के भरोसे का उसे ख़्वाहिश है उस रूह की जो उस की रूह को पूरा करे सवेरा करे उस के ख़्वाबों का और ज़्यादा कुछ न हो पाए अगर तो कम अज़ कम उस का उस के वजूद उस के यक़ीन उस की क़ुर्बानियों का लिहाज़ करे

Chetan Verma

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"दीद-ए-यार" उतरी ज़ुल्फ़ें यकायक यूँँ लहराती हुई जिस्म पर उस के जैसे रात ने अँधेरे का दरिया खोला हो साहिल पर कहाँ तक बचाता मैं नज़रें अपनी कि हर तरफ़ वो था अक्स था उस का कि हर साँस में ख़ुशबू थी उस की हर आवाज़ में हँसती वो रही वो दरख़्त जो छुए उस ने चलने लगे वो दरिया जो छुआ सागर से पिया न गया वो बैठा जिस डगर मंज़िल हो गई मुसाफ़िरों की वो जब सोया रात हो गई दिन दो-पहरी तितलियों ने रंग बदल दिए उस की हँसी पर फूल उस. की ख़ुशबू से महकने लगे मेरी सारी हक़ीक़तें बदल दी उस ने मेरे सारे अरमाँ अपने नाम कर दिए मैं रहा नहीं वो जिसे सुब्ह आईने में देख कर आया था अब मैं कोई और था और था किसी और का

Chetan Verma

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तुम आ जाना माने जो कभी दिल तेरा तो आ जाना फिर से उस मंज़िल पर जिस को रस्ता समझा था मैं ने उन रस्तों पर जो बह गए हैं मजबूरियों के सैलाब में कहीं आ जाना उन सियाही रातों में जो ज़िंदा थीं नाचते मोर सी आ जाना उन बाग़ों में जहाँ ख़ुशबू अब भी तेरी हँसी की है जहाँ दमकता है अंश तेरा एक सूक्ष्म सूरज सा आ जाना मेरी बाहों में जो लाश सी बिछी रहती हैं तेरी याद में मेरा सीना जो धड़कता तो है पर मायूस है सर्द रात सा मेरी आँखें जो देखना भूल रही हैं धीमे-धी में सजाए हुए आँसू जिन में प्रतिबिम्ब तेरे हँसते साए का है आ जाना उस झील किनारे जिसे प्यास है तेरे छलकते नंगे पैरों की आ जाना उस चाँद तले जो कभी फिर से वैसा रौशन न हुआ उस चाँदनी में जो छाई नहीं उन रातों की तरह फिर कभी आ जाना उस दहलीज़ जिसे अपना बनाने की ख़्वाहिश रखी थी तुम ने वो दहलीज़ जिस ने सिर्फ़ तुम्हें अपना माना है आ जाना उस उजाड़ कमरे में जो बा'द तेरे सजाया न गया उस खिड़की जो अब भी मायूस है तेरे हिज्र में चादर जो भूली नहीं है तेरी छुअन आ जाना दुनिया के उस आख़िरी कोने में जिस में सिर्फ़ हम थे इश्क़ था हमारा हम रहेंगे और इश्क़ रहेगा हमारा आ जाना तुम बस आ जाना आख़िरी पल तक काएनात के मुझे इंतिज़ार रहेगा तुम बस आ जाना

Chetan Verma

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