"मुहब्बत" मुहब्बत वो कि जिस को भी मिले सुलतान हो जाए मुहब्बत बिन हमारी ज़िंदगी वीरान हो जाए मुहब्बत है तो मुमकिन है ज़माना है फ़साना है मुहब्बत का नगर तो आशिकों का कारख़ाना है मुहब्बत राज है दिल का मुहब्बत राजधानी है मुहब्बत के बिना तो शहर भर में ना-तवानी है मुहब्बत है तो दुनिया है मुहब्बत है तो हम तुम हैं मुहब्बत की बदौलत ही चमकते सारे अंजुम हैं मुहब्बत क़ीमती शय है बड़ी मुश्किल से होती है मुहब्बत माफ़ करती है अगर क़ातिल से होती है मुहब्बत तो भरोसा है मुहब्बत ही सख़ावत है मुहब्बत आँख की ठंडक मुहब्बत रब की रहमत है
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"ज़िंदगी के रंग" मुझे ज़िंदगी से गिला नहीं मुझे आशिक़ी से गिला नहीं मुझे सादगी से गिला नहीं मुझे बेख़ुदी से गिला नहीं मुझे कहकशाॅं से गिला नहीं मुझे आसमाॅं से गिला नहीं मुझे बस फ़क़त ये गिला रहा मुझे हर ख़ुशी से गिला रहा तेरी जुस्तुजु से मैं डर गया मैं गुज़र गया, मैं बिखर गया मेरा हाल कैसा ये हाल है मैं तो इश्क़ इश्क़ में मर गया तेरी यादें मुझ को सता रहीं मेरी धड़कनों को बढ़ा रहीं मैं कहाॅं हूँ मुझ को ख़बर नहीं ये उदासियाॅं मुझे खा रहीं
Hameed Sarwar Bahraichi
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नज़्म- अजनबी महबूबा हम तुझे जानते न थे पहले तुझ को पहचानते न थे पहले आज तुझ को जो जान पाए हैं मेरे अश'आर जगमगाए हैं तू कोई आन बान वाली है तू हसीनों में शान वाली है तू समुंदर सा गहरा पानी है तेरे होने से सब कहानी है तू मिला है मुझे मनाने से आज मैं ख़ुश हूँ तेरे आने से तुझ को मैं रास्ता अगर कह दूँ तुझ को जीने का गर हुनर कह दूँ तुझ को अपनी मता-ए-जाॅं कह दूँ तुझ को अपना मैं हमनवा कह दूँ मेरा तुझ सेे ही राब्ता है अब सदियों सदियों का वास्ता है अब दूर मैं तुझ सेे अब किधर जाऊॅं तुझ को मैं देख कर सॅंवर जाऊॅं मुझ को साया भी तेरा भाता है रात दिन तू ही याद आता है तेरे होने से मुयस्सर है सुकूॅं बिन तेरे मैं तो कहीं भी न रहूॅं हो के अनजान अब नहीं जीना बिन तेरे जान अब नहीं जीना तुम पे सब कुछ मैं आज हारा हूँ तुम मेरे और मैं तुम्हारा हूँ
Hameed Sarwar Bahraichi
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"हमारा गाँव" सुनो अपने मैं तेलिया गाँव का क़िस्सा सुनाता हूँ तुम्हें लफ्ज़ों में अपने आज बहराइच दिखाता हूँ जहाँ पर सड़कें कच्ची हैं, जहाँ हर सम्त ग़ुरबत है जहाँ पर आज भी लोगों को शिक्षा की ज़रूरत है जहाँ के लोग पैसों के लिए परदेस जाते हैं वो खा के रूखी सूखी रोटीयाँ पैसे कमाते हैं मगर फिर भी हमारे गाँव के लोगों में उल्फ़त है हमें इस गाँव से हर हाल में बेशक मुहब्बत है मुझे वो खेत, वो बगिया, सभी अब याद आते हैं मैं हूँ लखनऊ में लेकिन मुझे वो सब बुलाते हैं हमारे गाँव से कुछ दूरी पर सरजू निकलती है नहाओ जब भी उस पानी में तो ख़ुशबू निकलती है बताएँ किस क़दर हम धूप में न छाँव में बैठे गए जब भी हम अपने मदरसे तो नाँव में बैठे वो बहता सरजू का पानी हमारा नाँव में होना नज़ारा कितना दिलकश था हमारा गाँव में होना
Hameed Sarwar Bahraichi
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"प्यार की निशानी" इक निशानी पल रही है प्यार की और क्या ख़्वाहिश करूँ संसार की एक नन्हीं जान मेरे दिल में है शुक्रिया करती रहूॅं मैं यार की और क्या ख़्वाहिश करूँ संसार की अपने हाथों से उसे सहला रही मन ही मन ख़ुश हो रही और गा रही है ख़ुशी इस बात की मेरे ख़ुदा हो न पाएँगे कभी अब हम जुदा ये जो मेरी कोख में है पल रहा मिल रही है हर ख़ुशी दिलदार की और क्या ख़्वाहिश करूँ संसार की
Hameed Sarwar Bahraichi
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