nazmKuch Alfaaz

जा रही हूँ मैं कर रही हूँ तुम्हारा घर तुम्हारे हवाले ख़ाली हो जाएगी हर वो जगह जो मेरे अश्कों से भरी है अभी ले जाऊँगी हर अश्क अपने साथ समेट कर कुछ गमलों के फूल पे ओस से चमक रहे होंगे कुछ सज-धज के बैठे होंगे दहलीज़ पे ज़र्द थे जो कुछ जाने उड़ के कहाँ गिरे होंगे कुछ मिट्टी के अंदर बीज बन कर गिरे थे अब वो क्या बन के उगे होंगे मेरे होंटों से लिपटे थे जो अब भी टँगे होंगे वहाँ ताले बन कर कुछ तुम्हारे काँधे तक पहुँच पाने की जिद्द-ओ-जहद में जूझ रहे होंगे कुछ पूजा-घर के दिए के साथ जल रहे होंगे कुछ किताबों के धुले हुए शब्दों की सियाही से जा मिले होंगे कुछ धार बन कर मेरे कानों से गुज़रे होंगे पीछे से बालों में जा छुपे होंगे कुछ तकिए की नर्म रूई ने चूस लिए होंगे रसोई घर की भाप में तो कुछ बर्तनों में सड़े पड़े होंगे कुछ मा'सूम सह में हुए छुप के बैठे होंगे कुछ बे-फ़िक्र हक़ीक़त से टहल रहे होंगे कुछ बूढे अश्क नए जन्मों को आसरा दे रहे होंगे कुछ तुम्हारी ख़िदमत से थके ज़मीन पे सो रहे होंगे तपन से जन्में कुछ ढूँढ़ रहे होंगे ठंडक सी कुछ दीवार पे लगी हमारी तस्वीर तक रहे होंगे बाग़ी से कुछ तुम्हें छोड़ने की ज़िद पे अड़े होंगे कुछ तेरी एक नज़र की प्यास लिए नज़र-अंदाज़ खड़े होंगे कुछ ज़ेहन में होंगे मेरे जो बहना नहीं जानते कुछ है ऐसे जिन्हें ठहरना नहीं आता उन्हीं पिया है जिया है मैं ने क़िस्तों में मिले थे मुझे एक साथ कैसे ले जाऊँगी आँगन बह जाएगा तुम्हारा रास्ते भी ये बहा देंगे पर मेरे अपने है ये यक़ीन है मुझे मेरे आख़िरी मक़ाम तक पहुँचा देंगे

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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दर्द गर बेहद हुआ तो हौसले बढ़ जाएँगे तुम ज़ख़्म कुरेदोगे हम और निखर जाएँगे तेरी रंजिशों ने साँस दी बेचैनियों ने नींद हमें ख़ुश-नुमा माहौल और सुकून काट खाएँगे ख़ुद को गले लगा कर रोना भी है हसीन अपने आप से लड़ेंगे ख़ुद की गोद में सो जाएँगे ये ना समझना के ये रफ़्तार है तुम से तेरे साथ के बग़ैर भी हम दूर तलक जाएँगे

Darshika wasani

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उम्र और रास्ते कटते चले गए अभी अभी साँसें संभली थी न जाने कब हौसले भी सँभलते चले गए शुरुआती ये रास्ते सीधे-सरल साफ़ हुआ करते थे ऊँचाई पे बढ़ते ही पथरीले हुए काँटों से ग्रस्त हाँ कभी कोई झरना मिल जाता था पेड़ भी छाँव ले कर मेरी मदद को आते थे वो झरने वो छाँव मगर साथ न चल पाते थे वक़्त था जो साथ चला मेरे एक रोज़ वो भी चला गया तजरबे की पेटी दे कर अब उसे भी उठाए चलना है सँभाले रखना है साँसों की तरह हौसलों की तरह रास्ते में मिलेगा वो फिर से और माँगेगा मुझ से उस पेटी में से कुछ या दे जाएगा दो चार और भी उठाने को वक़्त मिलता गया मोड़ आते गए कुछ लोग भी बोझ कम होता फिर बढ़ भी जाता रास्तो में भटक भी जाता कहीं कहीं बोझ भारी हुआ था थकी आँखों का भी एक बोझ था बुढ़ापे की चोटी अब अभी मीलों दूर थी पर वहाँ शायद सुकून होगा कहीं पहुँच जाने की राहत होगी चाँद की ठंडक मेरे क़रीब होगी उस चोटी पे पहुँच कर थके हुए पैरों को किनारे रख दूँगा क्यूँँकि वहाँ से आगे अब कुछ न होगा चलने को आँख मूँदने की मुझे अब इजाज़त होगी

Darshika wasani

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तुम्हारी आँखें तुम वहीं तो बसते हो एक जिस्म को दुनिया ने तुम्हारा नाम दिया तुम्हें पाया तुम्हारी आँखों में है मैं ने उन दो पलकों ने छुआ है मुझे तुम्हारी उँगलियों के जादुई स्पर्श सी मेरे चेहरे की नर्म गुलाबी गलियों में खोई मेरी ज़ुल्फ़ों में उलझी हुई रेशम से तर-ब-तर ये आँखें कभी होंठ बन कर तुम्हारी साँसों की आहट को चुपके से मेरे कानों में रख जाती है तुम्हारे ज़ेहन में पनप रहे हर नाज़ुक जज़्बात की ख़ुशबू है तुम्हारी आँखें मेरे काँपते होंटों पे तुम्हारे होंटों के निशान है तुम्हारी आँखें वही तो है जो हथेलियाँ बन कर मज़बूती से मेरा हाथ था में हुए है अब तक तुम्हारे दिल सी धड़कती है तुम्हारी आँखें मेरे अश्कों का हर एक क़तरा उन की नमी में डूब कर एक हो जाता है रात के सन्नाटे में मज़बूत बाहें बन कर अपनी ठंडक में सुला देती है तुम्हारे क़दम बन कर साथ चली है जैसे तुम चलते उस ने लूटा नहीं लौटाया है मुझे अपने आप को इन आँखों में एक घर बसाया है मैं ने तुम्हारे जिस्म में जुड़ी है मगर मेरी है तुम्हारी आँखें

Darshika wasani

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चलो आज एक और कोशिश होगी फिर एक शाम डूब जाएगी शराब में ज़िंदगी के अँधेरे सर्द टुकड़े जाम में घुल कर होंठों के हवाले होंगे ज़बाँ पे थिरकती तिश्नगी धीरे धीरे हल्क़ तक फैल जाएगी ख़ामोशी का लिबास पहने कोने में क़ैद तन्हाई रिहा होगी और नस नस में दौड़ कर रक़्स करेगी मेरे लहू में बह रहे उस बे-क़ाबू शख़्स को सँभालने की मशक़्क़त होगी सुलगती रूह उस की यादों की भाप में तप कर सुर्ख़ लाल हो जाएगी आँखों से गर्म बुलबुले टपकने लगेंगे जाम-दर-जाम अंदरूनी उबाल पिघलता जाएगा जब आँखों के पैमाने बिल्कुल ख़ाली हो जाएँगे तब उस लाल बिस्तर पर मेरी नींदें तुम्हारे ख़्वाबों को आग़ोश में ले कर सो जाएगी

Darshika wasani

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कुछ दिनों से मैं जब भी आईने में अपनी हल्की सफ़ेद लटें देखती हूँ एक जाना-पहचाना रास्ता नज़र आता है जिस के एक किनारे तुम चल रहे हो दूसरे पे मैं चुप-चाप अजनबी बन कर तुम्हारा धुँदला सा चेहरा वो काली फ़्रेम वाले चश्में कानों के पास उगी हुई कुछ ऐसी ही सफ़ेद लकीरें मैं तुम्हें ग़ौर से देख नहीं पा रही बस चलते जा रही हूँ तुम्हारे साथ तुम से दूर ख़ामोशी से इस बार गुल-मोहर के पेड़ की तरफ़ नहीं एक ढलती हुई शाम की ओर डूबते हुए सूरज की तरफ़ वो सफ़ेद लकीरें अब फैल रही है हल्की सुनहरी रौशनी में चाँदी सी चमकती वो चमक मेरी उँगलियों में उतर आती है तुम से दूर हूँ फिर कैसे अंदरूनी थकान धीरे धीरे बढ़ रही है मैं पुकारना चाहती हूँ तुम्हें हाथ बढ़ा कर छूना शायद तुम भी मगर काफ़ी दूर आ चुके है हम और अचानक वो शाम गहरे अँधेरे कुएँ में डूबने लगती है एक भँवर मुझे कहीं खींच रही है मैं अब तुम्हें देख नहीं पा रही और तुम भी मुझे ढूँढ़ रहे होंगे तुम अब भी दूर हो या पास किस किनारे पे हो अब तुम कहीं ये रात तो नहीं वही रात जिस का तुम ज़िक्र किया करते थे वही रात जिस का दिन नहीं होता जहाँ हम मिल सकते है क्या यहीं मिलोगे तुम मुझे

Darshika wasani

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