nazmKuch Alfaaz

ज़िंदगी बहती रही आब-ए-रवाँ की मानिंद कभी हल्की सी कभी ख़्वाब-ए-गिराँ की मानिंद वक़्त की लहरों पे मा'सूम सा चेहरा उभरा और फिर हो गया गुम वहम-ओ-गुमाँ की मानिंद दिलरुबा चेहरे पे क्यूँ छाया क़ज़ा का साया क्यूँ बहारों का हुआ रंग ख़िज़ाँ के मानिंद हो गई क्यूँ वो चहकती हुई बुलबुल ख़ामोश क्यूँ गिरा फूल जो गुलशन में था जाँ की मानिंद रिंद झूम उठते थे मस्तान अदा पर जिस की अब यहाँ कौन है उस पीर-ए-मुग़ाँ की मानिंद ख़ाक उड़ती है जहाँ क़हक़हे होते थे बुलंद नग़्मा-ए-बज़्म है अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ की मानिंद गर्मी-ए-दिल थी वही उस की वही ज़ौक़-ए-तलब ढलते सायों में वो था मर्द-ए-जवाँ की मानिंद उम्र भर याद-ए-चतर हम को रुलाएगी 'हबीब' ग़म सताएगी सदा दर्द-ए-निहाँ की मानिंद

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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एक रुख़ साज़-ए-दरूँ से जल न उठें जिस्म-ओ-जाँ कहीं रग रग न मेरी फूँक दे क़ल्ब-ए-तपाँ कहीं गुम-सुम हूँ और शश्दर-ओ-हैराँ कुछ इस तरह जैसे कि खो चुका हूँ मैं रूह-ए-रवाँ कहीं उस नाव की तरह हूँ मैं मौजों के रहम पर लंगर हो जिस के टूटे कहीं बादबाँ कहीं या मस्त नाज़ सर्व सा कोई निहाल-ए-सब्ज़ आ जाए ज़िद में बर्क़ की जो ना-गहाँ कहीं या जिस तरह बहार में मुर्ग़-ए-शिकस्ता पर हसरत से देखता हूँ सू-ए-आसमाँ कहीं मग़्लूब इस क़दर हूँ मैं एहसास-ए-ग़म से आज खो जाए सिसकियों में न ये दास्ताँ कहीं बीते दिनों के ख़्वाब हैं आँखों के सामने फ़र्दा का एक ख़ौफ़ है दिल में निहाँ कहीं निकले थे जब वतन से हम अपने ब-हाल-ए-ज़ार मंज़िल का था ख़याल न नाम-ओ-निशाँ कहीं कुछ ऐसी मुंतशिर सी हुई दोस्ती की बज़्म पत्ते बिखेर देती है जैसे ख़िज़ाँ कहीं ज़िंदा है यार सोहबतें बाक़ी मगर कहाँ दीवार खिंच गई है नई दरमियाँ कहीं फ़र्दा पे क्या यक़ीन हो नालाँ हूँ हाल पर माज़ी की सम्त ले चले उम्र-ए-रवाँ कहीं बाद-ए-सबा के शानों पे अमवाज-ए-नूर पर ले जाओ मुझ को दोस्तों के दरमियाँ कहीं या शम्अ'' मेरी यादों की गुल कर दो एक एक तारीक दिल का गोशा न हो ज़ौ-फ़िशाँ कहीं रूदाद-ए-ग़म सुनाते ही यूँँ आई उन की याद मैं हूँ कहीं ख़याल कहीं दास्ताँ कहीं ओझल हैं गो निगाह से दिल से कहीं हैं दूर ज़िक्र-ए-हबीब अब भी है विर्द-ए-ज़बाँ कहीं दूसरा रुख़ क्यूँ इंक़िलाब-ए-दहरस अब मुज़्तरिब है तू देखा है एक हाल पे दौर-ए-ज़माँ कहीं आग़ोश-ए-इंक़लाब में पलना है इर्तिक़ा मर जाएँ घुट के बदलें न गर ये जहाँ कहीं महशर-ब-दामाँ लहजा है दुनिया का एक एक माज़ी के ढूँढ़ता है मगर तू निशाँ कहीं तूफ़ाँ ने बढ़ के क़स्र को क़ैसर के जा लिया रोता है तू कि मेरा नहीं आशियाँ कहीं पैहम रवाँ है नित नई मंज़िल की राह में रुकता है ज़िंदगी का भला कारवाँ कहीं दुख दर्द आते देख के होता है ये गुमाँ हो ज़ब्त का हमारे न ये इम्तिहाँ कहीं आई ख़िज़ाँ बहार भी होगी क़रीब ही फ़ितरत का ये न राज़ हो ग़म में निहाँ कहीं कब तक तू रहम खाएगा ख़ुद अपने हाल पर कब तक तिरी तलाश दिल-ए-मेहरबाँ कहीं ख़ुश कर न तू किसी को क़सीदे सुना सुना झुकने न पाए सर ब-दर-ए-आस्ताँ कहीं फ़ुर्सत कहाँ किसे जो तेरा हाल-ए-ग़म सुने दुनियाँ को अपनी कम है परेशानियाँ कहीं सीने के अपने घाव को हँस हँस के तू छुपा दुनिया पे होने पाए न हरगिज़ अयाँ कहीं ग़म के तराने छोड़ के ख़ुशियों के गीत गा मुश्किल को सहल करते हैं आह-ओ-फ़ुग़ाँ कहीं पा-ए-तलब न लंग हो और अज़्म हो जवाँ मर्द-ए-ख़ुदा पे तंग है हिन्दोस्ताँ कहीं गो सब्र-आज़मा है मसाफ़त की मुश्किलें हाइल है राह-ए-शौक़ में संग-ए-गिराँ कहीं छूटा चमन है एक हज़ारों नज़र में हैं फिर होगा शाख़-ए-गुल पे नया आशियाँ कहीं सहन-ए-चमन में धूम से जाएगी फिर बहार ख़ंदा है गुल तुयूर भी है नग़्मा-ख़्वाँ कहीं लुट कर 'हबीब' ख़ुश है कि ताजिर है शौक़ का है फ़िक्र-ए-रोज़गार न सूद-ओ-ज़ियाँ कहीं

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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यूँँ आए हैं घिर घिर के ये दुख-दर्द के बादल तारीक फ़ज़ाओं में घुला जैसे हो काजल बेचैन हैं बे-ताब हैं बे-आस हैं बेकल लहरा दे ज़रा आ के तू उम्मीद का आँचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल गुलशन में न वो रंग न वो रूप रहा है ग़ुंचे की न अब आँख में वो कैफ़ भरा है कब फूल के सीने में धड़कने की सदा है सन्नाटा सा सन्नाटा है हरकत है न हलचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल काँटों से है सद-चाक हर इक गुल का गरेबाँ हर सम्त से है बिजलियों की ज़द में गुलिस्ताँ सोया है अभी तान के चौखट पे निगहबाँ डसती है सवेरे को सियह-रात हर इक पल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल तू आए तो गुलशन का हसीं चेहरा निखर जाए हर ग़ुंचा महक जाए हर एक पत्ता सँवर जाए कुम्हलाए से फूलों का भी कुछ हाल सुधर जाए बाक़ी रहे क़िस्मत में कोई ख़म न कोई बल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल तू आए तो फिर कैफ़-ओ-मसर्रत की फ़ज़ा आए इस ख़ाक में जीने का और मरने का मज़ा आए सीनों में उमंग उट्ठे तो फिर जोश नया आए और रात के चेहरे पे ढलक जाए फिर आँचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल आ जा कि ज़रा शग़्ल-ए-मय-ओ-जाम करेंगे कुछ तज़्किरा-ए-यार-ए-दिल-आराम करेंगे रंगीन हर इक सुब्ह हर इक शाम करेंगे और नग़्में सुनेंगे हसीं-ओ-शोख़ और चंचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल ऐ बाद-ए-सबा चल

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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मेरी सोई हुई क़िस्मत को जगाने आ जा आ जा आ जा मिरी बिगड़ी को बनाने आ जा खो गया अक़्ल की राहों में मिरा अहद-ए-शबाब अज़-सर-ए-नौ मुझे दीवाना बनाने आ जा सर्द लाशा है मिरा इश्क़ से ख़ाली सीना इक नया सोज़ नई आग लगाने आ जा बाग़ में फूल है पज़मुर्दा-ओ-पामाल सभी हर रविश पर तू नए फूल खिलाने आ जा कान अब पक गए सुन सुन के पुराने नग़्में अन-सुने गीत नए राग सुनाने आ जा सख़्त हमवार है यकसाँ है मिरी राह-ए-हयात कोई सहरा कोई वीराना दिखाने आ जा ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क रहा ख़ौफ़-ए-गुनह से लेकिन अब मोहब्बत का गुनहगार बनाने आ जा कैफ़ बन जा मिरे दिल का मेरी नज़रों का सुरूर मिस्ल-ए-बादा मिरी रग रग में समाने आ जा मंज़िल-ए-ज़ीस्त किधर है नहीं मा'लूम 'हबीब' थाम कर हाथ मुझे राह दिखाने आ जा

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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जहाँ में ग़म भी है रौशन-तरीं सितारों में दिखाता राह है ज़ुल्मत के ख़ारज़ारों में नहीं सुरूद में चंग-ओ-रबाब में भी नहीं वो एक लय कि है टूटे दिलों के तारों में ख़िज़ाँ की शौकत-ओ-अज़्मत है उन पे सब ज़ाहिर जो ढूँडते उसे फिरते रहे बहारों में ख़ुशी से हुस्न निखरता है ज़ाहिरी लेकिन जमील रूहों को पाओगे ग़म के मारों में बग़ैर दर्द नहीं है कभी ज़ुहूर-ए-हयात जिगर का ख़ून उभरता है शाहकारों में मकीं हरम के मुसीबत को उन की क्या जानें जो ख़ाक छानते हैं अजनबी दयारों में पसंद आया जो टूटे दिलों का इज़्ज़-ओ-नियाज़ तो बस गया है ख़ुदा भी गुनहगारों में कभी तो देखते तुम आ के ग़म नसीबों को हसीन दाग़ है सीने के लाला-ज़ारों में

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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क्या नग़्मा-हा-ए-कैफ़ का दरिया बहा गया ख़ुद हुस्न को जहाँ में हसीं-तर बना गया ऐ शाइ'र-ए-शबाब-ओ-नवा-संज-ए-ज़िंदगी मिस्ल-ए-बहार आ के तू आलम पे छा गया तू हुस्न की निगाह था और इश्क़ की ज़बाँ गीतों में रंग-ओ-रूप की दुनिया बसा गया रंगीनियाँ बहार की हर सू बिखर गई बे-कैफ़ी-ए-ख़िज़ाँ का कभी रंग छा गया टूटे हुए दिलों की सदा लब पे आ गई नग़्मा कभी तू कैफ़-ओ-मसर्रत का गा गया इंसाँ के ग़म में सीना-ए-क़ुदरत भी शक़ हुआ माँ की तरह से मौत को भी प्यार आ गया अफ़्सुर्दा ज़िंदगी को मिली तुझ से ताज़गी जो दिल तड़प रहा था वो आराम पा गया तू कर के सर-बुलंद वतन के वक़ार को दिल में हर एक फ़र्द-ए-वतन के समा गया हिन्दोस्ताँ को दे के दो-आलम की अज़्मतें तू बे-नवा फ़क़ीर सा गाता चला गया

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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