मिरे प्यारे बच्चे बड़ा ज़ुल्म तुम पर हुआ है ब-यक जुम्बिश-ए-सर तुम्हें अपनी मसनद से मा'ज़ूल होना पड़ा है समझ में नहीं आता ऐसी ख़ता क्या हुई तुम से माना कि तुम अपने भाइयों से ठगने थे या फिर तुम्हारा ठिकाना मुक़र्रर नहीं था तुम अपनी हदों से भटक कर किसी और के दाएरे में दर-अंदाज़ होते थे मैं जानता हूँ तुम्हारे बदन पर से अंदोह का सैल गुज़रा है लेकिन मिरी बात का तुम बुरा मत मनाना अगर मैं कहूँ ये कि तुम पहले ही दिन से इस मस्नद-ए-आलीया के तक़द्दुस के लाएक़ नहीं थे सो जितने बरस तुम ने इस स्वाँग में कर्र-ओ-फ़र से गुज़ारे हैं उन पर क़नाअ'त करो और ज़मीं के किसी दूर-उफ़्तादा गोशे में मकतब को जाते हुए एक बच्चे की आँखों से ये बात सुन कर अगर एक आँसू गिरा है उसे सैंत कर ताक़चे में सजा लो ख़लाओं के यख़-बस्ता बे-नूर पाताल में ये सितारा तुम्हारा सहारा बनेगा
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
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मीर-बाक़िर-अली तुम ने फिर बीच में दास्ताँ रोक दी शाह-ए-गुलफ़ाम गुंजल तिलिस्मों की गुत्थियों को सुलझाता सरसार जंगल के शो'ला नफ़स अज़दहों से निमटता बयाबान-ए-हैरत की बे-अंत वुसअ'त को सर कर के पहरे पे मामूर यक-चश्म देवों की नज़रें बचा सब्ज़ क़िले की ऊँची कगर फाँद कर मह-जबीं के मुअंबर शबिस्तान तक आन पहुँचा है और इस तरफ़ हक़-ओ-ताग़ूत मद्द-ए-मुक़ाबिल हैं आँखें जिधर देखती हैं कुल्हाड़ों की नेज़ों की बर्छों की फ़स्लें खड़ी लहलहाती नज़र आ रही हैं जरी सूरमा आमने सामने हिनहिनाते अलिफ़ होते घोड़ों पे ज़ानू जमाए हुए मुंतज़िर हैं अभी तब्ल पर थाप पड़ने को है और इधर शाहज़ादा तिलिस्मी महल के हसीं दूधिया बुर्ज में शाह-ज़ादी के हजले के अंदर अभी लाजवर्दी छपर-खट का ज़र-बफ़्त पर्दा उठा ही रहा है मगर मीर-बाक़िर-अली तुम ने फिर बीच में दास्ताँ रोक दी राहदारी मुनक़्क़श दर-ओ-बाम सत-रंग क़ालीन बिल्लोर क़िंदील फ़व्वारा बरबत सुनाता झरोकों पे लहराते पर्दों की क़ौस-ए-क़ुज़ह मेमना मैसरा क़ल्ब साक़ा जिनाह आहनी ख़ूद से झाँकती मुर्तइश पुतलियाँ रज़्म-गह की कड़ी धूप में एक साकित फरेरा छपर-खट पे सोई हुई शाह-ज़ादी के पैरों पे मेहंदी की बेलें फ़साहत के दरिया बहाते चले जा रहे हो बलाग़त के मोती लुटाते चले जा रहे हो मगर मीर-बाक़िर-अली दास्ताँ-गो सुनो दास्ताँ सुनने वाले तो सदियाँ हुईं उठ के जा भी चुके हैं तुम अपने तिलिस्माती क़िस्से के पुर-पेच तागों में ऐसे लिपटते गए हो कि तुम को ख़बर ही नहीं सामने वाली नुक्कड़ पे इक आने की बाइस्कोप आ गई है
Zafar Sayyad
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बड़े मुल्क के इक बड़े शहर की तंग-ओ-तीरा गली में खड़ा हूँ फ़लक ऊँचे बुर्जों के भालों से कट कर उफ़क़ ता-उफ़ुक़ किरची किरची पड़ा है ज़मीं पाँव के नीचे बदमस्त कश्ती की मानिंद हचकोले खाती है और मैं खड़ा सोचता हूँ कि दस्तार को दोनों हाथों से थामूँ कि फ़ुटपाथ की गिरती दीवार से अपने सर को बचाऊँ
Zafar Sayyad
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