सच्चा झूठा झूठा सच्चा वा'दा इक नादान का है जलते जलते राख हुआ मेरा मकाँ इम्कान सा है पत्ते टहनी शजर जो टूटे मसअला ये तूफ़ान का है रेत रेत बन उड़ता जाए वो जो कहे चट्टान सा है नदी परिंदे अंबर बोले सुनना उस की ज़बान का है सुना मैं ने दो बार सुना तीसरा इक गुमान सा है खेल नफ़रत का ठीक नहीं वो तेरे ही ज़ियान का है धर्म मोहब्बत जो अपनाए वो इंसान इंसान सा है
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"चलो बचपन उगाते हैं" चलो भली आदत बनाते हैं चलो ख़ुद को सिखाते हैं चलो बचपन उगाते हैं तजुर्बे ज़र्द से लगने लगे हैं कवर उन पर चढ़ाते हैं... चलो बचपन उगाते हैं... चलो सींचें वो बीता कल जुगत से चलो खेलें वही सब खेल कल के चलो उन गर्मियों की कुल्फ़ियों को फिर मनाते हैं चलो बचपन उगाते हैं के चुटकी एक ले कर मुस्कुराहट की मिलाते हैं समय की आँच पर यादों की हांडी फिर चढ़ाते हैं मिलाते हैं वो इक छोटा सा चम्मच बचपने का चलो मिल कर के फिर से वो ही नादानी पकाते हैं सुनहरा एक और सिक्का सुब्ह की धूप का चलका चलो शीशे के टुकड़े से, उसे घर भर घुमाते हैं या वो छोटा सा साबुन का गुबारा फूँक से हल्का अंगूठे और उँगली को मिलाकर फिर फुलाते हैं या डब्बे से चुरा कर गुड़ के लड्डू जेब में रख कर यारों को दिखा कर खाके सब को फिर जलाते हैं चलो बचपन उगाते हैं किसी के दस के गिनते ही..कहीं कोने में छुप कर के कभी चुपके से उस की पीठ पर धप्पा जमाते हैं चलो बचपन उगाते हैं
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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"राधा सा इंतिज़ार हो तुम" मेरी रगों में बहता इश्क़ बेशुमार हो तुम गंगा की पवित्र धारा और जमजम की बौछार हो तुम तुम सोचती हो कि बहुत समझदार हो तुम मेरे लिए तो बच्चों सी नादान हो तुम जो मेरी नज़रे बोलती हैं अक्सर, वही हर बात हो तुम बरसाने की गलियाँ हो और बनारस का घाट हो तुम विश्वाश, सद्भाव और प्रेम का प्रमाण हो तुम कृष्ण सी मोहब्बत और राधा सा इंतिज़ार हो तुम
Piyush soni
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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आज के दिन जो अपने डर का इज़हार किया तो कि मैं तो अपना लूँ उसे मौत ने इनकार किया तो वो कच्ची सी उम्र वो पक्का सा हादिसा इक काँच का महल आज संगसार किया तो इक रूप बाहर इक है पीछे और इक उन के बीच मैं ने ग़लत से प्यार किया तो दिल पर रख पत्थर या हो पत्थर दिल हू-ब-हू उन की तरह उन पय वार किया तो कि रुकती हैं साँसें लो रोक दी गईं फिर भी सोचा जाए तेरा इंतिज़ार किया तो
Geetanjali Geet
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किसी ने कहा कैसी पत्थर दिल है तू क्या ये कब हुआ नहीं तो इस दिल पर कुछ लगे चीख़ उठता है रोता है ख़ून बहाता है यक़ीनन पत्थर तो ऐसा नहीं करता या पत्थर की तबीअ'त में भी बदलाव आया है बदलाव उस मौसम की तरह बदलाव उस की बातों की तरह बदलाव उस मुक़फ़्फ़ल पड़े घर की तरह जो कभी झूमता था इक परिवार के होने से बदलाव जो इक रोते शख़्स को हँसा दे और हँसते को रुला दे बदलाव इस बदलाओ की तरह जो सब बदल दे ये कैसा बदलाव पत्थर पत्थर ही है या बदल गया मेरा दिल दिल ही है या बदल गया कोई तो है जो बदल गया मैं मैं ही हूँ या
Geetanjali Geet
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चले चले जाते हैं क़दम नज़रें मिलीं रुक जाते हैं क़दम मंज़िल ना दिखे मुड़ जाते हैं क़दम मंज़िल जो दिखे जुड़ जाते हैं क़दम सफ़र करते पैहम थक जाते हैं क़दम कुछ नोकीला चुभ जाए रो जाते हैं क़दम उस के पास आने से पीछे जाते हैं क़दम शर्म क्यूँ इतनी कर जाते हैं क़दम देख बैठ यहाँ से कहाँ जाते हैं क़दम वापस आते हैं या भटक जाते हैं क़दम ग़लत बहुत ग़ुस्से में उठ जाते हैं क़दम मिले जो सुर-ओ-ताल बहल जाते हैं क़दम वक़्त से तेज़ जाए जाते हैं क़दम वक़्त जो आए मर जाते हैं क़दम
Geetanjali Geet
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दर्द लिखा है अच्छा लिक्खा है दिल पर जो बीती वो कोई बात नहीं टूट कर लिखने लगी अच्छा लिखने लगी मोहब्बत है मुझ से वो कोई बात नहीं ख़ुश हूँ मैं ये क्या लिक्खा है लिखा है रो कर वो कोई बात नहीं आबाद हूँ मैं ये क्या लिक्खा है हाँ लिखा बर्बाद हो कर वो कोई बात नहीं चलते चलते थक गई अच्छा लिखा है पैहम मुझे पुकारती रही वो कोई बात नहीं हसरतें मरती चली गईं अच्छा लिखा है क़ातिल मैं हूँ ख़ैर वो कोई बात नहीं ख़ामोश सी हो गई हूँ ये क्या लिखा है क़ज़ा की अलामत है वो कोई बात नहीं जा रही हूँ ये क्या लिखा है अच्छा तो चली गई वो कोई बात नहीं
Geetanjali Geet
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कोई आए न आए तू आस लगाना छोड़ दे बहने न लगे अश्क आँखों से तेरी दिल से आँखों का रिश्ता निभाना छोड़ दे दौड़े जाती है मुस्कुराते इक दस्तक पर वो मोहब्बत है उदास हो दर से उसे वापस मोड़ दे बन जा बे-जान इक ज़िंदा लाश अकेले बैठ और कम्बख़्त सोचना छोड़ दे हाल तुझ से देखा नहीं जाता तो न देख पत्थर उठा और अपना आईना तोड़ दे तू कब से किसी के लिए ख़ास होने लगी बस कर अब इन बातों में आना छोड़ दे टूटते टूटते जो फिर टूट गया उसे उठा और सीने में वापस जोड़ दे दर्द से उठती है और दर्द में गिरती है सँभाल ख़ुद को और अब लिखना छोड़ दे
Geetanjali Geet
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