"ज़मीं-ए-हिंद" सारे जहाँ से अच्छी बस हिंद की ज़मीं है आबाद करने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस के ही लब पे पहले वहदत का गीत आया इसने ही सब सेे पहले पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया सारे जहाँ को इसने इल्म-ओ-हुनर सिखाया कोई भी गीत क़ौमी इसने न गुनगुनाया नंगे उघारे फिरते लोगों की आबरू को मिंदील देने वाली हर एक को ज़मीं है दुश्नाम दे रहा है हर शख़्स इस ज़मीं को तिरपाल जब दिया है इसने ही हर किसी को सारे जहाँ को इसने जीवन नया दिया है सहराओं तक में इसने हर गुल खिला दिया है निखरे हैं इस ज़मीं में रुख़सार हम-नशीं के गजरे में खिलने वाला गुलफ़ाम भी ज़मीं है हिंदू का है न इस पर मुर्ग-ए-हरम का एहसाँ अंधा हुआ पड़ा है क्यूँँ धर्म में फिर इंसाँ शामिल है ख़ून इस में हम सबके तन बदन का सदक़ा उठा रहे हैं सब इस के बाँकपन का सारा जहाँ पला है आँचल में इस ज़मीं के ताक़ों पे धरने वाली हर क़ौम को ज़मीं है ज़िंदा है इस के दम पर सारे जहाँ की रौनक़ सब आज़मा रहे हैं इस के ही दम पे क़िस्मत इसने नहीं सिखाया आपस में बैर करना इसने सिखाया सब को आपस में प्रेम करना हिंदू हों या हों मुस्लिम वंदे हैं सब इसी के आँचल में लेने वाली इक साथ सब ज़मीं है है इस ज़मीं पे सबका हक़ एक ही बराबर कोई नहीं है नीचे कोई नहीं है ऊपर दुख सुख में इस के हरदम सब लोग साथ होंगे मुस्लिम हों सिख हों हिंदू सब साथ साथ होंगे आएगी आँच इस पर हाथों में हाथ होंगे सब छाँव में इसी की पलकर बड़े हुए हैं दाना खिलाने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस पर जब आँच आए सब साथ चल के आना धर्मों को मज़-हबों को रस्ते में छोड़ आना क़ौमी लिबास सारे घूरे पे फेंक आना हाथों में हाथ डाले सब मुस्कुराते आना तुम मुश्किलों में इस को मत छोड़ कर के जाना तरसे हैं इस ज़मीं को मत पूछो कितने काफ़िर इक़बाल से मिली पर तुम को ही ये ज़मीं है इस हिंद की ज़मीं पर जो भी उठाए उँगली उस को अभी उठा ले ख़ालिक़ तू इस जहाँ से इस हिंद की ज़मीं पर जिस का जनम हुआ है आबाद रखना ख़ालिक़ मेरी यही दुआ है
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“अच्छा सोचेंगे” अच्छा अच्छा सोचोगे तो अच्छा अच्छा होगा सच में ऐसा होता है क्या सच में ऐसा होगा अच्छा सोचेंगे तो क्या अच्छे से दिन गुज़रेंगे नींद आएगी अच्छे से अच्छे मंज़र आएँगे होगा हाल-ए-दिल अच्छा फ़म अच्छा ही बोलेगा तन में होगा ज़ोर अच्छा गोश अच्छा सुन पाएगा नैन अच्छा ही देखेंगे साँस अच्छी ही आएगी हर आलम अच्छा होगा हर आफ़त टल जाएगी कहते हो ये सब होगा सारे दुख मिट जाएँगे अच्छा अच्छा सोचेंगे हम भी अच्छा सोचेंगे
Zaan Farzaan
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"मैं और मेरी दुनिया" एक ऐसी दुनिया जिस में सिर्फ़ मैं हूँ और सब कुछ मेरे इर्द-गिर्द बुना हुआ जहाँ ख़यालों का आसमाँ है और दिल की ज़मीं है ख़्वाबों के कुछ शजर हैं नीचे अश्कों की नमी है ख़ुशियों की हवा है जो हौले से मुझे छू कर मुस्कुराते हुए गुज़र जाती है ग़मो की बारिश भी है जो दिल की ज़मीं सोख लेती है और तन्हाइयों के मौसम में अक्सर उगने लगते है अहसास के नन्हे पौधे खिलने लगती है उन में अल्फ़ाज़ की नन्ही कलियाँ और फिर बिखर जाती हैं सफ़्हों की फ़िज़ा में कोई ग़ज़ल या नज़्म बनकर
Priya omar
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"हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं" बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती है यहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैं सारे ख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैं यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं कभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैं यहाँ पर शह भी पड़ती है यहाँ पर मात होती है कभी इक चाल टलती है कभी बाज़ी पलटती है यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं मगर मैं वो पियादा हूँ जो हर घर में कभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहले कभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहले हमेशा क़त्ल हो जाता है
Jaun Elia
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डिसबिलिटी एक फूल बगिया में मैं ने देखा है जिस में एक पंखुड़ी कम है बाक़ी सारे फूलों से पर उसे मुयस्सर है एक सा हवा पानी एक जैसे रंग-ओ-बू एक जैसा ही जादू तितलियाँ हों भँवरें हों या किसी की नज़रें हों उस में और औरों में फ़र्क़ ही नहीं करतीं हाँ मगर मिरे प्यारे ये चमन का क़िस्सा था आदमी की बस्ती में इस तरह नहीं होता फूल रोता रहता है फ़र्क़ होता रहता है
Ashu Mishra
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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है
Ammar Iqbal
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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है
Prashant Kumar
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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी
Prashant Kumar
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"सदा-ए-मुफ़लिस" मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब सेे मैं तन्हा रहा हूँ मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कोई ये न कहना कभी उन सेे जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ अगर हाल मेरा कोई तुम सेे पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ अब इस सेे ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ
Prashant Kumar
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"चाँद तकता है रातों को छत से तुझे" क्यूँँ है इतनी जवाँ क्यूँँ है इतनी हसीं नाम किस ने रखा तेरा ज़ोहरा-जबीं तंग सी टॉप पहने अब आना नहीं चाँद तकता है रातों को छत से तुझे राह में देखता है पलट के तुझे मुझ को डर है कहीं ले न जाए तुझे राह में देखता है पलट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे चाँद में दाग़ है फिर भी मग़रूर है लग रहा अपनी आदत से मजबूर है तू जिधर जा रहा चाँद उधर आ रहा ये तुझे देख कर कितना शर्मा रहा आड़ में देखता है सिमट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे ख़ूब-सूरत बहुत लग रही आज तू आज से बन गई मेरी मुमताज़ जब कैसी कारीगरी है ख़ुदा की क़सम ज़ुल्फ़ से पाँव तक ज़हर है तू सनम मैं तिरी जान हूँ तू मिरी जान है ख़्वाब में देखता हूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे अपनी सूरत दिखा दे ख़ुदा के लिए मुझ को दिल में बसा ले ख़ुदा के लिए अब तो घर से निकल आ ख़ुदा के लिए मुझ को अपना बना ले ख़ुदा के लिए उम्र भर के लिए बाहों में थाम ले ओ मिरी जान-ए-मन दिल से तू काम ले ऐसी बारिश में देखूँ रपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे माल ज़ेवर छिपे तेरी पोशाक में हैं फ़रिश्ते ख़ुदा सब तिरी ताक में जान ऐसे में घर से निकलना नहीं कोई ले जाएगा तुझ को अफ़्लाक में कुछ न कुछ बात तो तुझ में है जान-ए-मन यूँँ ही थोड़ी लुटाते हैं सब जान-ए-तन तेरी बाहों में देखूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे तू अकेले दुकेले न जाना कहीं तुझ को समझा रहा हूँ मिरी हम-नशीं मैं कहीं रह न पाऊँगा तेरे बिना तू मुझे छोड़ कर यार जाना नहीं तेरी आँखों से मौसम बदलने लगा तेरी ज़ुल्फ़ों में जादू सा चलने लगा तेरे काँधे से पल्लू सरकने लगा जिस ने देखा नज़ारा ये जलने लगा नींद में देखता हूँ उचट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे जाँ तिरे नाम की जोश ही जोश में ख़ुद को रक्खूँगा अब तेरी आग़ोश में आते जाते सभी छेड़ते हैं तुझे टकटकी बाँध के देखते हैं तुझे हाँ बहुत देर तक देखते हैं तुझे चाँद तारे तुझे ताड़ते हैं सभी फ़ालतू में ही मुँह फाड़ते हैं सभी सब सेे ले जाऊँगा मैं झपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे
Prashant Kumar
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“ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ” ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब में तुझ को बाल बनाते छत पर देखा करता हूँ तेरी गली के बच्चों में फिर मैं भी खेला करता हूँ छत पर आने की मैं तुझ सेे रोज़ गुज़ारिश करता हूँ हाल-ए-दिल भी काग़ज़ पर लिख लिख के फेंका करता हूँ आज भी तेरी गलियों में मैं रास रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ लट बिखराकर एक तरफ़ तू मुझ को देखा करती है आँख दिखाया करती है सब घर हैं बताया करती है जल्दी से फिर काग़ज़ तू घूँघट में छुपाया करती है मेरे लिए और ग़ुस्से में तू चाँट दिखाया करती है ग़ुस्सा अच्छा लगता है ग़ुस्सा दिलवाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब-नगर की राज-कुमारी दिल में मुझ को रहने दे इश्क़ का दरिया दिल के साथ निगाहों से भी बहने दे तेरा दिल जो भी कहता है रोक न उस को कहने दे तेरा ग़म मेरा भी ग़म है साथ में मिल के सहने दे ख़्वाबों ही ख़्वाबों में तेरा दिल धड़काने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ तेरी निगाहें सुर की देवी छेड़ दें पल में साज़ अभी ये चाहे तो बदल के रख दें शाइ'र का अंदाज़ अभी आँखों ही आँखों में छुपाए तू ने दिल के राज़ अभी इश्क़ मोहब्बत का जल्दी से कर दे तू आग़ाज़ अभी मैं भी इतनी दूर से तुझ पर जान लुटाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ बात तो सुन ख़ातून मिरी ये दिल है मेरा प्रेम-नगर मैं तो अभी आ जाऊँ रहने कह दे तू इक बार अगर तू हो मेरे साथ अगर तो चाँद पे भी कर लूँगा घर तेरे बिना लगता है अधूरा इश्क़ मोहब्बत का ये सफ़र इस दुनिया में मैं तुझ सेे ही ब्याह रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ
Prashant Kumar
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