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"सरकारों को गाली देंगे" सरकारों को गाली देंगे आजू बाजू ताली देंगे पास खड़े हैं दोस्त हमारे सब लोगों को धक्का मारे जम कर खेली होली सबने जान सड़क पर तोली सबने इनका लॉजिक सब सेे बढ़िया और प्रशासन सब सेे घटिया दिन भर ज्ञान सभी को देंगे लेकिन मास्क नहीं पहनेंगे

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गलियाँ और गलियों में गलियाँ छोटे घर नीचे दरवाज़े टाट के पर्दे मैली बद-रंगी दीवारें दीवारों से सर टकराती कोई गाली गलियों के सीने पर बहती गंदी नाली गलियों के माथे पर बहता आवाज़ों का गंदा नाला आवाज़ों की भीड़ बहुत है इंसानों की भीड़ बहुत है कड़वे और कसीले चेहरे बद-हाली के ज़हरस हैं ज़हरीले चेहरे बीमारी से पीले चेहरे मरते चेहरे हारे चेहरे बे-बस और बेचारे चेहरे सारे चेहरे एक पहाड़ी कचरे की और उस पर फिरते आवारा कुत्तों से बच्चे अपना बचपन ढूँड रहे हैं दिन ढलता है इस बस्ती में रहने वाले औरों की जन्नत को अपनी मेहनत दे कर अपने जहन्नम की जानिब अब थके हुए झुँझलाए हुए से लौट रहे हैं एक गली में ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं कच्ची दारू महक रही है आज सवेरे से बस्ती में क़त्ल-ओ-ख़ूँ का चाक़ू-ज़नी का कोई क़िस्सा नहीं हुआ है ख़ैर अभी तो शाम है पूरी रात पड़ी है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे इक दुखता फोड़ा है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे है इक जलता कढ़ाव यूँँ लगता है जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा टूटे-फूटे इंसाँ औने-पौने दामों बेच रहा है!

Javed Akhtar

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"याद" जब टूटे पत्तों सा हम शाखों से तब हँसते हँसते नम आँखों से आँसू के संग शब्द भी बहता गया जो कहना नहीं था कहता गया तब झूठ कहा था सब मैं ने कर देंगे हर फ़ोटो और नंबर डिलीट और नहीं करेंगे याद तुम्हें पर ये पागल अब भी करता बहुत याद तुम्हें

RAJAT KANAUJIYA RAJAT

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जा रही हूँ मैं कर रही हूँ तुम्हारा घर तुम्हारे हवाले ख़ाली हो जाएगी हर वो जगह जो मेरे अश्कों से भरी है अभी ले जाऊँगी हर अश्क अपने साथ समेट कर कुछ गमलों के फूल पे ओस से चमक रहे होंगे कुछ सज-धज के बैठे होंगे दहलीज़ पे ज़र्द थे जो कुछ जाने उड़ के कहाँ गिरे होंगे कुछ मिट्टी के अंदर बीज बन कर गिरे थे अब वो क्या बन के उगे होंगे मेरे होंटों से लिपटे थे जो अब भी टँगे होंगे वहाँ ताले बन कर कुछ तुम्हारे काँधे तक पहुँच पाने की जिद्द-ओ-जहद में जूझ रहे होंगे कुछ पूजा-घर के दिए के साथ जल रहे होंगे कुछ किताबों के धुले हुए शब्दों की सियाही से जा मिले होंगे कुछ धार बन कर मेरे कानों से गुज़रे होंगे पीछे से बालों में जा छुपे होंगे कुछ तकिए की नर्म रूई ने चूस लिए होंगे रसोई घर की भाप में तो कुछ बर्तनों में सड़े पड़े होंगे कुछ मा'सूम सह में हुए छुप के बैठे होंगे कुछ बे-फ़िक्र हक़ीक़त से टहल रहे होंगे कुछ बूढे अश्क नए जन्मों को आसरा दे रहे होंगे कुछ तुम्हारी ख़िदमत से थके ज़मीन पे सो रहे होंगे तपन से जन्में कुछ ढूँढ़ रहे होंगे ठंडक सी कुछ दीवार पे लगी हमारी तस्वीर तक रहे होंगे बाग़ी से कुछ तुम्हें छोड़ने की ज़िद पे अड़े होंगे कुछ तेरी एक नज़र की प्यास लिए नज़र-अंदाज़ खड़े होंगे कुछ ज़ेहन में होंगे मेरे जो बहना नहीं जानते कुछ है ऐसे जिन्हें ठहरना नहीं आता उन्हीं पिया है जिया है मैं ने क़िस्तों में मिले थे मुझे एक साथ कैसे ले जाऊँगी आँगन बह जाएगा तुम्हारा रास्ते भी ये बहा देंगे पर मेरे अपने है ये यक़ीन है मुझे मेरे आख़िरी मक़ाम तक पहुँचा देंगे

Darshika wasani

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तुम समझ लेना नहीं ज़्यादा कहूँगा तुम समझ लेना मैं ख़त आधा लिखूँगा तुम समझ लेना तुम्हारे बा'द मेरा हाल गर पूछो मैं अच्छा ही कहूँगा तुम समझ लेना तुम्हें जब प्यार के दिन फूल देंगे सब मैं जलता जो दिखूँगा तुम समझ लेना रहेंगे बज़्म में सब यार तू वाले मैं तुम को तुम कहूँगा तुम समझ लेना मेरी नज़्में तुम्हें मुश्किल लगे है जो ये आसाँ सी कहूँगा तुम समझ लेना दुआ दी पीर ने हो हर दुआ पूरी दुआ अब क्या करूँँगा तुम समझ लेना ये मेरा दिल मुझे धी में से कहता है जिसे तक के थमूँगा तुम समझ लेना सताते हैं बहुत ये ख़्वाब अब मुझ को न कुछ आगे कहूँगा तुम समझ लेना ज़बानी इश्क़ की बातें नहीं होगी रहूँगा बे-ज़बाँ मैं तुम समझ लेना

Dr Faisal siddiqui

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फिर इक जम्म-ए-ग़फ़ीर एक मैदान में आसमाँ की तरफ़ देर से तक रहा है! इमरा-उल-क़ैस की बेटियाँ शा'इरी की ज़बाँ फिर समझने लगीं लपलपाती ज़बानें ख़िताबत का जादू जगाने लगीं वो ख़ुदा-ज़ादियाँ मुस्कुराने लगीं और मेलों में फिर भीड़ बढ़ने लगी कोई मिम्बर से बोला कि ऐ मेरे प्यारो! तुम्हें अपने अगलों की 'उम्रें लगें बाज़ आओ सफ़र से कुछ आराम लो क़ाफ़िलों की मधुर घंटियाँ रेत के सिलसिले उस की देंगे गवाही तुम्हें हम ने पहले कहा था घरों में रहो तुम न माने तो उस की सज़ा पा चुके बाज़ आओ अभी वक़्त है बे-कराँ नीली नीली ख़ला फिर न मसहूर कर दे तुम्हें

Aashufta Changezi

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