बे-सबब तो न थीं तिरी यादें तेरी यादों से क्या नहीं सीखा ज़ब्त का हौसला बढ़ा लेना आँसुओं को कहीं छुपा लेना काँपती डोलती सदाओं को चुप की चादर से ढाँप कर रखना बे-सबब भी कभी कभी हँसना जब भी हो बात कोई तल्ख़ी की मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू बदल देना बे-सबब तो नहीं तिरी यादें तेरी यादों से क्या नहीं सीखा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"अजीब" कितना अजीब हूँ मैं अक्सर उदास रहता हूँ तन्हाई से बातें करता हूँ महफ़िल में ऊब जाता हूँ चाँद को छूना चाहता हूँ सूरज कि तरह जलता हूँ फूलों से नफरत करता हूँ काँटों को पसंद करता हूँ पेड़ के नीचे सोता हूँ रेत पर घर करता हूँ भूलने की कोशिश करता हूँ बात भी तिरी करता हूँ शायद बहुत अजीब हूँ मैं ख़ुद से सवाल करता हूँ
ALI ZUHRI
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस के सारे आँसू गंगा जल में बदल रहे थे उस दिन उस के होंठ गुलाबी नीलकमल में बदल रहे थे उस दिन आँखों के सपने काले बादल में बदल रहे थे उस दिन हम दोनों के निर्णय अंतिम पल में बदल रहे थे उस दिन कुछ पाने की आशा नहीं मगर सब कुछ खोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन उस की दो आँखों में अनबोये बबूल उग आए उस दिन आँखें पछतातीं थीं क्यूँ सपने फिजूल उग आए उस दिन दोनों के चेहरों पर चारों तरफ़ शूल उग आए उस दिन जहाँ गिरे थे आँसू फौरन वहाँ फूल उग आए उस दिन पता चला था हम को फूल नहीं आँसू बोना था उस दिन हमें अलग होना था उस दिन दोनों हर दुविधा को कर स्वीकार लिपट कर रोए उस दिन दोनों जग से छुप कर नदिया पार लिपट कर रोए उस दिन हर-पल ख़ुश रहने वाले त्योहार लिपट कर रोए उस दिन दोनों पहले पहले अंतिम बार लिपट कर रोए उस दिन की यादों को सारे जीवन दोनों को ढोना था उस दिन हमें अलग होना था
Gyan Prakash Akul
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सदाक़त-ए-इश्क़ इश्क़ की तुम हक़ीक़त समझ लो इस को ग़म से गुज़रना पड़ेगा उन की यादों में मसरूफ़ हो तुम उन की यादों में रहना पड़ेगा दर्द-ए-दिल अपना तुझ को सुनाऊँ जी तो करता है तुझ को सुनाऊँ तेरी आँखों से कह देंगी आँसू अब मुझे भी निकलना पड़ेगा अपने भी रूठ जाएँगे तेरे रिश्ते भी छूट जाएँगे तेरे लोग तुझ को कहेंगे निकम्मा ऐसा लम्हा भी सहना पड़ेगा तू भरोसा भी करता है जिस पे बे-वजह होगा नाराज़ तुझ से होता अक्सर यहाँ ऐसा आशिक़ इश्क़ से हाँ मुकरना पड़ेगा वो तुझे भूल जाएँगे ऐसे जाने ज़िंदा रहेगा तू कैसे मशवरा बस यही देगा 'दानिश' अलविदा तुझ को कहना पड़ेगा
Danish Balliavi
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मुझे हर काम से पहले सहरस शाम से पहले यही इक काम करना है तुम्हारा नाम लेना है तुम्हीं को याद करना है कि जब भी दर्द पीना है कि जब भी ज़ख़्म सीना है ग़म-ए-दुनिया से घबरा कर मुझे जब जाम लेना है तुम्हारा नाम लेना है तुम्हीं को याद करना है तुम्हारी याद है दिल में कि इक सय्याद है दिल में कोई बर्बाद है दिल में उसे आबाद करना है तुम्हारा नाम लेना है तुम्हीं को याद करना है
Wasi Shah
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ख़्वाब और ख़ुशबू दोनों ही आज़ादा रूहें दोनों क़ैद नहीं हो सकते मेरे ख़्वाब तुम्हारी ख़ुशबू
Wasi Shah
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जब रात की नागिन डसती है नस नस में ज़हर उतरता है जब चाँद की किरनें तेज़ी से उस दिल को चीर के आती हैं जब आँख के अंदर ही आँसू सब जज़्बों पर छा जाते हो तब याद बहुत तुम आते हो जब दर्द की झानजर बजती है जब रक़्स ग़मों का होता है ख़्वाबों की ताल पे सारे दुख वहशत के साज़ बजाते हैं गाते हैं ख़्वाहिश की लय में मस्ती में झूमते जाते हैं सब जज़्बों पर छा जाते हो तब याद बहुत तुम आते हो
Wasi Shah
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कल हमेशा की तरह उस ने कहा ये फ़ोन पर मैं बहुत मसरूफ़ हूँ मुझ को बहुत से काम हैं इस लिए तुम आओ मिलने मैं तो आ सकती नहीं हर रिवायत तोड़ कर इस बार मैं ने कह दिया तुम जो हो मसरूफ़ तो मैं भी बहुत मसरूफ़ हूँ तुम जो हो मशहूर तो मैं भी बहुत मारूफ़ हूँ तुम अगर ग़मगीन हो मैं भी बहुत रंजूर हूँ तुम थकन से चूर तो मैं भी थकन से चूर हूँ जान-ए-मन है वक़्त मेरा भी बहुत ही क़ीमती कुछ पुराने दोस्तों ने मिलने आना है अभी मैं भी अब फ़ारिग़ नहीं मुझ को भी लाखों काम हैं वर्ना कहने को तो सब लम्हे तुम्हारे नाम हैं मेरी आँखें भी बहुत बोझल हैं सोना है मुझे रतजगों के बा'द अब नींदों में खोना है मुझे मैं लहू अपनी अनाओं का बहा सकता नहीं तुम नहीं आतीं तो मिलने मैं भी आ सकता नहीं उस को ये कह के 'वसी' मैं ने रिसीवर रख दिया और फिर अपनी अना के पाँव पे सर रख दिया
Wasi Shah
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काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता तू बड़े प्यार से चाव से बड़े मान के साथ अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को और बे-ताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को मैं तिरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती तेरे होंटों की में हिद्दत से दहक सा जाता रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती मरमरीं हाथ का इक तकिया बनाया करती मैं तिरे कान से लग कर कई बातें करता तेरी ज़ुल्फ़ों को तिरे गाल को चूमा करता जब भी तू बंद-ए-क़बा खोलने लगती जानाँ अपनी आँखों को तिरे हुस्न से ख़ीरा करता मुझ को बेताब सा रखता तिरी चाहत का नशा मैं तिरी रूह के गुलशन में महकता रहता मैं तिरे जिस्म के आँगन में खनकता होता कुछ नहीं तो यही बे-नाम सा बंधन होता काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
Wasi Shah
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