क्या नग़्मा-हा-ए-कैफ़ का दरिया बहा गया ख़ुद हुस्न को जहाँ में हसीं-तर बना गया ऐ शाइ'र-ए-शबाब-ओ-नवा-संज-ए-ज़िंदगी मिस्ल-ए-बहार आ के तू आलम पे छा गया तू हुस्न की निगाह था और इश्क़ की ज़बाँ गीतों में रंग-ओ-रूप की दुनिया बसा गया रंगीनियाँ बहार की हर सू बिखर गई बे-कैफ़ी-ए-ख़िज़ाँ का कभी रंग छा गया टूटे हुए दिलों की सदा लब पे आ गई नग़्मा कभी तू कैफ़-ओ-मसर्रत का गा गया इंसाँ के ग़म में सीना-ए-क़ुदरत भी शक़ हुआ माँ की तरह से मौत को भी प्यार आ गया अफ़्सुर्दा ज़िंदगी को मिली तुझ से ताज़गी जो दिल तड़प रहा था वो आराम पा गया तू कर के सर-बुलंद वतन के वक़ार को दिल में हर एक फ़र्द-ए-वतन के समा गया हिन्दोस्ताँ को दे के दो-आलम की अज़्मतें तू बे-नवा फ़क़ीर सा गाता चला गया
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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एक रुख़ साज़-ए-दरूँ से जल न उठें जिस्म-ओ-जाँ कहीं रग रग न मेरी फूँक दे क़ल्ब-ए-तपाँ कहीं गुम-सुम हूँ और शश्दर-ओ-हैराँ कुछ इस तरह जैसे कि खो चुका हूँ मैं रूह-ए-रवाँ कहीं उस नाव की तरह हूँ मैं मौजों के रहम पर लंगर हो जिस के टूटे कहीं बादबाँ कहीं या मस्त नाज़ सर्व सा कोई निहाल-ए-सब्ज़ आ जाए ज़िद में बर्क़ की जो ना-गहाँ कहीं या जिस तरह बहार में मुर्ग़-ए-शिकस्ता पर हसरत से देखता हूँ सू-ए-आसमाँ कहीं मग़्लूब इस क़दर हूँ मैं एहसास-ए-ग़म से आज खो जाए सिसकियों में न ये दास्ताँ कहीं बीते दिनों के ख़्वाब हैं आँखों के सामने फ़र्दा का एक ख़ौफ़ है दिल में निहाँ कहीं निकले थे जब वतन से हम अपने ब-हाल-ए-ज़ार मंज़िल का था ख़याल न नाम-ओ-निशाँ कहीं कुछ ऐसी मुंतशिर सी हुई दोस्ती की बज़्म पत्ते बिखेर देती है जैसे ख़िज़ाँ कहीं ज़िंदा है यार सोहबतें बाक़ी मगर कहाँ दीवार खिंच गई है नई दरमियाँ कहीं फ़र्दा पे क्या यक़ीन हो नालाँ हूँ हाल पर माज़ी की सम्त ले चले उम्र-ए-रवाँ कहीं बाद-ए-सबा के शानों पे अमवाज-ए-नूर पर ले जाओ मुझ को दोस्तों के दरमियाँ कहीं या शम्अ'' मेरी यादों की गुल कर दो एक एक तारीक दिल का गोशा न हो ज़ौ-फ़िशाँ कहीं रूदाद-ए-ग़म सुनाते ही यूँँ आई उन की याद मैं हूँ कहीं ख़याल कहीं दास्ताँ कहीं ओझल हैं गो निगाह से दिल से कहीं हैं दूर ज़िक्र-ए-हबीब अब भी है विर्द-ए-ज़बाँ कहीं दूसरा रुख़ क्यूँ इंक़िलाब-ए-दहरस अब मुज़्तरिब है तू देखा है एक हाल पे दौर-ए-ज़माँ कहीं आग़ोश-ए-इंक़लाब में पलना है इर्तिक़ा मर जाएँ घुट के बदलें न गर ये जहाँ कहीं महशर-ब-दामाँ लहजा है दुनिया का एक एक माज़ी के ढूँढ़ता है मगर तू निशाँ कहीं तूफ़ाँ ने बढ़ के क़स्र को क़ैसर के जा लिया रोता है तू कि मेरा नहीं आशियाँ कहीं पैहम रवाँ है नित नई मंज़िल की राह में रुकता है ज़िंदगी का भला कारवाँ कहीं दुख दर्द आते देख के होता है ये गुमाँ हो ज़ब्त का हमारे न ये इम्तिहाँ कहीं आई ख़िज़ाँ बहार भी होगी क़रीब ही फ़ितरत का ये न राज़ हो ग़म में निहाँ कहीं कब तक तू रहम खाएगा ख़ुद अपने हाल पर कब तक तिरी तलाश दिल-ए-मेहरबाँ कहीं ख़ुश कर न तू किसी को क़सीदे सुना सुना झुकने न पाए सर ब-दर-ए-आस्ताँ कहीं फ़ुर्सत कहाँ किसे जो तेरा हाल-ए-ग़म सुने दुनियाँ को अपनी कम है परेशानियाँ कहीं सीने के अपने घाव को हँस हँस के तू छुपा दुनिया पे होने पाए न हरगिज़ अयाँ कहीं ग़म के तराने छोड़ के ख़ुशियों के गीत गा मुश्किल को सहल करते हैं आह-ओ-फ़ुग़ाँ कहीं पा-ए-तलब न लंग हो और अज़्म हो जवाँ मर्द-ए-ख़ुदा पे तंग है हिन्दोस्ताँ कहीं गो सब्र-आज़मा है मसाफ़त की मुश्किलें हाइल है राह-ए-शौक़ में संग-ए-गिराँ कहीं छूटा चमन है एक हज़ारों नज़र में हैं फिर होगा शाख़-ए-गुल पे नया आशियाँ कहीं सहन-ए-चमन में धूम से जाएगी फिर बहार ख़ंदा है गुल तुयूर भी है नग़्मा-ख़्वाँ कहीं लुट कर 'हबीब' ख़ुश है कि ताजिर है शौक़ का है फ़िक्र-ए-रोज़गार न सूद-ओ-ज़ियाँ कहीं
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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ज़िंदगी बहती रही आब-ए-रवाँ की मानिंद कभी हल्की सी कभी ख़्वाब-ए-गिराँ की मानिंद वक़्त की लहरों पे मा'सूम सा चेहरा उभरा और फिर हो गया गुम वहम-ओ-गुमाँ की मानिंद दिलरुबा चेहरे पे क्यूँ छाया क़ज़ा का साया क्यूँ बहारों का हुआ रंग ख़िज़ाँ के मानिंद हो गई क्यूँ वो चहकती हुई बुलबुल ख़ामोश क्यूँ गिरा फूल जो गुलशन में था जाँ की मानिंद रिंद झूम उठते थे मस्तान अदा पर जिस की अब यहाँ कौन है उस पीर-ए-मुग़ाँ की मानिंद ख़ाक उड़ती है जहाँ क़हक़हे होते थे बुलंद नग़्मा-ए-बज़्म है अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ की मानिंद गर्मी-ए-दिल थी वही उस की वही ज़ौक़-ए-तलब ढलते सायों में वो था मर्द-ए-जवाँ की मानिंद उम्र भर याद-ए-चतर हम को रुलाएगी 'हबीब' ग़म सताएगी सदा दर्द-ए-निहाँ की मानिंद
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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शहर मशहूर-ए-ज़माना देखने आया हूँ मैं राजधानी तेरी रा'ना देखने आया हूँ मैं क्या कहूँ कैसे कहूँ क्या देखने आया हूँ मैं दीदनी हर इक नज़ारा देखने आया हूँ मैं सर-ज़मीन-ए-पदमनी गहवारा-ए-प्रतापी भीम रश्क-ए-फ़िरदौस-ए-ज़माना देखने आया हूँ मैं ख़ुशनुमा झीलों में लर्ज़ां जिन का है अक्स-ए-जमील उन हसीं महलों का नक़्शा देखने आया हूँ मैं अब भी बाक़ी जिस ज़मीं पर है गुज़िश्ता अज़्मतें वो ज़मीं बा-चश्म-ए-बीनी देखने आया हूँ मैं सर ज़मीं वो जिस में थीं इस्मत से अर्ज़ां ज़िंदगी कर के पत्थर का कलेजा देखने आया हूँ मैं जिस की ख़ातिर पी गए जाम-ए-शहादत सूरमा राजपूतों का वो का'बा देखने आया हूँ मैं जिस से बाक़ी आज तक है आन राजस्थान की वो जमाल-ए-हुस्न-आरा देखने आया हूँ मैं सर ज़मीं रंगी है जिन की ख़ूँ से हल्दी घाट की उन की उम्मीदों की दुनियाँ देखने आया हूँ मैं उस की मिट्टी में हवा में आब में कोहसार में शान-ए-ख़ुद्दारी का जल्वा देखने आया हूँ मैं थी फ़ज़ा मख़मूर जिन से अपने बचपन की 'हबीब' उन हसीं ख़्वाबों की दुनिया देखने आया हूँ मैं
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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जहाँ में ग़म भी है रौशन-तरीं सितारों में दिखाता राह है ज़ुल्मत के ख़ारज़ारों में नहीं सुरूद में चंग-ओ-रबाब में भी नहीं वो एक लय कि है टूटे दिलों के तारों में ख़िज़ाँ की शौकत-ओ-अज़्मत है उन पे सब ज़ाहिर जो ढूँडते उसे फिरते रहे बहारों में ख़ुशी से हुस्न निखरता है ज़ाहिरी लेकिन जमील रूहों को पाओगे ग़म के मारों में बग़ैर दर्द नहीं है कभी ज़ुहूर-ए-हयात जिगर का ख़ून उभरता है शाहकारों में मकीं हरम के मुसीबत को उन की क्या जानें जो ख़ाक छानते हैं अजनबी दयारों में पसंद आया जो टूटे दिलों का इज़्ज़-ओ-नियाज़ तो बस गया है ख़ुदा भी गुनहगारों में कभी तो देखते तुम आ के ग़म नसीबों को हसीन दाग़ है सीने के लाला-ज़ारों में
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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मेरी सोई हुई क़िस्मत को जगाने आ जा आ जा आ जा मिरी बिगड़ी को बनाने आ जा खो गया अक़्ल की राहों में मिरा अहद-ए-शबाब अज़-सर-ए-नौ मुझे दीवाना बनाने आ जा सर्द लाशा है मिरा इश्क़ से ख़ाली सीना इक नया सोज़ नई आग लगाने आ जा बाग़ में फूल है पज़मुर्दा-ओ-पामाल सभी हर रविश पर तू नए फूल खिलाने आ जा कान अब पक गए सुन सुन के पुराने नग़्में अन-सुने गीत नए राग सुनाने आ जा सख़्त हमवार है यकसाँ है मिरी राह-ए-हयात कोई सहरा कोई वीराना दिखाने आ जा ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क रहा ख़ौफ़-ए-गुनह से लेकिन अब मोहब्बत का गुनहगार बनाने आ जा कैफ़ बन जा मिरे दिल का मेरी नज़रों का सुरूर मिस्ल-ए-बादा मिरी रग रग में समाने आ जा मंज़िल-ए-ज़ीस्त किधर है नहीं मा'लूम 'हबीब' थाम कर हाथ मुझे राह दिखाने आ जा
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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