nazmKuch Alfaaz

"तुम्हें होना था मेरा" पन्ना पन्ना फट गया दिल मेरा तुम पढ़ न पाए लिखे थे जो ख़त तुम्हें,कभी स्कूल कॉलेज में नामाबर से पूछते थक गए,मगर जवाब नहीं आए तुम्हें होना था मेरा, तुम मुझे छोड़ कर किसी और के हिस्से में आए क्या लाल,पीला क्या हरा नीला,फीका ही रहा रंग इश्क़ का इश्क़ में तुम्हारे बा'द किसी के हो न पाए निक़ाह क़ुबूल हो गया तुम्हारा हम हिज्र काटते रह गए सब कुछ हुआ हम विसाल-ए-यार न हो पाए बहुत कुछ रहा वाबस्ता देहर में,बस हम ही वाबस्ता न रह पाए तुम्हें होना था मेरा,तुम मुझे छोड़ कर किसी और के हिस्से में आए

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"बिन तेरे" बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी आ दो पल पास बैठ मेरे ज़िन्दगी की घड़ी कर दे पूरी मुकम्मल न हुई ये ज़मीं न मुकम्मल ये आसमाँ हुआ अधूरा तेरे बिन सारा कारवाँ हुआ बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी तेरे बिन ये बूंदे ये बारिश कुछ भी मेरा न हुआ बस जलता दिख रहा है तेरी यादों का धुआँ सोचता हूँ जब मैं लगता है जैसे कुछ न हुआ बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी आ दो पल पास बैठ मेरे ज़िन्दगी की घड़ी कर दे पूरी आग लगी है जो मन में कैसे मैं किसी को बताऊँ क्यूँँ न तुझ को मैं चाहूँ कोई वजह तो मुझ को बताओ कड़कती बिजली अँधेरी शाम धीमी सी बारिश महीना सावन का लाया आज फिर कोई मेरी यादों में तेरे जैसा ही हू-ब-हू याद आया बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी आ दो पल पास बैठ मेरे ज़िन्दगी की घड़ी कर दे पूरी

Pankaj murenvi

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"अगर तू होता" अगर तू होता मुसाफ़िर तो मुझे तेरी मंज़िल होना क़ुबूल होता अगर तू होता छँद तो मुझे तेरी कविता होना क़ुबूल होता अगर तू लिखता इश्क़ तो मुझे तेरे पन्नो में क़ैद होना क़ुबूल होता अगर तू गुज़रता हवा सा तो मुझे तेरे झुमके होना क़ुबूल होता अगर तू होता क़ैद खाना तो मुझे मुज़रिम होना क़ुबूल होता अगर तू होता तो सब हसीन तेरे बगैर सब कुछ फ़िज़ूल होता अगर तू होता साथ तो क्या ख़ुशियाँ ग़म भी क़ुबूल होता तू जैसा भी होता मुझे क़ुबूल होता?

Pankaj murenvi

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