nazmKuch Alfaaz

कोई आए न आए तू आस लगाना छोड़ दे बहने न लगे अश्क आँखों से तेरी दिल से आँखों का रिश्ता निभाना छोड़ दे दौड़े जाती है मुस्कुराते इक दस्तक पर वो मोहब्बत है उदास हो दर से उसे वापस मोड़ दे बन जा बे-जान इक ज़िंदा लाश अकेले बैठ और कम्बख़्त सोचना छोड़ दे हाल तुझ से देखा नहीं जाता तो न देख पत्थर उठा और अपना आईना तोड़ दे तू कब से किसी के लिए ख़ास होने लगी बस कर अब इन बातों में आना छोड़ दे टूटते टूटते जो फिर टूट गया उसे उठा और सीने में वापस जोड़ दे दर्द से उठती है और दर्द में गिरती है सँभाल ख़ुद को और अब लिखना छोड़ दे

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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सच्चा झूठा झूठा सच्चा वा'दा इक नादान का है जलते जलते राख हुआ मेरा मकाँ इम्कान सा है पत्ते टहनी शजर जो टूटे मसअला ये तूफ़ान का है रेत रेत बन उड़ता जाए वो जो कहे चट्टान सा है नदी परिंदे अंबर बोले सुनना उस की ज़बान का है सुना मैं ने दो बार सुना तीसरा इक गुमान सा है खेल नफ़रत का ठीक नहीं वो तेरे ही ज़ियान का है धर्म मोहब्बत जो अपनाए वो इंसान इंसान सा है

Geetanjali Geet

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चले चले जाते हैं क़दम नज़रें मिलीं रुक जाते हैं क़दम मंज़िल ना दिखे मुड़ जाते हैं क़दम मंज़िल जो दिखे जुड़ जाते हैं क़दम सफ़र करते पैहम थक जाते हैं क़दम कुछ नोकीला चुभ जाए रो जाते हैं क़दम उस के पास आने से पीछे जाते हैं क़दम शर्म क्यूँ इतनी कर जाते हैं क़दम देख बैठ यहाँ से कहाँ जाते हैं क़दम वापस आते हैं या भटक जाते हैं क़दम ग़लत बहुत ग़ुस्से में उठ जाते हैं क़दम मिले जो सुर-ओ-ताल बहल जाते हैं क़दम वक़्त से तेज़ जाए जाते हैं क़दम वक़्त जो आए मर जाते हैं क़दम

Geetanjali Geet

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आज के दिन जो अपने डर का इज़हार किया तो कि मैं तो अपना लूँ उसे मौत ने इनकार किया तो वो कच्ची सी उम्र वो पक्का सा हादिसा इक काँच का महल आज संगसार किया तो इक रूप बाहर इक है पीछे और इक उन के बीच मैं ने ग़लत से प्यार किया तो दिल पर रख पत्थर या हो पत्थर दिल हू-ब-हू उन की तरह उन पय वार किया तो कि रुकती हैं साँसें लो रोक दी गईं फिर भी सोचा जाए तेरा इंतिज़ार किया तो

Geetanjali Geet

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किसी ने कहा कैसी पत्थर दिल है तू क्या ये कब हुआ नहीं तो इस दिल पर कुछ लगे चीख़ उठता है रोता है ख़ून बहाता है यक़ीनन पत्थर तो ऐसा नहीं करता या पत्थर की तबीअ'त में भी बदलाव आया है बदलाव उस मौसम की तरह बदलाव उस की बातों की तरह बदलाव उस मुक़फ़्फ़ल पड़े घर की तरह जो कभी झूमता था इक परिवार के होने से बदलाव जो इक रोते शख़्स को हँसा दे और हँसते को रुला दे बदलाव इस बदलाओ की तरह जो सब बदल दे ये कैसा बदलाव पत्थर पत्थर ही है या बदल गया मेरा दिल दिल ही है या बदल गया कोई तो है जो बदल गया मैं मैं ही हूँ या

Geetanjali Geet

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दर्द लिखा है अच्छा लिक्खा है दिल पर जो बीती वो कोई बात नहीं टूट कर लिखने लगी अच्छा लिखने लगी मोहब्बत है मुझ से वो कोई बात नहीं ख़ुश हूँ मैं ये क्या लिक्खा है लिखा है रो कर वो कोई बात नहीं आबाद हूँ मैं ये क्या लिक्खा है हाँ लिखा बर्बाद हो कर वो कोई बात नहीं चलते चलते थक गई अच्छा लिखा है पैहम मुझे पुकारती रही वो कोई बात नहीं हसरतें मरती चली गईं अच्छा लिखा है क़ातिल मैं हूँ ख़ैर वो कोई बात नहीं ख़ामोश सी हो गई हूँ ये क्या लिखा है क़ज़ा की अलामत है वो कोई बात नहीं जा रही हूँ ये क्या लिखा है अच्छा तो चली गई वो कोई बात नहीं

Geetanjali Geet

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