nazmKuch Alfaaz

"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी

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“अच्छा सोचेंगे” अच्छा अच्छा सोचोगे तो अच्छा अच्छा होगा सच में ऐसा होता है क्या सच में ऐसा होगा अच्छा सोचेंगे तो क्या अच्छे से दिन गुज़रेंगे नींद आएगी अच्छे से अच्छे मंज़र आएँगे होगा हाल-ए-दिल अच्छा फ़म अच्छा ही बोलेगा तन में होगा ज़ोर अच्छा गोश अच्छा सुन पाएगा नैन अच्छा ही देखेंगे साँस अच्छी ही आएगी हर आलम अच्छा होगा हर आफ़त टल जाएगी कहते हो ये सब होगा सारे दुख मिट जाएँगे अच्छा अच्छा सोचेंगे हम भी अच्छा सोचेंगे

Zaan Farzaan

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"सरकारों को गाली देंगे" सरकारों को गाली देंगे आजू बाजू ताली देंगे पास खड़े हैं दोस्त हमारे सब लोगों को धक्का मारे जम कर खेली होली सबने जान सड़क पर तोली सबने इनका लॉजिक सब सेे बढ़िया और प्रशासन सब सेे घटिया दिन भर ज्ञान सभी को देंगे लेकिन मास्क नहीं पहनेंगे

Tanoj Dadhich

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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा

Naaz ishq

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"ख़ुद-कुशी" जब आँखों के सारे सपने पानी बन बह जाएँगे और बचे हुए ग़म को हम ज़रा भी न सह पाएँगे जर्जर हो कर जब किसी के सब्र का बाँध टूटेगा मेहनतकश बंदे का जब भी भाग्य उस से रूठेगा हाथों की लकीरें जब माथे की शिकन बन जाएँगी और भीड़ में तन्हाई जब मन को खाने आएगी जब घर का दीपक सूरज के आगे घुटने टेकेगा तूफ़ानों के आगे जब हिम्मत को मरते देखेगा तब सन्नाटों को चीर कर कुछ आवाज़ें आएँगी छत वाला पंखा बोलेगा पटरी पास बुलाएगी

Lalit Sachdeva

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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है

Akhtar Payami

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"सदा-ए-मुफ़लिस" मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब सेे मैं तन्हा रहा हूँ मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कोई ये न कहना कभी उन सेे जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ अगर हाल मेरा कोई तुम सेे पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ अब इस सेे ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

Prashant Kumar

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"चाँद तकता है रातों को छत से तुझे" क्यूँँ है इतनी जवाँ क्यूँँ है इतनी हसीं नाम किस ने रखा तेरा ज़ोहरा-जबीं तंग सी टॉप पहने अब आना नहीं चाँद तकता है रातों को छत से तुझे राह में देखता है पलट के तुझे मुझ को डर है कहीं ले न जाए तुझे राह में देखता है पलट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे चाँद में दाग़ है फिर भी मग़रूर है लग रहा अपनी आदत से मजबूर है तू जिधर जा रहा चाँद उधर आ रहा ये तुझे देख कर कितना शर्मा रहा आड़ में देखता है सिमट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे ख़ूब-सूरत बहुत लग रही आज तू आज से बन गई मेरी मुमताज़ जब कैसी कारीगरी है ख़ुदा की क़सम ज़ुल्फ़ से पाँव तक ज़हर है तू सनम मैं तिरी जान हूँ तू मिरी जान है ख़्वाब में देखता हूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे अपनी सूरत दिखा दे ख़ुदा के लिए मुझ को दिल में बसा ले ख़ुदा के लिए अब तो घर से निकल आ ख़ुदा के लिए मुझ को अपना बना ले ख़ुदा के लिए उम्र भर के लिए बाहों में थाम ले ओ मिरी जान-ए-मन दिल से तू काम ले ऐसी बारिश में देखूँ रपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे माल ज़ेवर छिपे तेरी पोशाक में हैं फ़रिश्ते ख़ुदा सब तिरी ताक में जान ऐसे में घर से निकलना नहीं कोई ले जाएगा तुझ को अफ़्लाक में कुछ न कुछ बात तो तुझ में है जान-ए-मन यूँँ ही थोड़ी लुटाते हैं सब जान-ए-तन तेरी बाहों में देखूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे तू अकेले दुकेले न जाना कहीं तुझ को समझा रहा हूँ मिरी हम-नशीं मैं कहीं रह न पाऊँगा तेरे बिना तू मुझे छोड़ कर यार जाना नहीं तेरी आँखों से मौसम बदलने लगा तेरी ज़ुल्फ़ों में जादू सा चलने लगा तेरे काँधे से पल्लू सरकने लगा जिस ने देखा नज़ारा ये जलने लगा नींद में देखता हूँ उचट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे जाँ तिरे नाम की जोश ही जोश में ख़ुद को रक्खूँगा अब तेरी आग़ोश में आते जाते सभी छेड़ते हैं तुझे टकटकी बाँध के देखते हैं तुझे हाँ बहुत देर तक देखते हैं तुझे चाँद तारे तुझे ताड़ते हैं सभी फ़ालतू में ही मुँह फाड़ते हैं सभी सब सेे ले जाऊँगा मैं झपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे

Prashant Kumar

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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है

Prashant Kumar

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"ज़मीं-ए-हिंद" सारे जहाँ से अच्छी बस हिंद की ज़मीं है आबाद करने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस के ही लब पे पहले वहदत का गीत आया इसने ही सब सेे पहले पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया सारे जहाँ को इसने इल्म-ओ-हुनर सिखाया कोई भी गीत क़ौमी इसने न गुनगुनाया नंगे उघारे फिरते लोगों की आबरू को मिंदील देने वाली हर एक को ज़मीं है दुश्नाम दे रहा है हर शख़्स इस ज़मीं को तिरपाल जब दिया है इसने ही हर किसी को सारे जहाँ को इसने जीवन नया दिया है सहराओं तक में इसने हर गुल खिला दिया है निखरे हैं इस ज़मीं में रुख़सार हम-नशीं के गजरे में खिलने वाला गुलफ़ाम भी ज़मीं है हिंदू का है न इस पर मुर्ग-ए-हरम का एहसाँ अंधा हुआ पड़ा है क्यूँँ धर्म में फिर इंसाँ शामिल है ख़ून इस में हम सबके तन बदन का सदक़ा उठा रहे हैं सब इस के बाँकपन का सारा जहाँ पला है आँचल में इस ज़मीं के ताक़ों पे धरने वाली हर क़ौम को ज़मीं है ज़िंदा है इस के दम पर सारे जहाँ की रौनक़ सब आज़मा रहे हैं इस के ही दम पे क़िस्मत इसने नहीं सिखाया आपस में बैर करना इसने सिखाया सब को आपस में प्रेम करना हिंदू हों या हों मुस्लिम वंदे हैं सब इसी के आँचल में लेने वाली इक साथ सब ज़मीं है है इस ज़मीं पे सबका हक़ एक ही बराबर कोई नहीं है नीचे कोई नहीं है ऊपर दुख सुख में इस के हरदम सब लोग साथ होंगे मुस्लिम हों सिख हों हिंदू सब साथ साथ होंगे आएगी आँच इस पर हाथों में हाथ होंगे सब छाँव में इसी की पलकर बड़े हुए हैं दाना खिलाने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस पर जब आँच आए सब साथ चल के आना धर्मों को मज़-हबों को रस्ते में छोड़ आना क़ौमी लिबास सारे घूरे पे फेंक आना हाथों में हाथ डाले सब मुस्कुराते आना तुम मुश्किलों में इस को मत छोड़ कर के जाना तरसे हैं इस ज़मीं को मत पूछो कितने काफ़िर इक़बाल से मिली पर तुम को ही ये ज़मीं है इस हिंद की ज़मीं पर जो भी उठाए उँगली उस को अभी उठा ले ख़ालिक़ तू इस जहाँ से इस हिंद की ज़मीं पर जिस का जनम हुआ है आबाद रखना ख़ालिक़ मेरी यही दुआ है

Prashant Kumar

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पहला प्यार पहली दफ़ा जब आँख मिली तो दिल में उठे तूफ़ान कई दिल ने दिल का हाल सुनाया जागे फिर अरमान कई उन का बदन नाज़ुक नाज़ुक था देख के हम शर्माए बहुत दोनों अंजाने थे लेकिन इक दूजे को भाए बहुत ख़ुद को बड़ी मुश्किल से सँभाला ऐसा लगा अब जान गई रुख़ से पल्लू जब सरकाया फिर तो हुए बेजान कई हँसते हुए लट बिखरा के वो सामने आ कर बैठ गए शर्म से हम ने उठना चाहा वो तो हम पर ऐंठ गए हाथ पकड़ के पास बिठाया प्यार की बातें करने लगे गाल भी चू में हाथ भी चू में और किए एहसान कई अगले दिन जब याद आई तो दिल जोरों से रोने लगा प्यार था पहला दिल था ज़िद्दी पीछे पीछे आ ही गया हम ने दिल को रोकना चाहा और इसे समझाया भी लेकिन इसने एक न मानी और किए नुक़सान कई

Prashant Kumar

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