नज़र में शाएर के फिर रहा है, हरा-भरा पुर-बहार जंगल वो सुब्ह-ए-रंगीं, वो कैफ़-ए-मंज़र, वो दामन-ए-कोह बिंधिया-चल मिली थी इक रंग-ओ-बू की दुनिया, तमाम सहरा चमन चमन था मगर वो जन्नत-निगाह वादी बहार का मुस्तक़िल वतन था खड़ा हुआ था ग़रीब शाएर, ख़मोश सहरा-ए-रंग-ओ-बू में मचल रही थी सहर की दोशीज़ा शब के आग़ोश-ए-आरज़ू में हों चश्म-ए-आशिक़ में जैसे आँसू, सितारे यूँँ झिलमिला रहे थे फ़लक पे बरहम थी बज़्म-ए-अंजुम, चराग़ गुल होते जा रहे थे तजल्लियों की फ़लक से बारिश थी, ज़ुल्मत-ए-शब बिखर रही थी कि सुब्ह की साँवली हसीना नहा रही थी, निखर रही थी नदी में हल्का सा था तमव्वुज कहें जिसे बे-क़रार ग़फ़लत कि नींद में जैसे करवटें ले, जवान, बद-मस्त-ए-ख़्वाब औरत हवा जो शाना हिला रही थी, तो मौजें हुशियार हो रही थीं तुयूर के मस्त ज़मज़मों से फ़ज़ाएँ बेदार हो रही थीं ये कैफ़ियत थी और एक जोगन सितार बैठी बजा रही थी मगर वो जंगल की शाहज़ादी बहार के गीत गा रही थी बहार के गीत गा रही थी फ़ज़ा में नग़्में बिखेरती थी सुकूत फ़ितरत का दाद देता था रुख़ जिधर को वो फेरती थी वो नींद से मुज़्महिल निगाहें वो लब पे मग़्मूम मुस्कुराहट हज़ार अंदाज़-ए-दिल-रुबाई और एक मासूम मुस्कुराहट थीं नींद से रस्मसाई आँखें और इन में शोख़ी मचल रही थी ख़ुमार-आलूदा अँखड़ियों में बहार की रूह पल रही थी क़मर की तलअत, शफ़क़ की सुर्ख़ी, जबीं पे सुब्ह-ए-बहार ख़ंदाँ निगाह आईना-दार-ए-मंज़र, जमाल पर्वर्दा-ए-बयाबाँ सितार पे नाज़ुक उँगलियाँ थीं, कलाई गोरी लचक रही थी उमंगें लेती थीं दिल में करवट, रग-ए-जवानी फड़क रही थी सुनहरे जल्वों की छूट डाली जो शाह-ख़ावर के ताज-ए-ज़र ने तलाई अफ़्शाँ चुनी जबीं पर मलीह दोशीज़ा-ए-सहर ने तलाई ज़ेवर से और चमकी उरूस-ए-मंज़र की दिलरुबाई उठा जो सूरज तो धूप निकली हसीना-ए-सुब्ह खिलखिलाई फ़ज़ा की तब्दीलियों को देखा जो बज़्म-ए-फितरत की मुतरिबा ने सितार रक्खा, उठाई गगरी, नदी किनारे चली नहाने वो जा रही थी नदी की जानिब मैं लौट कर घर को आ रहा था सितार ख़ामोश हो चुका था मगर ये दिल गुनगुना रहा था ज़माना गुज़रा नुक़ूश-ए-माज़ी ख़याल से मिटते जा रहे हैं मगर वो नग़्में 'जमील' अब तक दिमाग़ को गुदगुदा रहे हैं
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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फ़रेब खाए हैं रंग-ओ-बू के सराब को पूजता रहा हूँ मगर नताएज की रौशनी में ख़ुद अपनी मंज़िल पे आ रहा हूँ जो दिल की गहराइयों में सुब्ह ज़ुहूर-ए-आदम से सो रही थीं मैं अपनी फ़ितरत की उन ख़ुदा-दाद क़ुव्वतों को जगा रहा हूँ मैं साँस लेता हूँ हर क़दम पर कि बोझ भारी है ज़िंदगी का ठहर ज़रा गर्म-रौ ज़माने कि मैं तिरे साथ आ रहा हूँ जहाज़-रानों को भी तअ'ज्जुब है मेरे इस अज़्म-ए-मुतमइन पर कि आँधियाँ चल रही हैं तुंद और मैं अपनी कश्ती चला रहा हूँ तिलिस्म-ए-फ़ितरत भी मुस्कुराता है मेरी अफ़्सूँ-तराज़ियों पर बहुत से जादू जगा चुका हूँ बहुत से जादू जगा रहा हूँ ये मेहर-ए-ताबाँ से कोई कह दे कि अपनी किरनों को गिन के रख ले मैं अपने सहरा के ज़र्रे ज़र्रे को ख़ुद चमकना सिखा रहा हूँ मिरा तख़य्युल मिरे इरादे करेंगे फ़ितरत पे हुक्मरानी जहाँ फ़रिश्तों के पर हैं लर्ज़ां मैं उस बुलंदी पे जा रहा हूँ ये वो घरौंदे हैं जिन पे इक दिन पड़ेगी बुनियाद-ए-क़स्र-ए-जन्नत न समझें सुक्कान-ए-बज़्म-ए-इस्मत कि मैं घरौंदे बना रहा हूँ ये नाज़-परवरदगान-ए-साहिल डरें डरें मिरी गर्म रौ से कि मैं समुंदर की तुंद मौजों को रौंदता पास आ रहा हूँ
Jameel Mazhari
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तबीअत जो अंदर से झुँझला रही है तो बाहरस आवाज़ ये आ रही है कि ऐ फ़ाज़िल-ए-दर्स-गाह-ए-हिमाक़त हिजाबात-ए-दानिश उठा कर भी देखो शराफ़त के पीछे जिगर हो गया ख़ूँ शराफ़त से पीछा छुड़ा कर भी देखो अज़ल से मोहब्बत ख़ुदी का है ज़िंदाँ अब इस से ज़रा बाहर आ कर भी देखो मुरव्वत ने पहनाई हैं बेड़ियाँ जो ज़रा उन का लोहा घुला कर भी देखो तसव्वुर की वादी में भटकोगे कब तक कभी शहर-ए-इम्काँ में जा कर भी देखो ग़रज़ 'मज़हरी' इस दयार-ए-जुनूँ में मिला, कुछ न खोने से पा कर भी देखो सुना मशवरा तेरा ऐ सौत-ए-ग़ैबी ज़लालत की सरहद में आ कर भी देखा रिज़ालत की गर्दन में बाँहें भी डालीं शराफ़त से पीछा छुड़ा कर भी देखा हमिय्यत का घोंटा गला रफ़्ता रफ़्ता मोहब्बत को फाँसी चढ़ा कर भी देखा कफ़-ए-मोर से उस का लुक़्मा भी छीना हक़-ए-अहल-ए-ख़िदमत चुरा कर भी देखा शुऊर ओ ख़िरद को ग़ुरूर ओ हसद को सुला कर भी देखा जगा कर भी फिरे कू-ब-कू अक़्ल की रहबरी में ग़रज़ ये कि खो कर भी, पा कर भी देखा न खोने से हासिल, न पाने से हासिल जिसे सूद कहते हैं वो भी ज़ियाँ है यही बस कि तक़दीर-ए-अक़्ल ओ जुनूँ है यही ख़िश्त-ए-तामीर-ए-कौन-ओ-मकाँ है मोहब्बत जहन्नम है, नफ़रत जहन्नम जिधर जाएँ इक आग शोला-फ़िशाँ है दयार-ए-वफ़ा या दयार-ए-हवस हो न राहत यहाँ है न राहत वहाँ है शराफ़त भी ग़म-गीं रिज़ालत भी ग़म-गीं बस अब मुँह न खुलवा ख़ुदा दरमियाँ है समक से समा तक तपिश ही तपिश है फ़ज़ा से ख़ला तक फ़ुग़ाँ ही फ़ुग़ाँ है ख़ुदी पाँव पकड़े है जाएँ कहाँ हम तसव्वुर की जन्नत बनाएँ कहाँ हम
Jameel Mazhari
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मैं था ज़मीर-ए-मशिय्यत में एक अज़्म-ए-जलील हनूज़ शौक़ की करवट भी ली न थी मैं ने कि दफ़्अ'तन मुतहर्रिक हुए लब-ए-तख़्लीक़ पकड़ ली सूरत-ए-ज़ाहिर वजूद की मैं ने वो सुब्ह-ए-आलम-ए-हैरत वो जल्वा-ज़ार-ए-बहिश्त हवा चमन की लगी आँख खोल दी मैं ने वो तर्बियत-गह-ए-ज़ौक़-ए-नज़र, वो वादी-ए-नूर जहाँ से पाई मोहब्बत की रौशनी मैं ने वो उन्फ़ुवान-ए-तमन्ना वो इब्तिदा-ए-जुनून वो इक ख़लिश जिसे समझा था ज़िंदगी मैं ने किया सुरूर ने इक आलम-ए-दिगर पैदा चुरा के पी जो मय-ए-सरकश-ए-ख़ुदी मैं ने ख़ुदी के नश्शे में अल्लाह रे बे-ख़ुदी मेरी बदन से चादर-ए-इस्मत भी फेंक दी मैं ने हुआ हुदूद-ए-नज़र से निकल के आवारा हवा-ए-शौक़ में जन्नत भी छोड़ दी मैं ने फ़रिश्ते रह गए हैरत से देखते मुझ को न की क़ुबूल मशिय्यत की रहबरी मैं ने दलील-ए-राह बनी अपनी गरमी-ए-पर्वाज़ कि ताक़त-ए-पर-ए-जिब्रील छीन ली मैं ने बढ़ीं सितारों की दुनियाएँ मेरे लेने को उतर के अर्श से नीचे नज़र जो की मैं ने मगर ज़मीं की कशिश ने सू-ए-ज़मीं खींचा किया पसंद ये ज़िंदान-ए-उंसुरी मैं ने जगह मिली जो तड़पने की बे-क़रारी को तो फिर हुदूद में वुसअत की दाद दी मैं ने हुआ तलातुम-ए-हस्ती ब-आलम-ए-ज़र्रात छिड़क दी ख़ाक-ए-बयाबाँ पे ज़िंदगी मैं ने नुमू के जोश से सौदा-ए-रंग-ओ-बू निकला ज़मीं के दिल की तमन्ना निकाल दी मैं ने हुईं जहान-ए-अमल में शरीअतें पैदा ख़ुदा के नाम पे बरपा जो की ख़ुदी मैं ने कभी जलाई अँधेरे में शम्अ-ए-इल्म-ओ-अमल कभी बुझा दी हिदायत की रौशनी मैं ने कभी बिगाड़ के रख दीं सवाब की शक्लें कभी बदल दी हक़ीक़त गुनाह की मैं ने बढ़ा तो रह गया पीछे मिरे ज़माना-ए-हाल रुका तो वक़्त की रफ़्ता रोक दी मैं ने ज़मीं पे शौक़ के फ़ित्ने बिछा दिए हर सू फ़ज़ा में नींद की मस्ती बिखेर दी मैं ने कभी जगा दी क़यामत नफ़स की ठोकर से उठा के सूर-ए-सराफ़ील-ए-ज़िंदगी मैं ने जुनूँ के जोश में पर्दे नज़र के चाक किए नक़ाब नोच के फ़ितरत की फेंक दी मैं ने क़बा-ए-लैला-ए-तहज़ीब चाक कर डाली रिदा-ए-मर्यम-ए-इस्मत उतार ली मैं ने मिज़ाज-ए-आतिश-ए-सोज़ाँ को कर दिया ठंडा मचा दी बज़्म-ए-अनासिर में खलबली मैं ने लिया शहनशह-ए-ख़ावर से रौशनी का ख़िराज किया असीर तबीअ'त को बर्क़ की मैं ने ब-इंक़लाब-ए-तबीअत मिज़ाज-ए-आहन को हवा की गरमी-ए-पर्वाज़ बख़्श दी मैं ने बुलंदियों का तसव्वुर भी रह गया पीछे पहुँच के इतनी बुलंदी पे साँस ली मैं ने ठिठुक गईं जो निगाहें क़रीब हुजला-ए-क़ुद्स पस-ए-हिजाब-ए-अदब ये सदा सुनी मैं ने कि ऐ हरीफ़-ए-मशिय्यत ब-वादा-गाह-ए-अज़ल ठहर ठहर तिरी परवाज़ देख ली मैं ने
Jameel Mazhari
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अपने पिंदार-ए-ख़ुदी से मुन्फ़इल हूँ 'मज़हरी' मैं ज़ुहूर-ए-इख़्तिलाल-ए-आब-ओ-गिल हूँ 'मज़हरी' कि मोहब्बत का मरीज़-ए-मुस्तक़िल हूँ 'मज़हरी' दोस्ती क्या दुश्मनी से भी मोहब्बत मैं ने की रौशनी क्या तीरगी से भी मोहब्बत मैं ने की मुस्कुराई तीरगी मुझ को मोहब्बत हो गई हँस के बोली दुश्मनी मुझ को मोहब्बत हो गई मुफ़्लिसी ओ बे-नवाई से मोहब्बत मैं ने की हर सुरूर-ए-ख़ुद-नुमाई से मोहब्बत मैं ने की हर ग़ुरूर-ए-किब्रियाई से मोहब्बत मैं ने की बे-रुख़ी ओ कज-अदाई से मोहब्बत मैं ने की तर-ज़बाँ हो कर रुखाई से मोहब्बत मैं ने की था रज़ाई किस क़दर मेरी मोहब्बत का दिमाग़ अहरमन के सीना-ए-तारीक में देखा चराग़ इक सितारिस्ताँ नज़र आया अँधेरा दाग़ दाग़ मैं ने मक्कारी ओ अय्यारी में भी देखा ख़ुलूस मैं सय्यादी ओ जल्लादी से भी बरता ख़ुलूस मैं ने क़हहारी ओ जब्बारी में भी ढूँडा ख़ुलूस अपने इस जज़्बे को इक तश्दीद-अ-ईमानी भी दी दोस्तों के वास्ते ईमाँ की क़ुर्बानी भी दी ताकि पूरी हो मोहब्बत की इक उम्मीद-ए-फ़ुज़ूल बार-हा झोंका किया इंसाफ़ की आँखों में धूल फिर भी सब कुछ खो के सब कुछ दे के कुछ पाया नहीं अक़्ल काम आई नहीं और इश्क़ रास आया नहीं जिस को कहते हैं वफ़ा इक सख़्त बीमारी है ये ख़ुद-कुशी हो या न हो लेकिन ख़ुद-आज़ारी है ये नाज़-बरदारी में भी इक बार-बरदारी है ये मैं मोहब्बत की हवस में इतना बे-ख़ुद हो गया मेरे अंदर माद्दा नफ़रत का बिल्कुल सो गया ऐ अज़ीज़ो! इस मरीज़-ए-ज़िंदगी का क्या इलाज इस ख़ुदी का क्या इलाज इस बे-ख़ुदी का क्या इलाज जिस को हो नाज़-ए-वफ़ा उस आदमी का क्या इलाज 'इजतिबा' से पूछते हो 'मज़हरी' का क्या इलाज सौ ख़ुलूस-ए-बे-रिया का इक ख़बासत से इलाज ये मरज़ है, ये मरज़ है इस का नफ़रत है इलाज बस यही राज़-ए-शिफ़ा है, बस यही राज़-ए-शिफ़ा बस यही मेरी दवा है बस यही मेरी दवा कोई मेरी रूह पर ऐसा करे ज़ुल्म-ए-शदीद मुझ में नफ़रत जी उठे सलवात बर-रूह-ए-यज़ीद
Jameel Mazhari
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अगर इस गुलशन-ए-हस्ती में होना ही मुक़द्दर था तो मैं ग़ुंचों की मुट्ठी में दिल-ए-बुलबुल हुआ होता गुनाहों में ज़रर होता, दु'आओं में असर होता मोहब्बत की नज़र होता, हसीनों की अदा होता फ़रोग़-ए-चेहरा-ए-मेहनत, ग़ुबार-ए-दामन-ए-दौलत नम-ए-पेशानी-ए-ग़ैरत, ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-रसा होता हुआ होता किसी दस्तार-ए-कज पर फूल की तरह और उस दस्तार-ए-कज की तमकनत पर हँस रहा होता किसी मग़रूर की गर्दन पे होता बोझ एहसाँ का किसी ज़ालिम के दिल में दर्द हो कर ला-दवा होता किसी मुनइम के चेहरे पर ख़ुशी हाजत-रवाई की किसी नादार की नज़रों में शर्म-ए-इल्तिजा होता किसी भटके हुए राही को देता दावत-ए-मंज़िल बयाबाँ की अँधेरी शब में जोगी का दिया होता किसी के कल्बा-ए-अहज़ाँ में शम्-ए-मुज़्महिल बन कर किसी बीमार मुफ़्लिस के सिरहाने रो रहा होता शरर बन कर किसी नादार घर के सर्द चूल्हे में ''ब-सद उम्मीद-ए-फ़र्दा'' ज़ेर-ए-ख़ाकिस्तर दबा होता यतीम-ए-बे-नवा की रह-गुज़र पर अशरफ़ी बन कर लईम-ए-फ़ाक़ा-कश की जेब-ए-मुम्सिक से गिरा होता नियस्तां से निकल कर हसरत-आबाद-ए-तमद्दुन में गदा-ए-पीर ओ ना-बीना के हाथों का असा होता शिकस्ता झोंपड़े में बाँसुरी-ए-दहक़ाँ की सुर बन कर सुकूत-ए-नीम-शब में राज़-ए-हस्ती कह रहा होता ग़रज़ इस हसरत-ओ-अंदोह-ओ-यास-ओ-ग़म की बस्ती में कहीं दौर-आफ़रीं होता, कहीं दर्द-आश्ना होता ''डुबोया मुझ को होने ने'' बाक़ौल-ए-ग़ालिब-ए-दाना ''न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता''
Jameel Mazhari
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