"द लास्ट गुडबाय" शाम की ख़ामोशी में इज़्तिराब भरने को शोर पैदा करने को उस की कॉल आई है कह रही है वो मुझ से ठीक ही हुआ है सब ख़ुश बहुत हूँ शादी से आख़िरी दफ़ा लेकिन मुझ को तुम से मिलना है सोचता हूँ मैं कह दूँ आख़िरी दफ़ा देखो मिल चुका हूँ मैं पहले और अब के मिल कर भी क्या कहोगी तुम आख़िर फिर वही गिले शिकवे क्या कमी थी रिश्ते में क्यों जुदा हुए थे हम बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसी हो ज़िंदगी बसर कर लो पर मैं हामी भरता हूँ मैं उसे ये कहता हूँ हाँ मैं मिलने आता हूँ इक उदास कैफ़े में इक उदास कैफ़े में आ मिले हैं हम फिर से सामने वो बैठी है चाय पी रहे हैं हम चाय पीते देख उस को था अजब सुकूँ पहले था अजब सुकूँ पहले जब वो हँस के कहती थी मुझ को मिल गए हो तुम मुझ को मिल गया है सब चाय पी रही है वो और मैं ख़यालों में घिर चुका हूँ वहशत से वहशतों से घिर कर मैं सोचने लगा हूँ ये खो दिया उसे मैं ने खो दिया है मैं ने सब अब न चाहने पर भी उस से पूछ बैठा हूँ क्यों जुदा हुए थे हम क्या कमी थी पहले जो पूरी कर चुकी हो तुम आज भी तो देखो ना मेरे सामने हो तुम और वो हँस के कहती है बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसे हो ज़िंदगी बसर कर लो
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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'होप' कैसे तुझ को बतलाऊँ मैं जब भी तुझ सेे मिल कर लौटा कितने तीर चले हैं मुझ पर कितने सपने चाक हुए हैं कैसे मैं ने ख़ुद को समेटा कैसे तुझ सेे ज़ख़्म छुपाएँ लम्हा-लम्हा मौसम-मौसम इक वहशत थी तारी मुझ पर एक चुभन सी साथ थी हर दम लेकिन फिर भी तुझ सेे मिलने हँसते हँसते आ जाता हूँ
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"शर्तें" वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था अजीब शर्तों पे जल रहा है वो लम्हा करवट बदल रहा है वो कह रही है कि मुझ सेे मिलने की आरज़ू तुम जब इतनी ज़ियादा शदीद कर लो कि साँस लेने में मुश्किलें हों तो मुझ को आ कर गले लगाना और अपनी सारी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ छुड़ा ले जाना लिहाज़ा इक दिन मैं जैसे तैसे तमाम अपनी उखड़ती साँसों की क़ैद परियाँ बचाने निकला छुड़ाने निकला तो भेद जाना किसे ख़बर थी कि मेरी साँसें जब एक मंज़िल पे जा रुकेंगी तो उस की शर्तें नकार देंगी वो एक लम्हा जो उस की मेरी अमीक़ क़ुर्बत की रौशनी था हमारी दोनों की ज़िन्दगी था हलाक शर्तों को कर गया है किसी अँधेरे में मर गया है
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"बुत-तराश" तुम्हारे दिल ने हमेशा मुझ सेे शिकायतें की कि मेरे सीने में दिल नहीं है जो दूरियाँ जाँ-गुसिल नहीं हैं मैं चाहता हूँ कभी तुम अपनी शिकायतों के तमाम ख़ंजर मेरे बदन में शरीक कर के बड़े बड़े से सुराख कर दो और उन में देखो मुझे यक़ीं है तुम्हें वहाँ इक हया तक़ल्लुफ़ झिझक का मारा रिवाज-ओ-रस्म-ए-जहाँ का क़ैदी मिलेगा जो ख़ुद शदीद फ़ुर्क़त के पत्थरों पर तुम्हारी सूरत निखारता है तुम्हारे बुत को तराशता है
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'स्लीपिंग पिल एडिक्शन' काफ़ी देर से शब बेचारी टहल रही है इस कमरे में और मैं बोझल पलकें लेकर लेटे-लेटे कुछ घंटों से घूर रहा हूँ मेज़ पे रखे उस डब्बे को जिसमें मेरी नींद के ज़र्रे पड़े हुए थे कल तक तो मैं अपना हर इक शोरीदा दिन इक ज़र्रे की तह में रख कर पानी के इक घूँट के साथ निगल जाता था लेकिन आज ये बोझल आँखें जाग रही हैं नींद मिरे कमरे का रस्ता भूल चुकी है डब्बा खाली पड़ा हुआ है और मिरा इक शोरीदा दिन मुझ को ज़र्रा-ज़र्रा कर के निगल रहा है
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"ख़्वाबों का सौदागर" सुनहरे मंज़र बड़े पहाड़ों से गिर के बे-मौत मर गए हैं जो चाँद है वो नदी के पानी में लम्हा लम्हा लरज़ रहा है जो चाँदनी थी घरों की छत पर बिखर गई है हमारे कमरे की लाइटें बंद हो गई हैं हर इक दरीचे ने अपनी बाहें समेट ली हैं शिकस्ता दीवार पर पुरानी उदास पेंटिंग लगी हुई है वो इस अँधेरे में मुझ पर अपने तमाम नुक़्तों को खोलती है मेरे सिरहाने अजीब काला सा एक साया कोई कहानी सुना रहा है गुज़िश्ता चेहरे गुज़िश्ता गलियाँ गुज़िश्ता पैकर दिखा रहा है मगर मैं फिर भी हर एक शय में से ध्यान का ज़र चुरा रहा हूँ कि मुझ को ख़्वाबों में आज फिर से हमारी वस्लत के क़ीमती पल ख़रीदने हैं
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