"ज़िंदगी के रंग" मुझे ज़िंदगी से गिला नहीं मुझे आशिक़ी से गिला नहीं मुझे सादगी से गिला नहीं मुझे बेख़ुदी से गिला नहीं मुझे कहकशाॅं से गिला नहीं मुझे आसमाॅं से गिला नहीं मुझे बस फ़क़त ये गिला रहा मुझे हर ख़ुशी से गिला रहा तेरी जुस्तुजु से मैं डर गया मैं गुज़र गया, मैं बिखर गया मेरा हाल कैसा ये हाल है मैं तो इश्क़ इश्क़ में मर गया तेरी यादें मुझ को सता रहीं मेरी धड़कनों को बढ़ा रहीं मैं कहाॅं हूँ मुझ को ख़बर नहीं ये उदासियाॅं मुझे खा रहीं
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मुहब्बत" मुहब्बत वो कि जिस को भी मिले सुलतान हो जाए मुहब्बत बिन हमारी ज़िंदगी वीरान हो जाए मुहब्बत है तो मुमकिन है ज़माना है फ़साना है मुहब्बत का नगर तो आशिकों का कारख़ाना है मुहब्बत राज है दिल का मुहब्बत राजधानी है मुहब्बत के बिना तो शहर भर में ना-तवानी है मुहब्बत है तो दुनिया है मुहब्बत है तो हम तुम हैं मुहब्बत की बदौलत ही चमकते सारे अंजुम हैं मुहब्बत क़ीमती शय है बड़ी मुश्किल से होती है मुहब्बत माफ़ करती है अगर क़ातिल से होती है मुहब्बत तो भरोसा है मुहब्बत ही सख़ावत है मुहब्बत आँख की ठंडक मुहब्बत रब की रहमत है
Hameed Sarwar Bahraichi
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"प्यार की निशानी" इक निशानी पल रही है प्यार की और क्या ख़्वाहिश करूँ संसार की एक नन्हीं जान मेरे दिल में है शुक्रिया करती रहूॅं मैं यार की और क्या ख़्वाहिश करूँ संसार की अपने हाथों से उसे सहला रही मन ही मन ख़ुश हो रही और गा रही है ख़ुशी इस बात की मेरे ख़ुदा हो न पाएँगे कभी अब हम जुदा ये जो मेरी कोख में है पल रहा मिल रही है हर ख़ुशी दिलदार की और क्या ख़्वाहिश करूँ संसार की
Hameed Sarwar Bahraichi
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नज़्म- अजनबी महबूबा हम तुझे जानते न थे पहले तुझ को पहचानते न थे पहले आज तुझ को जो जान पाए हैं मेरे अश'आर जगमगाए हैं तू कोई आन बान वाली है तू हसीनों में शान वाली है तू समुंदर सा गहरा पानी है तेरे होने से सब कहानी है तू मिला है मुझे मनाने से आज मैं ख़ुश हूँ तेरे आने से तुझ को मैं रास्ता अगर कह दूँ तुझ को जीने का गर हुनर कह दूँ तुझ को अपनी मता-ए-जाॅं कह दूँ तुझ को अपना मैं हमनवा कह दूँ मेरा तुझ सेे ही राब्ता है अब सदियों सदियों का वास्ता है अब दूर मैं तुझ सेे अब किधर जाऊॅं तुझ को मैं देख कर सॅंवर जाऊॅं मुझ को साया भी तेरा भाता है रात दिन तू ही याद आता है तेरे होने से मुयस्सर है सुकूॅं बिन तेरे मैं तो कहीं भी न रहूॅं हो के अनजान अब नहीं जीना बिन तेरे जान अब नहीं जीना तुम पे सब कुछ मैं आज हारा हूँ तुम मेरे और मैं तुम्हारा हूँ
Hameed Sarwar Bahraichi
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"हमारा गाँव" सुनो अपने मैं तेलिया गाँव का क़िस्सा सुनाता हूँ तुम्हें लफ्ज़ों में अपने आज बहराइच दिखाता हूँ जहाँ पर सड़कें कच्ची हैं, जहाँ हर सम्त ग़ुरबत है जहाँ पर आज भी लोगों को शिक्षा की ज़रूरत है जहाँ के लोग पैसों के लिए परदेस जाते हैं वो खा के रूखी सूखी रोटीयाँ पैसे कमाते हैं मगर फिर भी हमारे गाँव के लोगों में उल्फ़त है हमें इस गाँव से हर हाल में बेशक मुहब्बत है मुझे वो खेत, वो बगिया, सभी अब याद आते हैं मैं हूँ लखनऊ में लेकिन मुझे वो सब बुलाते हैं हमारे गाँव से कुछ दूरी पर सरजू निकलती है नहाओ जब भी उस पानी में तो ख़ुशबू निकलती है बताएँ किस क़दर हम धूप में न छाँव में बैठे गए जब भी हम अपने मदरसे तो नाँव में बैठे वो बहता सरजू का पानी हमारा नाँव में होना नज़ारा कितना दिलकश था हमारा गाँव में होना
Hameed Sarwar Bahraichi
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