nazmKuch Alfaaz

"दीद-ए-यार" उतरी ज़ुल्फ़ें यकायक यूँँ लहराती हुई जिस्म पर उस के जैसे रात ने अँधेरे का दरिया खोला हो साहिल पर कहाँ तक बचाता मैं नज़रें अपनी कि हर तरफ़ वो था अक्स था उस का कि हर साँस में ख़ुशबू थी उस की हर आवाज़ में हँसती वो रही वो दरख़्त जो छुए उस ने चलने लगे वो दरिया जो छुआ सागर से पिया न गया वो बैठा जिस डगर मंज़िल हो गई मुसाफ़िरों की वो जब सोया रात हो गई दिन दो-पहरी तितलियों ने रंग बदल दिए उस की हँसी पर फूल उस. की ख़ुशबू से महकने लगे मेरी सारी हक़ीक़तें बदल दी उस ने मेरे सारे अरमाँ अपने नाम कर दिए मैं रहा नहीं वो जिसे सुब्ह आईने में देख कर आया था अब मैं कोई और था और था किसी और का

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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आज बहुत फ़ुर्सत में हूँ तेरे ख़त जलाने बैठा हूँ सोचा पढ़ लूँ आख़िरी दफ़ा मैं फिर मुहब्बत कर बैठा हूँ सोचा था क़लम छोड़ दूँगा मैं फिर ग़ज़ल लिख बैठा हूँ झुमके, कंगन, बालियाँ, बिंदी मैं फिर हसरतें लिए बैठा हूँ मैं ख़ुश हूँ बस यूँँही आज भूलना था, याद लिए बैठा हूँ ख़्वाहिशें जो रही अधूरी अब तक पूरी हों यही आस लिए बैठा हूँ तुझे आज़ाद कर चुका हूँ कब से बस ख़ुद को क़ैद किए बैठा हूँ

Prashant Shakun

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"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा

Danish Balliavi

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"तस्वीर-कशी" जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़ अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है इक रोज़ इसे यूँँ ही कहीं छेड़ दिया था ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है

Dharmesh bashar

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"बेबसी" मोहब्बत की मेरी देखो बेबसी कितनी है किसी कटते हुए पेड़ की टहनियों जितनी हैं उस की ज़ुल्फ़ आन पड़ी है चेहरे पर और मैं हूँ कि उन्हें हटा नहीं पा रहा जले जा रहा हूँ आतिश-ए-मोहब्बत में उस की क्या सितम है कि उसे कुछ बता नहीं पा रहा वो सामने आ कर खड़ी हो भी जाए अगर सामने उस के मैं चला भी जाऊँ मगर नफ़स रुक जाएगी ज़बाँ कुछ न कह पाएगी आगे बढ़ाएगी वो हाथ मिलाने को बहती हुई एक महक आएगी मैं तर जाऊँगा गल जाऊँगा मर जाऊँगा छू लिया जो उसे एक बार या-रब तो फिर कैसे मैं घर जाऊँगा

Chetan Verma

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तुम आ जाना माने जो कभी दिल तेरा तो आ जाना फिर से उस मंज़िल पर जिस को रस्ता समझा था मैं ने उन रस्तों पर जो बह गए हैं मजबूरियों के सैलाब में कहीं आ जाना उन सियाही रातों में जो ज़िंदा थीं नाचते मोर सी आ जाना उन बाग़ों में जहाँ ख़ुशबू अब भी तेरी हँसी की है जहाँ दमकता है अंश तेरा एक सूक्ष्म सूरज सा आ जाना मेरी बाहों में जो लाश सी बिछी रहती हैं तेरी याद में मेरा सीना जो धड़कता तो है पर मायूस है सर्द रात सा मेरी आँखें जो देखना भूल रही हैं धीमे-धी में सजाए हुए आँसू जिन में प्रतिबिम्ब तेरे हँसते साए का है आ जाना उस झील किनारे जिसे प्यास है तेरे छलकते नंगे पैरों की आ जाना उस चाँद तले जो कभी फिर से वैसा रौशन न हुआ उस चाँदनी में जो छाई नहीं उन रातों की तरह फिर कभी आ जाना उस दहलीज़ जिसे अपना बनाने की ख़्वाहिश रखी थी तुम ने वो दहलीज़ जिस ने सिर्फ़ तुम्हें अपना माना है आ जाना उस उजाड़ कमरे में जो बा'द तेरे सजाया न गया उस खिड़की जो अब भी मायूस है तेरे हिज्र में चादर जो भूली नहीं है तेरी छुअन आ जाना दुनिया के उस आख़िरी कोने में जिस में सिर्फ़ हम थे इश्क़ था हमारा हम रहेंगे और इश्क़ रहेगा हमारा आ जाना तुम बस आ जाना आख़िरी पल तक काएनात के मुझे इंतिज़ार रहेगा तुम बस आ जाना

Chetan Verma

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"एक लड़की" राह-ए-आम पे चलती वो एक तन्हा लड़की हज़ारों आँखें जिस की ग़फ़लत की ताक में हैं हज़ारों हाथ उसे छूने की कोशिश में बढ़ते हैं हर दिन हर दिन वो हाथ काटे जाते हैं नए दिन नए हाथों से बदले जाते हैं तन्हा होकर भी तन्हाई नहीं हासिल उसे अपनी आह की भी सुनवाई नहीं हासिल उसे किसी ग़ज़ाल सी घूमती ये मासूम लड़की जिस पे ध्यान है पूरे जंगल का जंगल के वहशी समाँ का हवा का अब्र का आसमाँ का सब इसे चाहते हैं ये लड़की सब को चाहिए पर इसे क्या चाहिए क्या चाहिए इसे चाहिए एक पाक कोशिश जिस में जिस्म की हवस न हो चाहिए वो आँखें जो देखे सितारे उस की आँखों के वो आँखें जो देख सके दुनिया वैसे जिस तरह उस की अपनी आँखें देखती हैं जो पहचाने उस में छुपी हुई उस छोटी सी शरारत भरी बच्ची को जिसे दुनिया की घूरती डराती नज़रों ने वक़्त से पहले बड़ा कर दिया उसे चाहिए वो आँखें जो उसे छाँव दे अमान दे, रज़ा दे, वजह दे, रंग दे, ख़्वाब दे, सवाब दे और तसल्ली दे उस के बेबाकपन को बेबाक रहने की हिफ़ाज़ती एहसास दे कि कोई अपना देख रहा है इस गहराते अँधेरे में पर्दा दे दुनिया की नाजायज़ बसीरत से बेसूद बातों से तानों से तोहमतों से उसे चाहिए वो दिल जो खनकने दे उस की पायल उस के झूमके उस के कंगन जिस तौर भी वो खनकना चाहते हैं चमकने दे उस के पैरहन जिस तौर भी वो चमकना चाहते हैं जो आज़ाद रक्खे उस के होंठों की लाली उस की आँखों का मस्कारा उस के नाख़ूनों के ख़द-ओ-ख़ाल को वो हो तो उस के शाद बदन में झिझक न हो किसी सवालात को ले कर किसी हालात को ले कर वो आँखें जो उसे वो आज़ादी दे सके जो रुकी पड़ी है जाने कितनी सदियों से कितने समाजों से उसे चाहिए वो शख़्स जो बाँटे वो राज़ जो सिर्फ़ उस के दर-ओ-दीवार जानते हैं वो राज़ जिस सेे खेलते हैं उस के ख़यालात तो उस में एक अलग हुनर आता है नक्श-कार का जो एक नई दुनिया बनाती है एक मुकम्मल परिवार बनाती है उसे ख़्वाहिश है उस हाथ की जो उस का बदन छूने से पहले उस की रूह से तज़्किरा करे उस के बाल-ओ-पर सँवारे वो ज़ेहन जो उठाए उस की मर्ज़ियाँ उस की नादानियाँ उस की आसूदगी उस की अफ़सुर्दगी वो ठोकर खाए गिरे तो वो हाथ उस का सहारा बने वो खिलकर उड़े तो परवाज़ दे उसे वो सोए तो उस के सोते चेहरे पे पड़ती ज़ुल्फ़ का एहतियात करे रुख़्सार सहलाए और चूम के पेशानी इस्तिकबाल करे उस की मासूमियत का उस के भरोसे का उसे ख़्वाहिश है उस रूह की जो उस की रूह को पूरा करे सवेरा करे उस के ख़्वाबों का और ज़्यादा कुछ न हो पाए अगर तो कम अज़ कम उस का उस के वजूद उस के यक़ीन उस की क़ुर्बानियों का लिहाज़ करे

Chetan Verma

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