nazmKuch Alfaaz

आज क़ासिद को इधर से जो गुज़रते दिखा मुझ को ऐसा लगा जैसे कि तिरा ख़त आया तू नहीं फिर भी चला करती है दुनिया मेरी अब तो महसूस नहीं होती कभी तेरी कमी जाने दहलीज़ पे उतरा था वो किस का साया यूँँ लगा जैसे कि अपना कोई वापस आया तू मुझे याद न आए कभी ऐसा न हुआ फिर भी रो रो के गुज़र होता हो ये भी न हुआ जाने क्या सोच के इन आँखों में आँसू आए आज नाज़ुक से कई लम्हे मुझे याद आया आज क़ासिद को इधर से जो गुज़रते देखा मुझ को ऐसा लगा जैसे कि तेरा ख़त आया

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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कौन है जो मुझे आज छू कर गया किस का मैं बातों ही बातों में हो गया मेरी अंगड़ाइयों का सबब कौन है ज़ेहन किस ख़्वाब में आज कल खो गया कौन है जो मुझे आज छू कर गया धीरे से चुपके से बात किस की चली किस के लब पे अचानक नज़र टिक गई ठहरे ठहरे क़दम क्यूँँ लगे भागने किस की बातों पे हम दिल लगे थामने कौन है जो मुझे आज छू कर गया मेरी आँखों में तस्वीर जिस की बनी शर्म की चादरों में वो आ के छुपी आज कुछ यूँँ सिमटने लगी है डगर जैसे मंज़िल ने ख़ुद तय किया हो सफ़र कौन है जो मुझे आज छू कर गया

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को जैसे क़ासिद कोई इक प्यार में डूबे ख़त को बंद दरवाज़े के पल्लों में फँसा देता है और ख़त देख के इक इश्क़ में पाबंद नज़र दिल-ए-माशूक़ की हर बात समझ जाती है तू खिंची आती है यूँँ हौले से मेरी जानिब ख़ाना-ए-दिल में उसी प्यार भरे ख़त की तरह हसरत-ए-चश्म मिरी तुझ में सिमट जाती है ज़ेहन में अज़्म निगाहों में कई ख़्वाब लिए शाख़-ए-दिल में मिरी तू रिसती चली आती है रंग और नूर फ़ज़ा का भी सँवर जाता है मिरे जज़्बात को तू इश्क़ सिखा जाती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को तेरी आँखों का तसव्वुर तिरे गालों की महक जज़्बा-ए-रूह में तूफ़ान उठा जाते हैं ज़ेहन-ओ-दिल पर लिखे तारीख़ के पन्ने पन्ने तेरी चाहत में यूँँही मिटते चले जाते हैं आतिश-ए-इश्क़ से खुलता हुआ कुंदन सा बदन ख़ुद-ब-ख़ुद नक़्श हुआ जाता है जान-ओ-दिल पर ख़ुद-ब-ख़ुद पाँव निकल पड़ते हैं तेरी जानिब बाग़बाँ दिल को कोई जैसे कि मिल जाता है और हर सम्त फ़क़त तू ही नज़र आती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को क्यूँँ ये महसूस मुझे होता है लम्हा लम्हा मेरी दुनिया तिरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं आज तू ही तो है दस्तूर तसव्वुर का मिरे जैसे दुनिया में मिरा तेरे सिवा कोई नहीं मेरी शाख़ों पे तिरे नाम के गुल खिलते हैं मेरे पत्तों में तिरे रंग हरे बहते हैं आज पैरों में थिरकते हैं तिरे नाज़-ओ-अदा मेरे नग़्मों को तू पुर-कैफ़ बना देती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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लोग क्यूँँ ढूँडें ख़ुदाई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं मैं मचलता हूँ घरोंदों के लिए ऊँची नीची सी पसंदों के लिए जाना अन-जाना सफ़र है अपना चंद ख़्वाबों का नगर है अपना कोई ढूँडे क्यूँँ बुराई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं पैरों में पड़तीं कभी ज़ंजीरें फिर कभी तूफ़ाँ बनें तदबीरें टूट जाता हूँ कभी दो पल में हूँ मैं चट्टान कभी मुश्किल में कोई ढूँडे क्यूँँ सफ़ाई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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चलो घर चलें चाँद छुपने लगा है समुंदर भी लगता है सोने चला है हवाओं की रफ़्तार थम सी गई है न आएगा कोई सहर हो चली है न अब पास में कोई पत्थर बचा है न अब बाज़ुओं में असर रह गया है सड़क की सभी रौशनी बुझ गई है अँधेरा हटा राह दिखने लगी है न आहट है कोई न कोई भरम है थकी आरज़ू और बोझल क़दम है नज़र पर बग़ावत असर कर रही है ज़मीं भीग कर तर-ब-तर हो चली है चलो घर चलें चाँद छुपने लगा है

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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