क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को जैसे क़ासिद कोई इक प्यार में डूबे ख़त को बंद दरवाज़े के पल्लों में फँसा देता है और ख़त देख के इक इश्क़ में पाबंद नज़र दिल-ए-माशूक़ की हर बात समझ जाती है तू खिंची आती है यूँँ हौले से मेरी जानिब ख़ाना-ए-दिल में उसी प्यार भरे ख़त की तरह हसरत-ए-चश्म मिरी तुझ में सिमट जाती है ज़ेहन में अज़्म निगाहों में कई ख़्वाब लिए शाख़-ए-दिल में मिरी तू रिसती चली आती है रंग और नूर फ़ज़ा का भी सँवर जाता है मिरे जज़्बात को तू इश्क़ सिखा जाती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को तेरी आँखों का तसव्वुर तिरे गालों की महक जज़्बा-ए-रूह में तूफ़ान उठा जाते हैं ज़ेहन-ओ-दिल पर लिखे तारीख़ के पन्ने पन्ने तेरी चाहत में यूँँही मिटते चले जाते हैं आतिश-ए-इश्क़ से खुलता हुआ कुंदन सा बदन ख़ुद-ब-ख़ुद नक़्श हुआ जाता है जान-ओ-दिल पर ख़ुद-ब-ख़ुद पाँव निकल पड़ते हैं तेरी जानिब बाग़बाँ दिल को कोई जैसे कि मिल जाता है और हर सम्त फ़क़त तू ही नज़र आती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को क्यूँँ ये महसूस मुझे होता है लम्हा लम्हा मेरी दुनिया तिरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं आज तू ही तो है दस्तूर तसव्वुर का मिरे जैसे दुनिया में मिरा तेरे सिवा कोई नहीं मेरी शाख़ों पे तिरे नाम के गुल खिलते हैं मेरे पत्तों में तिरे रंग हरे बहते हैं आज पैरों में थिरकते हैं तिरे नाज़-ओ-अदा मेरे नग़्मों को तू पुर-कैफ़ बना देती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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कौन है जो मुझे आज छू कर गया किस का मैं बातों ही बातों में हो गया मेरी अंगड़ाइयों का सबब कौन है ज़ेहन किस ख़्वाब में आज कल खो गया कौन है जो मुझे आज छू कर गया धीरे से चुपके से बात किस की चली किस के लब पे अचानक नज़र टिक गई ठहरे ठहरे क़दम क्यूँँ लगे भागने किस की बातों पे हम दिल लगे थामने कौन है जो मुझे आज छू कर गया मेरी आँखों में तस्वीर जिस की बनी शर्म की चादरों में वो आ के छुपी आज कुछ यूँँ सिमटने लगी है डगर जैसे मंज़िल ने ख़ुद तय किया हो सफ़र कौन है जो मुझे आज छू कर गया
Vinod Kumar Tripathi Bashar
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लोग क्यूँँ ढूँडें ख़ुदाई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं मैं मचलता हूँ घरोंदों के लिए ऊँची नीची सी पसंदों के लिए जाना अन-जाना सफ़र है अपना चंद ख़्वाबों का नगर है अपना कोई ढूँडे क्यूँँ बुराई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं पैरों में पड़तीं कभी ज़ंजीरें फिर कभी तूफ़ाँ बनें तदबीरें टूट जाता हूँ कभी दो पल में हूँ मैं चट्टान कभी मुश्किल में कोई ढूँडे क्यूँँ सफ़ाई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं
Vinod Kumar Tripathi Bashar
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चलो घर चलें चाँद छुपने लगा है समुंदर भी लगता है सोने चला है हवाओं की रफ़्तार थम सी गई है न आएगा कोई सहर हो चली है न अब पास में कोई पत्थर बचा है न अब बाज़ुओं में असर रह गया है सड़क की सभी रौशनी बुझ गई है अँधेरा हटा राह दिखने लगी है न आहट है कोई न कोई भरम है थकी आरज़ू और बोझल क़दम है नज़र पर बग़ावत असर कर रही है ज़मीं भीग कर तर-ब-तर हो चली है चलो घर चलें चाँद छुपने लगा है
Vinod Kumar Tripathi Bashar
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आज क़ासिद को इधर से जो गुज़रते दिखा मुझ को ऐसा लगा जैसे कि तिरा ख़त आया तू नहीं फिर भी चला करती है दुनिया मेरी अब तो महसूस नहीं होती कभी तेरी कमी जाने दहलीज़ पे उतरा था वो किस का साया यूँँ लगा जैसे कि अपना कोई वापस आया तू मुझे याद न आए कभी ऐसा न हुआ फिर भी रो रो के गुज़र होता हो ये भी न हुआ जाने क्या सोच के इन आँखों में आँसू आए आज नाज़ुक से कई लम्हे मुझे याद आया आज क़ासिद को इधर से जो गुज़रते देखा मुझ को ऐसा लगा जैसे कि तेरा ख़त आया
Vinod Kumar Tripathi Bashar
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