बड़े मुल्क के इक बड़े शहर की तंग-ओ-तीरा गली में खड़ा हूँ फ़लक ऊँचे बुर्जों के भालों से कट कर उफ़क़ ता-उफ़ुक़ किरची किरची पड़ा है ज़मीं पाँव के नीचे बदमस्त कश्ती की मानिंद हचकोले खाती है और मैं खड़ा सोचता हूँ कि दस्तार को दोनों हाथों से थामूँ कि फ़ुटपाथ की गिरती दीवार से अपने सर को बचाऊँ
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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मीर-बाक़िर-अली तुम ने फिर बीच में दास्ताँ रोक दी शाह-ए-गुलफ़ाम गुंजल तिलिस्मों की गुत्थियों को सुलझाता सरसार जंगल के शो'ला नफ़स अज़दहों से निमटता बयाबान-ए-हैरत की बे-अंत वुसअ'त को सर कर के पहरे पे मामूर यक-चश्म देवों की नज़रें बचा सब्ज़ क़िले की ऊँची कगर फाँद कर मह-जबीं के मुअंबर शबिस्तान तक आन पहुँचा है और इस तरफ़ हक़-ओ-ताग़ूत मद्द-ए-मुक़ाबिल हैं आँखें जिधर देखती हैं कुल्हाड़ों की नेज़ों की बर्छों की फ़स्लें खड़ी लहलहाती नज़र आ रही हैं जरी सूरमा आमने सामने हिनहिनाते अलिफ़ होते घोड़ों पे ज़ानू जमाए हुए मुंतज़िर हैं अभी तब्ल पर थाप पड़ने को है और इधर शाहज़ादा तिलिस्मी महल के हसीं दूधिया बुर्ज में शाह-ज़ादी के हजले के अंदर अभी लाजवर्दी छपर-खट का ज़र-बफ़्त पर्दा उठा ही रहा है मगर मीर-बाक़िर-अली तुम ने फिर बीच में दास्ताँ रोक दी राहदारी मुनक़्क़श दर-ओ-बाम सत-रंग क़ालीन बिल्लोर क़िंदील फ़व्वारा बरबत सुनाता झरोकों पे लहराते पर्दों की क़ौस-ए-क़ुज़ह मेमना मैसरा क़ल्ब साक़ा जिनाह आहनी ख़ूद से झाँकती मुर्तइश पुतलियाँ रज़्म-गह की कड़ी धूप में एक साकित फरेरा छपर-खट पे सोई हुई शाह-ज़ादी के पैरों पे मेहंदी की बेलें फ़साहत के दरिया बहाते चले जा रहे हो बलाग़त के मोती लुटाते चले जा रहे हो मगर मीर-बाक़िर-अली दास्ताँ-गो सुनो दास्ताँ सुनने वाले तो सदियाँ हुईं उठ के जा भी चुके हैं तुम अपने तिलिस्माती क़िस्से के पुर-पेच तागों में ऐसे लिपटते गए हो कि तुम को ख़बर ही नहीं सामने वाली नुक्कड़ पे इक आने की बाइस्कोप आ गई है
Zafar Sayyad
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मिरे प्यारे बच्चे बड़ा ज़ुल्म तुम पर हुआ है ब-यक जुम्बिश-ए-सर तुम्हें अपनी मसनद से मा'ज़ूल होना पड़ा है समझ में नहीं आता ऐसी ख़ता क्या हुई तुम से माना कि तुम अपने भाइयों से ठगने थे या फिर तुम्हारा ठिकाना मुक़र्रर नहीं था तुम अपनी हदों से भटक कर किसी और के दाएरे में दर-अंदाज़ होते थे मैं जानता हूँ तुम्हारे बदन पर से अंदोह का सैल गुज़रा है लेकिन मिरी बात का तुम बुरा मत मनाना अगर मैं कहूँ ये कि तुम पहले ही दिन से इस मस्नद-ए-आलीया के तक़द्दुस के लाएक़ नहीं थे सो जितने बरस तुम ने इस स्वाँग में कर्र-ओ-फ़र से गुज़ारे हैं उन पर क़नाअ'त करो और ज़मीं के किसी दूर-उफ़्तादा गोशे में मकतब को जाते हुए एक बच्चे की आँखों से ये बात सुन कर अगर एक आँसू गिरा है उसे सैंत कर ताक़चे में सजा लो ख़लाओं के यख़-बस्ता बे-नूर पाताल में ये सितारा तुम्हारा सहारा बनेगा
Zafar Sayyad
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