nazmKuch Alfaaz

लोग क्यूँँ ढूँडें ख़ुदाई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं मैं मचलता हूँ घरोंदों के लिए ऊँची नीची सी पसंदों के लिए जाना अन-जाना सफ़र है अपना चंद ख़्वाबों का नगर है अपना कोई ढूँडे क्यूँँ बुराई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं पैरों में पड़तीं कभी ज़ंजीरें फिर कभी तूफ़ाँ बनें तदबीरें टूट जाता हूँ कभी दो पल में हूँ मैं चट्टान कभी मुश्किल में कोई ढूँडे क्यूँँ सफ़ाई मुझ में आदमी हूँ मैं फ़रिश्ता तो नहीं

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को जैसे क़ासिद कोई इक प्यार में डूबे ख़त को बंद दरवाज़े के पल्लों में फँसा देता है और ख़त देख के इक इश्क़ में पाबंद नज़र दिल-ए-माशूक़ की हर बात समझ जाती है तू खिंची आती है यूँँ हौले से मेरी जानिब ख़ाना-ए-दिल में उसी प्यार भरे ख़त की तरह हसरत-ए-चश्म मिरी तुझ में सिमट जाती है ज़ेहन में अज़्म निगाहों में कई ख़्वाब लिए शाख़-ए-दिल में मिरी तू रिसती चली आती है रंग और नूर फ़ज़ा का भी सँवर जाता है मिरे जज़्बात को तू इश्क़ सिखा जाती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को तेरी आँखों का तसव्वुर तिरे गालों की महक जज़्बा-ए-रूह में तूफ़ान उठा जाते हैं ज़ेहन-ओ-दिल पर लिखे तारीख़ के पन्ने पन्ने तेरी चाहत में यूँँही मिटते चले जाते हैं आतिश-ए-इश्क़ से खुलता हुआ कुंदन सा बदन ख़ुद-ब-ख़ुद नक़्श हुआ जाता है जान-ओ-दिल पर ख़ुद-ब-ख़ुद पाँव निकल पड़ते हैं तेरी जानिब बाग़बाँ दिल को कोई जैसे कि मिल जाता है और हर सम्त फ़क़त तू ही नज़र आती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को क्यूँँ ये महसूस मुझे होता है लम्हा लम्हा मेरी दुनिया तिरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं आज तू ही तो है दस्तूर तसव्वुर का मिरे जैसे दुनिया में मिरा तेरे सिवा कोई नहीं मेरी शाख़ों पे तिरे नाम के गुल खिलते हैं मेरे पत्तों में तिरे रंग हरे बहते हैं आज पैरों में थिरकते हैं तिरे नाज़-ओ-अदा मेरे नग़्मों को तू पुर-कैफ़ बना देती है क्या कहूँ तुझ को मैं क्या कह के पुकारों तुझ को

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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कौन है जो मुझे आज छू कर गया किस का मैं बातों ही बातों में हो गया मेरी अंगड़ाइयों का सबब कौन है ज़ेहन किस ख़्वाब में आज कल खो गया कौन है जो मुझे आज छू कर गया धीरे से चुपके से बात किस की चली किस के लब पे अचानक नज़र टिक गई ठहरे ठहरे क़दम क्यूँँ लगे भागने किस की बातों पे हम दिल लगे थामने कौन है जो मुझे आज छू कर गया मेरी आँखों में तस्वीर जिस की बनी शर्म की चादरों में वो आ के छुपी आज कुछ यूँँ सिमटने लगी है डगर जैसे मंज़िल ने ख़ुद तय किया हो सफ़र कौन है जो मुझे आज छू कर गया

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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चलो घर चलें चाँद छुपने लगा है समुंदर भी लगता है सोने चला है हवाओं की रफ़्तार थम सी गई है न आएगा कोई सहर हो चली है न अब पास में कोई पत्थर बचा है न अब बाज़ुओं में असर रह गया है सड़क की सभी रौशनी बुझ गई है अँधेरा हटा राह दिखने लगी है न आहट है कोई न कोई भरम है थकी आरज़ू और बोझल क़दम है नज़र पर बग़ावत असर कर रही है ज़मीं भीग कर तर-ब-तर हो चली है चलो घर चलें चाँद छुपने लगा है

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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आज क़ासिद को इधर से जो गुज़रते दिखा मुझ को ऐसा लगा जैसे कि तिरा ख़त आया तू नहीं फिर भी चला करती है दुनिया मेरी अब तो महसूस नहीं होती कभी तेरी कमी जाने दहलीज़ पे उतरा था वो किस का साया यूँँ लगा जैसे कि अपना कोई वापस आया तू मुझे याद न आए कभी ऐसा न हुआ फिर भी रो रो के गुज़र होता हो ये भी न हुआ जाने क्या सोच के इन आँखों में आँसू आए आज नाज़ुक से कई लम्हे मुझे याद आया आज क़ासिद को इधर से जो गुज़रते देखा मुझ को ऐसा लगा जैसे कि तेरा ख़त आया

Vinod Kumar Tripathi Bashar

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