nazmKuch Alfaaz

आओ दूर चलें पीपल की हरी हरी छाँव में बैठ के दिल बहलाएँ शहर की इस गहमा-गहमी में अब तो जी घबराता है रानी देखो इस नगरी में न कोई कृष्न न राधा है ये तो शहर है प्यारी कारोबारी दुनिया है मन से ख़ाली तन वाले हैं धन ही उन का गहना है झूटी रस्में झूटे बंधन झूटा उन का प्यार कारोबारी ज़ेहनों वाले होते हैं खूँ-ख़्वार धन दौलत में तोल के देखें हर निर्धन का प्यार शहर में क्या रक्खा है आओ दूर चलें हरे भरे खेतों में चल के अपने ज़ख़्म सिएँ दूर कहीं मंदिर के पीछे बैठ के दिल बहलाएँ दूर कहीं पीपल के नीचे मन की जोत जगाएँ आओ ग़म को भूल भी जाएँ आओ शहर से दूर चलें

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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सर्दियों के मौसम में पिछली रात को छत पर हम जो एक दूजे से चाँदनी की बारिश में बे-ज़बान जज़्बों की ख़ुशबुओं से मिलते थे हुस्न-ए-दिलरुबा तेरा लफ़्ज़ की हक़ीक़त से कितना बे-तअल्लुक़ था अन-कहा सुना सब कुछ लम्हा-ए-मसर्रत था जब से लब-कुशाई के सिलसिले हुए जारी तेरी मेरी बहसों ने अन-कहा सुना सब कुछ मंतिक़ों दलीलों के वाहिमों से गदलाया और फिर मोहब्बत के सब गुलाब सँवलाए आज अज्नबिय्यत की बे-समर फ़ज़ाओं में हम कि एक दूजे से कितने बे-तअल्लुक़ हैं अव्वलीं रिफ़ाक़त की सारी ख़स्लतें खो कर इस बिसात-ए-हस्ती पर सिर्फ़ दो पयादे हैं

Yusuf Kamran

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तू कभी रातों की तन्हाई में मेरे पास आ मेरे कानों से मिरी ख़ामोशियों के साज़ सुन तू मिरी आवाज़ सुन मेरी आँखों में मचलते मोतियों के रंग देख तू कभी क़ल्ब-ओ-नज़र की जंग देख देख मैं किन एहतियातों के सुनहरी जाल को दर्द में डूबी हुई छाँव के इस जंजाल को आरज़ूओं के झरोकों में सुलगती हड्डियों के गिर्द चिमटाए हुए ख़्वाहिशों की आग को फिर ध्यान की चुनरी में कफ़्नाए हुए मुंतज़िर हूँ फिर उसी आवाज़ का ज़िंदगी के साज़ का तू कभी रातों की तन्हाई में मेरे पास आ

Yusuf Kamran

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ये आग पानी हवा ये मिट्टी ये वाहिमों की करिश्मा-साज़ी ये इल्म-ओ-फ़न के तमाम क़िस्से ये अक़्ल-ओ-दानिश की सारी बातें ये सब दिलासे बनावटी हैं मैं दोस्तों दुश्मनों की ज़द में हूँ हर कोई पेश-गोइयों के दराज़ क़िस्से सुना रहा है कि सब को अपने करंसी नोटों की फ़िक्र है हर कोई तलब और रसद के चक्कर में अपने भाव चढ़ा रहा है खुली फ़ज़ाओं में पर समेटे हुए परिंदे भी आने वाली सऊबतों के मुहीब मंज़र दिखा रहे हैं ये क्या है सब कुछ कि कुछ नहीं है हवा से की दस्तरस से बाला मिरे लिए सिर्फ़ वो सदाक़त है जो मिरे जिस्म-ओ-जाँ को छू कर गुज़र रही है कि मैं हक़ीक़ी मुशाहिदों तजरबों की भट्टी में जल रहा हूँ ये आग पानी हवा न मिट्टी है सिर्फ़ मैं हूँ ये सिर्फ़ मैं हूँ

Yusuf Kamran

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रात फिर यूँँ हुआ अध खुले आसमाँ पर परिंदों की चीख़ों में लिपटे हुए ख़्वाहिशों के बदन तिलमिलाने लगे मेरे कानों में मेरे दहकते हुए ख़ून की रंग की नूर की सीटियाँ सी बजीं फिर इरादों की छाती में नीली रगें मुंजमिद हो गईं फिर बदन की फ़सीलों के साए बने जुम्बिशों में वही सरसराहट हुई फिर मिरे जिस्म की दूधिया चाँदनी हर तरफ़ छा गई और मैं जिस्म-ओ-जाँ की शिकन-दर-शिकन उलझनों को समेटे हुए सो गया रात फिर यूँँ हुआ

Yusuf Kamran

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कल शाम नहर की पटरी के साथ साथ मैं अपने ना-तवाँ कंधों पर एक शिकस्ता बोरी उठाए जा रहा था कि चीख़-ओ-पुकार शुरूअ' हुई पकड़ो पकड़ो क़ातिल क़ातिल नहर पर मुतअय्यन पुलीस चौकी के मुस्तइद अमले ने संगीनों से मेरा तआ'क़ुब किया मैं अपनी तमाम-तर क़ुव्वत से भागने के बावजूद चंद ही लम्हों में उन की आहनी गिरफ़्त में था पुलीस चौकी में सवालों की बोछाड़ से मेरी क़ुव्वत-ए-गोयाई जवाब दे गई एक मकरूह सूरत मोंछों वाला बा-वर्दी शख़्स वहशत-नाक आँखों से अमले की तरफ़ देखते हुए अपनी शदीद करख़्त आवाज़ में चीख़ा बोरी का मुँह खोलो सारा अमला शश्दर रह गया कि बोरी में लिपटी हुई लाश मेरी ही थी और मैं चुप साधे उसे तक रहा था

Yusuf Kamran

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