किस क़दर गराँ ठहरी मौसमों के साहिल पर आर-पार होती धुंद आईने की क़ातिल है शाम में निकलती धुंद दिल ज़रा सा बोझल था उस पे आन ठहरी है फिर से ये इकहरी धुंद आँख रौज़नों पर है किस तरह उतारुंगी वसवसों की फैली धुंद एक ज़र्द बारिश में और नींद लाएगी ख़्वाब की सुनहरी धुंद
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं
Arpit Sharma
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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आज रोज़-ए-गिर्या है चमचमाती आँखों से इक जहान बरसेगा रोग दर्द और ये ग़म दरमियान बरसेगा मेरी बे-नवाई पर ख़ाक-दान बरसेगा और बे-गुनाही पर आसमान बरसेगा
Uzma Naqvi
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ऐ मिरी जबीं-साई मेरे ज़र्द सज्दों का तू ही कुछ भरम रख ले ख़ुश्क सर्द जंगल में ना-रसा इरादों से मैं कहाँ ख़ुदा ढूँडूँ
Uzma Naqvi
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तेरे रुख़ की ज़िया में ये आँखें खो तो सकती हैं सो नहीं सकतीं
Uzma Naqvi
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पूरी बात कहने की कब मुझे इजाज़त है पूरी बात सुनने की आप को क्या ज़रूरत है आप इल्म के दाई' आप सोच के रहबर आप ही मोहब्बत के क़ाएदे बनाते हैं आप ही रिफ़ाक़त के सब हुनर बताते हैं आप के तबस्सुम को मैं ने गर कभी खोजा पिछले कितने जन्मों के इश्क़ के खंडर निकले आँ-जनाब के सारे दर्द मो'तबर निकले आप मुस्कुराते हैं मुस्कुराते रहिए तो पूरी बात कहने की कब मुझे इजाज़त है मैं कि एक औरत हूँ या कि फिर मोहब्बत हूँ आधी बात कहती हूँ पूरा दुख उठाती हूँ
Uzma Naqvi
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किसे ता'मीर होना है किसे मिस्मार रहना है किसे ख़्वाब-ए-मुसलसल की फ़ज़ा-बंदी में जीना है किसे नींदों से हट कर आँसुओं से हिज्र को आसान करना है किसे ख़ामोश रहना है किसे एलान करना है
Uzma Naqvi
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