झिलमिलों की आड़ में रक़्साँ दर्द की आँधी शोर मचा कर पानी की दीवार उठा कर वक़्त की सरहद तोड़ रही है पानी की दीवार में क़तरा क़तरा रौज़न खोल रही है आँखें अपने हाथ बढ़ाए रौज़न के उस पार खुली हैं अक्स की तह में अक्स को छू कर देख रही हैं भीगे चेहरे जिस्मों की मोहतात फ़सीलों पर चिपके बे-ख़ुद पैराहन दीवारों पर गीले तीरों की बौछारों की तहरीरें नश्शे में गुम पेड़ों के ख़्वाबीदा पत्ते निखरी घास में चाँदी के लबरेज़ कटोरे सहर-ज़दा गलियों की भीगी भीगी आँखें और अँगड़ाई लेती धरती की पोरों से उठती सरशारी की ख़ुशबू पर ऐसे में जल कर बिजली दहाड़ के हाथ झटक देती है पानी की दीवार के पीछे सब मंज़र धुँदला देती है वक़्त की बाढ़ लगा देती है
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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पीने वाले दहन लब-ए-दरिया प्यास बुझने के मंज़रों का फ़िशार सुर्ख़ होंटों से वो टपकता लहू पपड़ियाँ जा-ब-जा चटख़ती हैं ख़ुश्क होंटों में गड़े जाते हैं ख़ार और इधर होंट जो नमी से दो-चार
Faisal Azeem
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लिबास जल कर मिरे बदन पर चिपक गया है बदन मुसलसल सुलग रहा है कहीं कहीं भूले भटके शो'ले उठा के लौ सर की अब भी बाहर को झूलते हैं जिन्हें मैं अपनी जली हथेली की पुश्त से ख़ुद दबा रहा हूँ अलाव से बाहर आ के दहशत-ज़दा निगाहों से देखता हूँ कहीं से अब ऐम्बुलेंस आएगी मेरी जानिब कोई मसीहा-नफ़स सँभालेगा आगे बढ़ कर मगर यहाँ तो कोई मसीहा-नफ़स नहीं है मैं चीख़ता हूँ कोई तो होगा कोई तो बे-इख़्तियार मेरी तरफ़ भी आए बदन से चिमटी क़बा को ख़ुद ही बची खुची उँगलियों की पोरों स छू के महसूस कर रहा हूँ कि जिस्म है या जला हुआ पैरहन है मेरा जो मेरी मिट्टी में धँस रहा है अज़िय्यतों की गवाही देता है ख़लिया ख़लिया जकड़ चुका हूँ मैं इस की परतों में चाहता हूँ कि खींच डालूँ उतार फेंकूँ इसे मगर अब इसे उतारूँ तो खाल मेरी ही खींच लेगा और इन सुलगती बची खुची उँगलियों की पोरों से नाख़ुनों से कुरेदना भी नहीं है बस में जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा क़फ़स है जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा बदन है
Faisal Azeem
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एक दीवार और उस पर वो मिरे नक़्श-ओ-निगार मेरी दीवार पे दावा सो ये दावा कैसा एक दीवार पे दीवार के रंगों पे कहाँ ख़त्म ये बात एक पिचकारी की हैं मार ये सब नक़्श-ओ-निगार जाओ जाने दो इसे और खुरच ले जाए नक़्श क्या है मिरे हाथों का तहर्रुक है बस रंग क्या हैं मिरे हाथों में दबी पिचकारी शहर क्या है मिरी आँखों में बसी दीवारें रंग मेरे हैं लकीरें हैं मिरी मेरे क़लम रंग दूँगा मैं ज़रा देर में ये शहर तमाम नक़्श कर दूँगा निगाहों पे ये रंगों का फ़ुसूँ और रौज़न नज़र आएँगी सभी दीवारें एक दीवार पे दा'वा सो ये दा'वा कैसा
Faisal Azeem
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पानी अच्छा ख़ासा गले तक आ पहुँचा था अच्छी ख़ासी डूब गई थी सारी बस्ती अच्छा ख़ासा इक सैलाब था पानी उतरा भीगे जिस्म पे चिपके कपड़ों और ख़ाशाक का मंज़र उभरा पानी क्या उतरा तन्हाई उभर आई है वो जो नहीं था वो भी जैसे सैल-ए-रवाँ के साथ गया हो गलियों में बे-जान बदन हैं या सन्नाटा तैर रहा है
Faisal Azeem
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माह-ए-कामिल हैरत की तस्वीर हो जैसे हद्द-ए-चाह-ए-नख़शब आलमगीर हो जैसे होली के रंगों का धोका चेहरों पर तहरीर हो जैसे भीगी रात में आब-ए-शर-अंगेज़ के मारे मस्त सितारे अपनी चालें चूक रहे हैं दहलीज़ों पर पिघली शमएँ नीले बादल के पर्दे में ओझल होते आँख के तारे ढूँड रही हैं आईनों से नालाँ नक़्श से आरी चेहरे जज़्बों के उक़्दों में उलझे मूर्तियों की माला जपते कान में हल्क़े डाले गेरवे बादल पहने नाच रहे हैं लाल तिलक में आँख उगाए शमएँ था में चोब उठाए यक-रंगी दस्तारें जुब्बे गुम्बद ओढ़े सदियों की दीवार पे रोते रक़्स-ए-वहशत का ज़हराब उंडेल रहे हैं ना-बीनाई के पैग़म्बर रंग रचाती मौत की बोली बोल रहे हैं चीख़ रहे हैं इन के पैराहन को देखो चेहरे देखो आँखें देखो देखो सब हाथों को देखो जिस पर रंग नज़र आ जाए जान से जाए लेकिन इन को कौन बताए सब के हाथ रंगे हैं सब के दामन तर हैं आँखें ख़ूनीं हैं चेहरों पर ख़ौफ़ लिखा है लेकिन बे-नूरी में सब तहरीरें आँखों से ओझल हैं राह-ए-अदम पर नक़्श क़दम के ढूँडने वाला सायों की बोहतात में सहमा दहशत की हर ताल पे रक़्साँ सोच रहा है वक़्त के पैरों को दलदल से कौन निकाले शब की ओट से जलता सूरज अपने सर पर कौन उठाए रंगों की बौछार में जाने किस चेहरे पर किस को रंग नज़र आ जाए देव का साया अगले पल किस को खा जाए क्या मा'लूम कि अपनी बारी कब आ जाए
Faisal Azeem
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