nazmKuch Alfaaz

यूँँ आए हैं घिर घिर के ये दुख-दर्द के बादल तारीक फ़ज़ाओं में घुला जैसे हो काजल बेचैन हैं बे-ताब हैं बे-आस हैं बेकल लहरा दे ज़रा आ के तू उम्मीद का आँचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल गुलशन में न वो रंग न वो रूप रहा है ग़ुंचे की न अब आँख में वो कैफ़ भरा है कब फूल के सीने में धड़कने की सदा है सन्नाटा सा सन्नाटा है हरकत है न हलचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल काँटों से है सद-चाक हर इक गुल का गरेबाँ हर सम्त से है बिजलियों की ज़द में गुलिस्ताँ सोया है अभी तान के चौखट पे निगहबाँ डसती है सवेरे को सियह-रात हर इक पल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल तू आए तो गुलशन का हसीं चेहरा निखर जाए हर ग़ुंचा महक जाए हर एक पत्ता सँवर जाए कुम्हलाए से फूलों का भी कुछ हाल सुधर जाए बाक़ी रहे क़िस्मत में कोई ख़म न कोई बल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल तू आए तो फिर कैफ़-ओ-मसर्रत की फ़ज़ा आए इस ख़ाक में जीने का और मरने का मज़ा आए सीनों में उमंग उट्ठे तो फिर जोश नया आए और रात के चेहरे पे ढलक जाए फिर आँचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल आ जा कि ज़रा शग़्ल-ए-मय-ओ-जाम करेंगे कुछ तज़्किरा-ए-यार-ए-दिल-आराम करेंगे रंगीन हर इक सुब्ह हर इक शाम करेंगे और नग़्में सुनेंगे हसीं-ओ-शोख़ और चंचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल ऐ बाद-ए-सबा चल

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे

Gorakh Pandey

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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ज़िंदगी बहती रही आब-ए-रवाँ की मानिंद कभी हल्की सी कभी ख़्वाब-ए-गिराँ की मानिंद वक़्त की लहरों पे मा'सूम सा चेहरा उभरा और फिर हो गया गुम वहम-ओ-गुमाँ की मानिंद दिलरुबा चेहरे पे क्यूँ छाया क़ज़ा का साया क्यूँ बहारों का हुआ रंग ख़िज़ाँ के मानिंद हो गई क्यूँ वो चहकती हुई बुलबुल ख़ामोश क्यूँ गिरा फूल जो गुलशन में था जाँ की मानिंद रिंद झूम उठते थे मस्तान अदा पर जिस की अब यहाँ कौन है उस पीर-ए-मुग़ाँ की मानिंद ख़ाक उड़ती है जहाँ क़हक़हे होते थे बुलंद नग़्मा-ए-बज़्म है अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ की मानिंद गर्मी-ए-दिल थी वही उस की वही ज़ौक़-ए-तलब ढलते सायों में वो था मर्द-ए-जवाँ की मानिंद उम्र भर याद-ए-चतर हम को रुलाएगी 'हबीब' ग़म सताएगी सदा दर्द-ए-निहाँ की मानिंद

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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मेरी सोई हुई क़िस्मत को जगाने आ जा आ जा आ जा मिरी बिगड़ी को बनाने आ जा खो गया अक़्ल की राहों में मिरा अहद-ए-शबाब अज़-सर-ए-नौ मुझे दीवाना बनाने आ जा सर्द लाशा है मिरा इश्क़ से ख़ाली सीना इक नया सोज़ नई आग लगाने आ जा बाग़ में फूल है पज़मुर्दा-ओ-पामाल सभी हर रविश पर तू नए फूल खिलाने आ जा कान अब पक गए सुन सुन के पुराने नग़्में अन-सुने गीत नए राग सुनाने आ जा सख़्त हमवार है यकसाँ है मिरी राह-ए-हयात कोई सहरा कोई वीराना दिखाने आ जा ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क रहा ख़ौफ़-ए-गुनह से लेकिन अब मोहब्बत का गुनहगार बनाने आ जा कैफ़ बन जा मिरे दिल का मेरी नज़रों का सुरूर मिस्ल-ए-बादा मिरी रग रग में समाने आ जा मंज़िल-ए-ज़ीस्त किधर है नहीं मा'लूम 'हबीब' थाम कर हाथ मुझे राह दिखाने आ जा

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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जहाँ में ग़म भी है रौशन-तरीं सितारों में दिखाता राह है ज़ुल्मत के ख़ारज़ारों में नहीं सुरूद में चंग-ओ-रबाब में भी नहीं वो एक लय कि है टूटे दिलों के तारों में ख़िज़ाँ की शौकत-ओ-अज़्मत है उन पे सब ज़ाहिर जो ढूँडते उसे फिरते रहे बहारों में ख़ुशी से हुस्न निखरता है ज़ाहिरी लेकिन जमील रूहों को पाओगे ग़म के मारों में बग़ैर दर्द नहीं है कभी ज़ुहूर-ए-हयात जिगर का ख़ून उभरता है शाहकारों में मकीं हरम के मुसीबत को उन की क्या जानें जो ख़ाक छानते हैं अजनबी दयारों में पसंद आया जो टूटे दिलों का इज़्ज़-ओ-नियाज़ तो बस गया है ख़ुदा भी गुनहगारों में कभी तो देखते तुम आ के ग़म नसीबों को हसीन दाग़ है सीने के लाला-ज़ारों में

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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अब्र यूँँ छा रहा है आबू पर जैसे पहरा हो धुँदली शामों पर या कि आएँ नज़र सियह साए लर्ज़ां लर्ज़ां बिलाैरी जामों पर ये घटा छा रही है सावन की ज़ुल्फ़ बिखरी है या तिरे रुख़ पर बादलों में चमकती है बिजली हँसी फूटी है या तिरे रुख़ पर गिरती है बादलों से यूँँ बूँदें जाम-ए-लबरेज़ जूँ छलकता है झूमते हैं हवा से यूँँ अश्जार रिंद पी पी के जूँ बहकता है सब्ज़ा फूटा है ये पहाड़ों पर या कोई नर्म पैरहन है ये है ये रंग-ए-बहार ज़ेब-ए-नज़र सब्ज़ जोड़े की या फबन है ये झील से यूँँ लिपट गया कोहरा बच्चा इक माँ से जूँ लिपट जाए या कि बिछड़ी हुई सी दोशीज़ा आ के आग़ोश में सिमट जाए चीर के बादलों को एक किरन दफ़्अ'तन झील पर थिरक जाए जिस तरह इक उरूस-ए-नौ का कहीं रुख़ से आँचल कभी सरक जाए दूर कोहसार में ये गिरते हुए साज़ बजते हैं आबशारों के क़हक़हे जैसे नुक़रई से कहीं गूँज उठते हैं माह-पारों के काले उजले से तैरते बादल झील की सत्ह पर चमकते हैं नक़्श जिस तरह रंज-ओ-राहत के दिल के आईने में झलकते हैं ठंडी ठंडी हवा के झोंकों में यूँँ मिरा इज़्तिराब खो जाए जैसे रोता बिसूरता बच्चा गोद में माँ की थक के सो जाए एक चंचल हवा के झोंके से सत्ह-ए-हमवार-ए-आब हिल जाए जैसे बाद-ए-सबा की जुम्बिश से ग़ुंचा-ए-नीम-बाज़ खिल जाए गूँज कर जैसे नय-नवाज़ की नय शब का सन्नाटा तोड़ देती है यूँँही सोए हुए मिरे दिल को याद कोई झिंझोड़ देती है झाँक कर बादलों की ओर से यूँँ झील पर चाँद थरथराता है जैसे माज़ी के धुँदलकों से कहीं इक हसीं चेहरा मुस्कुराता है

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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शहर मशहूर-ए-ज़माना देखने आया हूँ मैं राजधानी तेरी रा'ना देखने आया हूँ मैं क्या कहूँ कैसे कहूँ क्या देखने आया हूँ मैं दीदनी हर इक नज़ारा देखने आया हूँ मैं सर-ज़मीन-ए-पदमनी गहवारा-ए-प्रतापी भीम रश्क-ए-फ़िरदौस-ए-ज़माना देखने आया हूँ मैं ख़ुशनुमा झीलों में लर्ज़ां जिन का है अक्स-ए-जमील उन हसीं महलों का नक़्शा देखने आया हूँ मैं अब भी बाक़ी जिस ज़मीं पर है गुज़िश्ता अज़्मतें वो ज़मीं बा-चश्म-ए-बीनी देखने आया हूँ मैं सर ज़मीं वो जिस में थीं इस्मत से अर्ज़ां ज़िंदगी कर के पत्थर का कलेजा देखने आया हूँ मैं जिस की ख़ातिर पी गए जाम-ए-शहादत सूरमा राजपूतों का वो का'बा देखने आया हूँ मैं जिस से बाक़ी आज तक है आन राजस्थान की वो जमाल-ए-हुस्न-आरा देखने आया हूँ मैं सर ज़मीं रंगी है जिन की ख़ूँ से हल्दी घाट की उन की उम्मीदों की दुनियाँ देखने आया हूँ मैं उस की मिट्टी में हवा में आब में कोहसार में शान-ए-ख़ुद्दारी का जल्वा देखने आया हूँ मैं थी फ़ज़ा मख़मूर जिन से अपने बचपन की 'हबीब' उन हसीं ख़्वाबों की दुनिया देखने आया हूँ मैं

JaiKrishn Chaudhry Habeeb

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