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दर्द गर बेहद हुआ तो हौसले बढ़ जाएँगे तुम ज़ख़्म कुरेदोगे हम और निखर जाएँगे तेरी रंजिशों ने साँस दी बेचैनियों ने नींद हमें ख़ुश-नुमा माहौल और सुकून काट खाएँगे ख़ुद को गले लगा कर रोना भी है हसीन अपने आप से लड़ेंगे ख़ुद की गोद में सो जाएँगे ये ना समझना के ये रफ़्तार है तुम से तेरे साथ के बग़ैर भी हम दूर तलक जाएँगे

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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है

Akhtar Payami

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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया

ZafarAli Memon

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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है

ABhishek Parashar

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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जा रही हूँ मैं कर रही हूँ तुम्हारा घर तुम्हारे हवाले ख़ाली हो जाएगी हर वो जगह जो मेरे अश्कों से भरी है अभी ले जाऊँगी हर अश्क अपने साथ समेट कर कुछ गमलों के फूल पे ओस से चमक रहे होंगे कुछ सज-धज के बैठे होंगे दहलीज़ पे ज़र्द थे जो कुछ जाने उड़ के कहाँ गिरे होंगे कुछ मिट्टी के अंदर बीज बन कर गिरे थे अब वो क्या बन के उगे होंगे मेरे होंटों से लिपटे थे जो अब भी टँगे होंगे वहाँ ताले बन कर कुछ तुम्हारे काँधे तक पहुँच पाने की जिद्द-ओ-जहद में जूझ रहे होंगे कुछ पूजा-घर के दिए के साथ जल रहे होंगे कुछ किताबों के धुले हुए शब्दों की सियाही से जा मिले होंगे कुछ धार बन कर मेरे कानों से गुज़रे होंगे पीछे से बालों में जा छुपे होंगे कुछ तकिए की नर्म रूई ने चूस लिए होंगे रसोई घर की भाप में तो कुछ बर्तनों में सड़े पड़े होंगे कुछ मा'सूम सह में हुए छुप के बैठे होंगे कुछ बे-फ़िक्र हक़ीक़त से टहल रहे होंगे कुछ बूढे अश्क नए जन्मों को आसरा दे रहे होंगे कुछ तुम्हारी ख़िदमत से थके ज़मीन पे सो रहे होंगे तपन से जन्में कुछ ढूँढ़ रहे होंगे ठंडक सी कुछ दीवार पे लगी हमारी तस्वीर तक रहे होंगे बाग़ी से कुछ तुम्हें छोड़ने की ज़िद पे अड़े होंगे कुछ तेरी एक नज़र की प्यास लिए नज़र-अंदाज़ खड़े होंगे कुछ ज़ेहन में होंगे मेरे जो बहना नहीं जानते कुछ है ऐसे जिन्हें ठहरना नहीं आता उन्हीं पिया है जिया है मैं ने क़िस्तों में मिले थे मुझे एक साथ कैसे ले जाऊँगी आँगन बह जाएगा तुम्हारा रास्ते भी ये बहा देंगे पर मेरे अपने है ये यक़ीन है मुझे मेरे आख़िरी मक़ाम तक पहुँचा देंगे

Darshika wasani

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उम्र और रास्ते कटते चले गए अभी अभी साँसें संभली थी न जाने कब हौसले भी सँभलते चले गए शुरुआती ये रास्ते सीधे-सरल साफ़ हुआ करते थे ऊँचाई पे बढ़ते ही पथरीले हुए काँटों से ग्रस्त हाँ कभी कोई झरना मिल जाता था पेड़ भी छाँव ले कर मेरी मदद को आते थे वो झरने वो छाँव मगर साथ न चल पाते थे वक़्त था जो साथ चला मेरे एक रोज़ वो भी चला गया तजरबे की पेटी दे कर अब उसे भी उठाए चलना है सँभाले रखना है साँसों की तरह हौसलों की तरह रास्ते में मिलेगा वो फिर से और माँगेगा मुझ से उस पेटी में से कुछ या दे जाएगा दो चार और भी उठाने को वक़्त मिलता गया मोड़ आते गए कुछ लोग भी बोझ कम होता फिर बढ़ भी जाता रास्तो में भटक भी जाता कहीं कहीं बोझ भारी हुआ था थकी आँखों का भी एक बोझ था बुढ़ापे की चोटी अब अभी मीलों दूर थी पर वहाँ शायद सुकून होगा कहीं पहुँच जाने की राहत होगी चाँद की ठंडक मेरे क़रीब होगी उस चोटी पे पहुँच कर थके हुए पैरों को किनारे रख दूँगा क्यूँँकि वहाँ से आगे अब कुछ न होगा चलने को आँख मूँदने की मुझे अब इजाज़त होगी

Darshika wasani

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पूरा चाँद पूरा चाँद नहीं दिया तुम ने मुझे मेरी ये नादान शिकायत याद है तुम्हें छोटे से घर की टूटी हुई छत से चाँद को टुकड़ों में देखा करती थी तुम मुझे देखते रहते मैं छत में कुछ ढूँढा करती थी हाथ बढ़ा कर छू लूँ जी करता था तुम्हारे हाथ में पिरोई उँगलियाँ छूटा नहीं करती थी कितनी रातें इसी अरमान में गुज़री टॉर्च से निकलती रौशनी की तरह मेरे चेहरे पर बिखरी थोड़ी सी चाँदनी को अपनी उँगलियों से छू कर तुम कहते थे पूरा चाँद और तुम्हारी बाहोँ की ठंडक में वो अरमान गुम-शुदा होता गया रस्सी पे टँगी तुम्हारी सफ़ेद क़मीस देखे बिना नींद नहीं आती अब तुम्हारे प्यार के उजालों से बेहतर कोई और नूर होगा रात-भर का उम्र-भर का पूरे चाँद का वो अधूरा अरमान सो गया मेरे भीतर सुकून से अपना भरा पूरा आसमान ओढ़ कर

Darshika wasani

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तुम्हारी आँखें तुम वहीं तो बसते हो एक जिस्म को दुनिया ने तुम्हारा नाम दिया तुम्हें पाया तुम्हारी आँखों में है मैं ने उन दो पलकों ने छुआ है मुझे तुम्हारी उँगलियों के जादुई स्पर्श सी मेरे चेहरे की नर्म गुलाबी गलियों में खोई मेरी ज़ुल्फ़ों में उलझी हुई रेशम से तर-ब-तर ये आँखें कभी होंठ बन कर तुम्हारी साँसों की आहट को चुपके से मेरे कानों में रख जाती है तुम्हारे ज़ेहन में पनप रहे हर नाज़ुक जज़्बात की ख़ुशबू है तुम्हारी आँखें मेरे काँपते होंटों पे तुम्हारे होंटों के निशान है तुम्हारी आँखें वही तो है जो हथेलियाँ बन कर मज़बूती से मेरा हाथ था में हुए है अब तक तुम्हारे दिल सी धड़कती है तुम्हारी आँखें मेरे अश्कों का हर एक क़तरा उन की नमी में डूब कर एक हो जाता है रात के सन्नाटे में मज़बूत बाहें बन कर अपनी ठंडक में सुला देती है तुम्हारे क़दम बन कर साथ चली है जैसे तुम चलते उस ने लूटा नहीं लौटाया है मुझे अपने आप को इन आँखों में एक घर बसाया है मैं ने तुम्हारे जिस्म में जुड़ी है मगर मेरी है तुम्हारी आँखें

Darshika wasani

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कुछ दिनों से मैं जब भी आईने में अपनी हल्की सफ़ेद लटें देखती हूँ एक जाना-पहचाना रास्ता नज़र आता है जिस के एक किनारे तुम चल रहे हो दूसरे पे मैं चुप-चाप अजनबी बन कर तुम्हारा धुँदला सा चेहरा वो काली फ़्रेम वाले चश्में कानों के पास उगी हुई कुछ ऐसी ही सफ़ेद लकीरें मैं तुम्हें ग़ौर से देख नहीं पा रही बस चलते जा रही हूँ तुम्हारे साथ तुम से दूर ख़ामोशी से इस बार गुल-मोहर के पेड़ की तरफ़ नहीं एक ढलती हुई शाम की ओर डूबते हुए सूरज की तरफ़ वो सफ़ेद लकीरें अब फैल रही है हल्की सुनहरी रौशनी में चाँदी सी चमकती वो चमक मेरी उँगलियों में उतर आती है तुम से दूर हूँ फिर कैसे अंदरूनी थकान धीरे धीरे बढ़ रही है मैं पुकारना चाहती हूँ तुम्हें हाथ बढ़ा कर छूना शायद तुम भी मगर काफ़ी दूर आ चुके है हम और अचानक वो शाम गहरे अँधेरे कुएँ में डूबने लगती है एक भँवर मुझे कहीं खींच रही है मैं अब तुम्हें देख नहीं पा रही और तुम भी मुझे ढूँढ़ रहे होंगे तुम अब भी दूर हो या पास किस किनारे पे हो अब तुम कहीं ये रात तो नहीं वही रात जिस का तुम ज़िक्र किया करते थे वही रात जिस का दिन नहीं होता जहाँ हम मिल सकते है क्या यहीं मिलोगे तुम मुझे

Darshika wasani

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