अब्र यूँँ छा रहा है आबू पर जैसे पहरा हो धुँदली शामों पर या कि आएँ नज़र सियह साए लर्ज़ां लर्ज़ां बिलाैरी जामों पर ये घटा छा रही है सावन की ज़ुल्फ़ बिखरी है या तिरे रुख़ पर बादलों में चमकती है बिजली हँसी फूटी है या तिरे रुख़ पर गिरती है बादलों से यूँँ बूँदें जाम-ए-लबरेज़ जूँ छलकता है झूमते हैं हवा से यूँँ अश्जार रिंद पी पी के जूँ बहकता है सब्ज़ा फूटा है ये पहाड़ों पर या कोई नर्म पैरहन है ये है ये रंग-ए-बहार ज़ेब-ए-नज़र सब्ज़ जोड़े की या फबन है ये झील से यूँँ लिपट गया कोहरा बच्चा इक माँ से जूँ लिपट जाए या कि बिछड़ी हुई सी दोशीज़ा आ के आग़ोश में सिमट जाए चीर के बादलों को एक किरन दफ़्अ'तन झील पर थिरक जाए जिस तरह इक उरूस-ए-नौ का कहीं रुख़ से आँचल कभी सरक जाए दूर कोहसार में ये गिरते हुए साज़ बजते हैं आबशारों के क़हक़हे जैसे नुक़रई से कहीं गूँज उठते हैं माह-पारों के काले उजले से तैरते बादल झील की सत्ह पर चमकते हैं नक़्श जिस तरह रंज-ओ-राहत के दिल के आईने में झलकते हैं ठंडी ठंडी हवा के झोंकों में यूँँ मिरा इज़्तिराब खो जाए जैसे रोता बिसूरता बच्चा गोद में माँ की थक के सो जाए एक चंचल हवा के झोंके से सत्ह-ए-हमवार-ए-आब हिल जाए जैसे बाद-ए-सबा की जुम्बिश से ग़ुंचा-ए-नीम-बाज़ खिल जाए गूँज कर जैसे नय-नवाज़ की नय शब का सन्नाटा तोड़ देती है यूँँही सोए हुए मिरे दिल को याद कोई झिंझोड़ देती है झाँक कर बादलों की ओर से यूँँ झील पर चाँद थरथराता है जैसे माज़ी के धुँदलकों से कहीं इक हसीं चेहरा मुस्कुराता है
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मेरी सोई हुई क़िस्मत को जगाने आ जा आ जा आ जा मिरी बिगड़ी को बनाने आ जा खो गया अक़्ल की राहों में मिरा अहद-ए-शबाब अज़-सर-ए-नौ मुझे दीवाना बनाने आ जा सर्द लाशा है मिरा इश्क़ से ख़ाली सीना इक नया सोज़ नई आग लगाने आ जा बाग़ में फूल है पज़मुर्दा-ओ-पामाल सभी हर रविश पर तू नए फूल खिलाने आ जा कान अब पक गए सुन सुन के पुराने नग़्में अन-सुने गीत नए राग सुनाने आ जा सख़्त हमवार है यकसाँ है मिरी राह-ए-हयात कोई सहरा कोई वीराना दिखाने आ जा ज़ाहिद-ए-ख़ुश्क रहा ख़ौफ़-ए-गुनह से लेकिन अब मोहब्बत का गुनहगार बनाने आ जा कैफ़ बन जा मिरे दिल का मेरी नज़रों का सुरूर मिस्ल-ए-बादा मिरी रग रग में समाने आ जा मंज़िल-ए-ज़ीस्त किधर है नहीं मा'लूम 'हबीब' थाम कर हाथ मुझे राह दिखाने आ जा
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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एक रुख़ साज़-ए-दरूँ से जल न उठें जिस्म-ओ-जाँ कहीं रग रग न मेरी फूँक दे क़ल्ब-ए-तपाँ कहीं गुम-सुम हूँ और शश्दर-ओ-हैराँ कुछ इस तरह जैसे कि खो चुका हूँ मैं रूह-ए-रवाँ कहीं उस नाव की तरह हूँ मैं मौजों के रहम पर लंगर हो जिस के टूटे कहीं बादबाँ कहीं या मस्त नाज़ सर्व सा कोई निहाल-ए-सब्ज़ आ जाए ज़िद में बर्क़ की जो ना-गहाँ कहीं या जिस तरह बहार में मुर्ग़-ए-शिकस्ता पर हसरत से देखता हूँ सू-ए-आसमाँ कहीं मग़्लूब इस क़दर हूँ मैं एहसास-ए-ग़म से आज खो जाए सिसकियों में न ये दास्ताँ कहीं बीते दिनों के ख़्वाब हैं आँखों के सामने फ़र्दा का एक ख़ौफ़ है दिल में निहाँ कहीं निकले थे जब वतन से हम अपने ब-हाल-ए-ज़ार मंज़िल का था ख़याल न नाम-ओ-निशाँ कहीं कुछ ऐसी मुंतशिर सी हुई दोस्ती की बज़्म पत्ते बिखेर देती है जैसे ख़िज़ाँ कहीं ज़िंदा है यार सोहबतें बाक़ी मगर कहाँ दीवार खिंच गई है नई दरमियाँ कहीं फ़र्दा पे क्या यक़ीन हो नालाँ हूँ हाल पर माज़ी की सम्त ले चले उम्र-ए-रवाँ कहीं बाद-ए-सबा के शानों पे अमवाज-ए-नूर पर ले जाओ मुझ को दोस्तों के दरमियाँ कहीं या शम्अ'' मेरी यादों की गुल कर दो एक एक तारीक दिल का गोशा न हो ज़ौ-फ़िशाँ कहीं रूदाद-ए-ग़म सुनाते ही यूँँ आई उन की याद मैं हूँ कहीं ख़याल कहीं दास्ताँ कहीं ओझल हैं गो निगाह से दिल से कहीं हैं दूर ज़िक्र-ए-हबीब अब भी है विर्द-ए-ज़बाँ कहीं दूसरा रुख़ क्यूँ इंक़िलाब-ए-दहरस अब मुज़्तरिब है तू देखा है एक हाल पे दौर-ए-ज़माँ कहीं आग़ोश-ए-इंक़लाब में पलना है इर्तिक़ा मर जाएँ घुट के बदलें न गर ये जहाँ कहीं महशर-ब-दामाँ लहजा है दुनिया का एक एक माज़ी के ढूँढ़ता है मगर तू निशाँ कहीं तूफ़ाँ ने बढ़ के क़स्र को क़ैसर के जा लिया रोता है तू कि मेरा नहीं आशियाँ कहीं पैहम रवाँ है नित नई मंज़िल की राह में रुकता है ज़िंदगी का भला कारवाँ कहीं दुख दर्द आते देख के होता है ये गुमाँ हो ज़ब्त का हमारे न ये इम्तिहाँ कहीं आई ख़िज़ाँ बहार भी होगी क़रीब ही फ़ितरत का ये न राज़ हो ग़म में निहाँ कहीं कब तक तू रहम खाएगा ख़ुद अपने हाल पर कब तक तिरी तलाश दिल-ए-मेहरबाँ कहीं ख़ुश कर न तू किसी को क़सीदे सुना सुना झुकने न पाए सर ब-दर-ए-आस्ताँ कहीं फ़ुर्सत कहाँ किसे जो तेरा हाल-ए-ग़म सुने दुनियाँ को अपनी कम है परेशानियाँ कहीं सीने के अपने घाव को हँस हँस के तू छुपा दुनिया पे होने पाए न हरगिज़ अयाँ कहीं ग़म के तराने छोड़ के ख़ुशियों के गीत गा मुश्किल को सहल करते हैं आह-ओ-फ़ुग़ाँ कहीं पा-ए-तलब न लंग हो और अज़्म हो जवाँ मर्द-ए-ख़ुदा पे तंग है हिन्दोस्ताँ कहीं गो सब्र-आज़मा है मसाफ़त की मुश्किलें हाइल है राह-ए-शौक़ में संग-ए-गिराँ कहीं छूटा चमन है एक हज़ारों नज़र में हैं फिर होगा शाख़-ए-गुल पे नया आशियाँ कहीं सहन-ए-चमन में धूम से जाएगी फिर बहार ख़ंदा है गुल तुयूर भी है नग़्मा-ख़्वाँ कहीं लुट कर 'हबीब' ख़ुश है कि ताजिर है शौक़ का है फ़िक्र-ए-रोज़गार न सूद-ओ-ज़ियाँ कहीं
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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ज़िंदगी बहती रही आब-ए-रवाँ की मानिंद कभी हल्की सी कभी ख़्वाब-ए-गिराँ की मानिंद वक़्त की लहरों पे मा'सूम सा चेहरा उभरा और फिर हो गया गुम वहम-ओ-गुमाँ की मानिंद दिलरुबा चेहरे पे क्यूँ छाया क़ज़ा का साया क्यूँ बहारों का हुआ रंग ख़िज़ाँ के मानिंद हो गई क्यूँ वो चहकती हुई बुलबुल ख़ामोश क्यूँ गिरा फूल जो गुलशन में था जाँ की मानिंद रिंद झूम उठते थे मस्तान अदा पर जिस की अब यहाँ कौन है उस पीर-ए-मुग़ाँ की मानिंद ख़ाक उड़ती है जहाँ क़हक़हे होते थे बुलंद नग़्मा-ए-बज़्म है अब आह-ओ-फ़ुग़ाँ की मानिंद गर्मी-ए-दिल थी वही उस की वही ज़ौक़-ए-तलब ढलते सायों में वो था मर्द-ए-जवाँ की मानिंद उम्र भर याद-ए-चतर हम को रुलाएगी 'हबीब' ग़म सताएगी सदा दर्द-ए-निहाँ की मानिंद
JaiKrishn Chaudhry Habeeb
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यूँँ आए हैं घिर घिर के ये दुख-दर्द के बादल तारीक फ़ज़ाओं में घुला जैसे हो काजल बेचैन हैं बे-ताब हैं बे-आस हैं बेकल लहरा दे ज़रा आ के तू उम्मीद का आँचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल गुलशन में न वो रंग न वो रूप रहा है ग़ुंचे की न अब आँख में वो कैफ़ भरा है कब फूल के सीने में धड़कने की सदा है सन्नाटा सा सन्नाटा है हरकत है न हलचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल काँटों से है सद-चाक हर इक गुल का गरेबाँ हर सम्त से है बिजलियों की ज़द में गुलिस्ताँ सोया है अभी तान के चौखट पे निगहबाँ डसती है सवेरे को सियह-रात हर इक पल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल तू आए तो गुलशन का हसीं चेहरा निखर जाए हर ग़ुंचा महक जाए हर एक पत्ता सँवर जाए कुम्हलाए से फूलों का भी कुछ हाल सुधर जाए बाक़ी रहे क़िस्मत में कोई ख़म न कोई बल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल तू आए तो फिर कैफ़-ओ-मसर्रत की फ़ज़ा आए इस ख़ाक में जीने का और मरने का मज़ा आए सीनों में उमंग उट्ठे तो फिर जोश नया आए और रात के चेहरे पे ढलक जाए फिर आँचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल आ जा कि ज़रा शग़्ल-ए-मय-ओ-जाम करेंगे कुछ तज़्किरा-ए-यार-ए-दिल-आराम करेंगे रंगीन हर इक सुब्ह हर इक शाम करेंगे और नग़्में सुनेंगे हसीं-ओ-शोख़ और चंचल ऐ बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा बाद-ए-सबा चल ऐ बाद-ए-सबा चल
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चमन में नाज़ से अठखेलियाँ करती बहार आई गुलों का पैरहन पहने वो जान-ए-इंतिज़ार आई चमन वाले सभी फ़र्त-ए-मसर्रत से पुकार उट्ठे बहार आई बहार आई बहार आई बहार आई कहीं कलियों को छेड़ा है कहीं फूलों को चूमा है गले मिल मिल के पत्तों से वो यूँँ रूठी बहार आई नसीबा जाग उट्ठा फिर सभी अहल-ए-गुलिस्ताँ का दिलों का दाग़ धो धो कर वो बार-ए-ग़म उतार आई नई फिर ज़िंदगी आई नया दिल में सुरूर आया नए सपने नए अरमाँ नई आशा उभार आई खुला है मय-कदे का दर और इज़्न-ए-आम है सब को वहाँ पर आज रिंदों की क़तार अंदर क़तार आई गए गुलशन पे ग़ैरों के तो मौज-ए-रंग-ओ-बू बन कर हर इक गुलशन से हम को भी निदा-ए-ख़ुश-गवार आई निगाह-ए-बद से देखा है किसी ने गर गुलिस्ताँ को तो गुल-ची की हर इक साज़िश हमीं को साज़गार आई जिन्हों ने इस चमन को ख़ून और अश्कों से सींचा था बहार आई तो याद उन की हम को बार बार आई न माली हो कभी ग़ाफ़िल न अन-बन अहल-ए-गुलशन में तभी समझेंगे हम यारों हक़ीक़त में बहार आई सदा अपने चमन में दौर-दौरा हो बहारों का 'हबीब' अपनी ज़बाँ पर ये दुआ बे-इख़्तियार आई
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