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"शर्तें" वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था अजीब शर्तों पे जल रहा है वो लम्हा करवट बदल रहा है वो कह रही है कि मुझ सेे मिलने की आरज़ू तुम जब इतनी ज़ियादा शदीद कर लो कि साँस लेने में मुश्किलें हों तो मुझ को आ कर गले लगाना और अपनी सारी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ छुड़ा ले जाना लिहाज़ा इक दिन मैं जैसे तैसे तमाम अपनी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ बचाने निकला छुड़ाने निकला तो भेद जाना किसे ख़बर थी कि मेरी साँसें जब एक मंज़िल पे जा रुकेंगी तो उस की शर्तें नकार देंगी वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था हलाक शर्तों को कर गया है किसी अँधेरे में मर गया है

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"द लास्ट गुडबाय" शाम की ख़ामोशी में इज़्तिराब भरने को शोर पैदा करने को उस की कॉल आई है कह रही है वो मुझ से ठीक ही हुआ है सब ख़ुश बहुत हूँ शादी से आख़िरी दफ़ा लेकिन मुझ को तुम से मिलना है सोचता हूँ मैं कह दूँ आख़िरी दफ़ा देखो मिल चुका हूँ मैं पहले और अब के मिल कर भी क्या कहोगी तुम आख़िर फिर वही गिले शिकवे क्या कमी थी रिश्ते में क्यों जुदा हुए थे हम बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसी हो ज़िंदगी बसर कर लो पर मैं हामी भरता हूँ मैं उसे ये कहता हूँ हाँ मैं मिलने आता हूँ इक उदास कैफ़े में इक उदास कैफ़े में आ मिले हैं हम फिर से सामने वो बैठी है चाय पी रहे हैं हम चाय पीते देख उस को था अजब सुकूँ पहले था अजब सुकूँ पहले जब वो हँस के कहती थी मुझ को मिल गए हो तुम मुझ को मिल गया है सब चाय पी रही है वो और मैं ख़यालों में घिर चुका हूँ वहशत से वहशतों से घिर कर मैं सोचने लगा हूँ ये खो दिया उसे मैं ने खो दिया है मैं ने सब अब न चाहने पर भी उस से पूछ बैठा हूँ क्यों जुदा हुए थे हम क्या कमी थी पहले जो पूरी कर चुकी हो तुम आज भी तो देखो ना मेरे सामने हो तुम और वो हँस के कहती है बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसे हो ज़िंदगी बसर कर लो

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'होप' कैसे तुझ को बतलाऊँ मैं जब भी तुझ सेे मिल कर लौटा कितने तीर चले हैं मुझ पर कितने सपने चाक हुए हैं कैसे मैं ने ख़ुद को समेटा कैसे तुझ सेे ज़ख़्म छुपाएँ लम्हा-लम्हा मौसम-मौसम इक वहशत थी तारी मुझ पर एक चुभन सी साथ थी हर दम लेकिन फिर भी तुझ सेे मिलने हँसते हँसते आ जाता हूँ

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'स्लीपिंग पिल एडिक्शन' काफ़ी देर से शब बेचारी टहल रही है इस कमरे में और मैं बोझल पलकें लेकर लेटे-लेटे कुछ घंटों से घूर रहा हूँ मेज़ पे रखे उस डब्बे को जिसमें मेरी नींद के ज़र्रे पड़े हुए थे कल तक तो मैं अपना हर इक शोरीदा दिन इक ज़र्रे की तह में रख कर पानी के इक घूँट के साथ निगल जाता था लेकिन आज ये बोझल आँखें जाग रही हैं नींद मिरे कमरे का रस्ता भूल चुकी है डब्बा खाली पड़ा हुआ है और मिरा इक शोरीदा दिन मुझ को ज़र्रा-ज़र्रा कर के निगल रहा है

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"बुत-तराश" तुम्हारे दिल ने हमेशा मुझ सेे शिकायतें की कि मेरे सीने में दिल नहीं है जो दूरियाँ जाँ-गुसिल नहीं हैं मैं चाहता हूँ कभी तुम अपनी शिकायतों के तमाम ख़ंजर मेरे बदन में शरीक कर के बड़े बड़े से सुराख कर दो और उन में देखो मुझे यक़ीं है तुम्हें वहाँ इक हया तक़ल्लुफ़ झिझक का मारा रिवाज-ओ-रस्म-ए-जहाँ का क़ैदी मिलेगा जो ख़ुद शदीद फ़ुर्क़त के पत्थरों पर तुम्हारी सूरत निखारता है तुम्हारे बुत को तराशता है

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"ख़्वाबों का सौदागर" सुनहरे मंज़र बड़े पहाड़ों से गिर के बे-मौत मर गए हैं जो चाँद है वो नदी के पानी में लम्हा लम्हा लरज़ रहा है जो चाँदनी थी घरों की छत पर बिखर गई है हमारे कमरे की लाइटें बंद हो गई हैं हर इक दरीचे ने अपनी बाहें समेट ली हैं शिकस्ता दीवार पर पुरानी उदास पेंटिंग लगी हुई है वो इस अँधेरे में मुझ पर अपने तमाम नुक़्तों को खोलती है मेरे सिरहाने अजीब काला सा एक साया कोई कहानी सुना रहा है गुज़िश्ता चेहरे गुज़िश्ता गलियाँ गुज़िश्ता पैकर दिखा रहा है मगर मैं फिर भी हर एक शय में से ध्यान का ज़र चुरा रहा हूँ कि मुझ को ख़्वाबों में आज फिर से हमारी वस्लत के क़ीमती पल ख़रीदने हैं

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