nazmKuch Alfaaz

"लौट आना" सुख उन्हें भी कब मिला है पर पिता ने ये लिखा है देख तू चिंता न करना इस समय धीरज सा धरना है निशा का घोर डेरा दूर दिखता है सवेरा भूलना तुम ये नहीं पर काल की गति है निरंतर कुछ यहाँ रुकता नहीं है कल कहीं था कल कहीं है याद रखना बात मेरी सुख का आना और देरी ये नियम कब टूटता है हर किसी पर बीतता है प्राण है तू बस हमारा आँख का ओझल सितारा धैर्य तू क्यूँ खो रहा है इस तरह क्यूँ रो रहा है प्राण अपने खो पड़ूँगा तू जो रोया रो पड़ूँगा हारने का भय न करना दुर्ग़मों की जय न करना शैल ही तेरा पता हो पर नदी को रास्ता हो ये न ढूँढो क्या कहाँ है मैं यहाँ हूँ माँ यहाँ है बोझ यदि भारी लगे तो यदि थकन हारी लगे तो हर तपन को भूल जाना दुख मिले तो लौट आना दुख मिले तो लौट आना

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"ख़ूब-सूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उस का मुखड़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत बहुत क़ातिलाना है उस की निगाहें बहुत जानलेवा है उस की अदाएँ लगाई है जो उस ने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैं ने ज़रा गुफ़्तुगू कर के देखा है मैं ने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उस में हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उस का मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत

Danish Balliavi

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"तलाश-ए-हक़" तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू हदफ़ को देख दुनिया के उसे पहचान उस की जुस्तजू में रात-दिन लग जा तुझे हक़ भी मिलेगा उस तलक जाने का रस्ता भी मगर वो रास्ता चुन ले तो फिर तो ज़ख़्म खाने को जिगर भी साथ ले आना सितम पर मुस्कुराने का हुनर भी साथ ले आना यही है इंतिहा उस की यही अंजाम होता है कि इस रस्ते पे चलने का यही ईनाम होता है मगर इस रास्ते पर ज़ख़्म खाने का मज़ा कुछ और है सुन ले यहाँ पर जान देने की जज़ा कुछ और है सुन ले अगर तू अज़्म कर ले बस ज़रा सा हौसला कर ले तो फिर कल क्या पता जब फिर कोई हक़ का हो जोइंदा निशाँ रस्ते लहू के तेरे कोई नक़्श-ए-पा कर ले कि ये दुनिया तो फ़ानी है ये जाँ तो यूँँ भी जानी है तलाश-ए-हक़ है गर तुझ को नज़र को तीरों के रुख़ पर लगा दे तू

Dharmesh bashar

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