उम्र और रास्ते कटते चले गए अभी अभी साँसें संभली थी न जाने कब हौसले भी सँभलते चले गए शुरुआती ये रास्ते सीधे-सरल साफ़ हुआ करते थे ऊँचाई पे बढ़ते ही पथरीले हुए काँटों से ग्रस्त हाँ कभी कोई झरना मिल जाता था पेड़ भी छाँव ले कर मेरी मदद को आते थे वो झरने वो छाँव मगर साथ न चल पाते थे वक़्त था जो साथ चला मेरे एक रोज़ वो भी चला गया तजरबे की पेटी दे कर अब उसे भी उठाए चलना है सँभाले रखना है साँसों की तरह हौसलों की तरह रास्ते में मिलेगा वो फिर से और माँगेगा मुझ से उस पेटी में से कुछ या दे जाएगा दो चार और भी उठाने को वक़्त मिलता गया मोड़ आते गए कुछ लोग भी बोझ कम होता फिर बढ़ भी जाता रास्तो में भटक भी जाता कहीं कहीं बोझ भारी हुआ था थकी आँखों का भी एक बोझ था बुढ़ापे की चोटी अब अभी मीलों दूर थी पर वहाँ शायद सुकून होगा कहीं पहुँच जाने की राहत होगी चाँद की ठंडक मेरे क़रीब होगी उस चोटी पे पहुँच कर थके हुए पैरों को किनारे रख दूँगा क्यूँँकि वहाँ से आगे अब कुछ न होगा चलने को आँख मूँदने की मुझे अब इजाज़त होगी
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"हौसला" हौसला रख रास्ते दिखने लगेंगे ये अँधेरे सुब्ह तक छटने लगेंगे क़ाफ़िले पर क़ाफ़िले गुज़रे यहाँ से देखना कुछ नक़्श-ए-पा आगे मिलेंगे लड़-खड़ाते हौसलों को फिर उठा कर सुब्ह होते ही सफ़र पर चल पड़ेंगे ठोकरों से कह दो के दम-ख़म लगा दें हम गिरेंगे फिर उठेंगे पर चलेंगे
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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हम दोनो घर चल देंगे हाथ पकड़ कर रख मेरा सर सीने पर रख मेरा यक़ीन तू कर, तू कहीं जाने वाला नहीं है वेंटिलेटर कम पड़ जाए तो क्या ? अपने हाथों को वेंटिलेटर, मैं बना दूँगा मैं तेरी सांसो की ख़ातिर सच में सनम मैं अपनी सांसे तक गिरवी रख दूँगा मैं रब से झगड़ा कर लूंगा पर कैसे भी मैं तुझ को जाने नहीं दूँगा तू घबरा मत सब कुछ ठीक हो जाएगा जैसे पहले था सब वैसा हो जाएगा तू रो मत इतनी सी तो बात है, और इतना कुछ तो हम ने साथ में झेला है और फिर इक दिन ये भी दुख चला जाएगा ऐसा समझो हम एक जंग में है ऐसा जानो हम जीतेंगे बस तू अपना हौसला मत जाने देना बाकी तो तू मुझ पर छोड़ दे सब कुछ मैं हूँ ना !! क्यूँ फिक्र तू करती है ? जैसे कट जाता है हर इक दिन वैसे ये दिन भी कट जाएगा ये अँधेरा धीरे-धीरे हट जाएगा फिर से सहर होगी हमनें कितना कुछ जीना है अभी तो अपना वेट भी करता होगा, घर अपना तेरी बातों में फिर से खोना है मुझे तेरे साथ अभी कितना हँसना है मुझे मैं ने तेरे हाथों का खाना फिर से खाना है तू टेंशन मत रख हम जल्दी ही घर चल देंगे तुझ को कुछ नहीं होगा बस कुछ दिन की बात है फिर हम दोनो घर चल देंगे
BR SUDHAKAR
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जा रही हूँ मैं कर रही हूँ तुम्हारा घर तुम्हारे हवाले ख़ाली हो जाएगी हर वो जगह जो मेरे अश्कों से भरी है अभी ले जाऊँगी हर अश्क अपने साथ समेट कर कुछ गमलों के फूल पे ओस से चमक रहे होंगे कुछ सज-धज के बैठे होंगे दहलीज़ पे ज़र्द थे जो कुछ जाने उड़ के कहाँ गिरे होंगे कुछ मिट्टी के अंदर बीज बन कर गिरे थे अब वो क्या बन के उगे होंगे मेरे होंटों से लिपटे थे जो अब भी टँगे होंगे वहाँ ताले बन कर कुछ तुम्हारे काँधे तक पहुँच पाने की जिद्द-ओ-जहद में जूझ रहे होंगे कुछ पूजा-घर के दिए के साथ जल रहे होंगे कुछ किताबों के धुले हुए शब्दों की सियाही से जा मिले होंगे कुछ धार बन कर मेरे कानों से गुज़रे होंगे पीछे से बालों में जा छुपे होंगे कुछ तकिए की नर्म रूई ने चूस लिए होंगे रसोई घर की भाप में तो कुछ बर्तनों में सड़े पड़े होंगे कुछ मा'सूम सह में हुए छुप के बैठे होंगे कुछ बे-फ़िक्र हक़ीक़त से टहल रहे होंगे कुछ बूढे अश्क नए जन्मों को आसरा दे रहे होंगे कुछ तुम्हारी ख़िदमत से थके ज़मीन पे सो रहे होंगे तपन से जन्में कुछ ढूँढ़ रहे होंगे ठंडक सी कुछ दीवार पे लगी हमारी तस्वीर तक रहे होंगे बाग़ी से कुछ तुम्हें छोड़ने की ज़िद पे अड़े होंगे कुछ तेरी एक नज़र की प्यास लिए नज़र-अंदाज़ खड़े होंगे कुछ ज़ेहन में होंगे मेरे जो बहना नहीं जानते कुछ है ऐसे जिन्हें ठहरना नहीं आता उन्हीं पिया है जिया है मैं ने क़िस्तों में मिले थे मुझे एक साथ कैसे ले जाऊँगी आँगन बह जाएगा तुम्हारा रास्ते भी ये बहा देंगे पर मेरे अपने है ये यक़ीन है मुझे मेरे आख़िरी मक़ाम तक पहुँचा देंगे
Darshika wasani
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दर्द गर बेहद हुआ तो हौसले बढ़ जाएँगे तुम ज़ख़्म कुरेदोगे हम और निखर जाएँगे तेरी रंजिशों ने साँस दी बेचैनियों ने नींद हमें ख़ुश-नुमा माहौल और सुकून काट खाएँगे ख़ुद को गले लगा कर रोना भी है हसीन अपने आप से लड़ेंगे ख़ुद की गोद में सो जाएँगे ये ना समझना के ये रफ़्तार है तुम से तेरे साथ के बग़ैर भी हम दूर तलक जाएँगे
Darshika wasani
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तुम्हारी आँखें तुम वहीं तो बसते हो एक जिस्म को दुनिया ने तुम्हारा नाम दिया तुम्हें पाया तुम्हारी आँखों में है मैं ने उन दो पलकों ने छुआ है मुझे तुम्हारी उँगलियों के जादुई स्पर्श सी मेरे चेहरे की नर्म गुलाबी गलियों में खोई मेरी ज़ुल्फ़ों में उलझी हुई रेशम से तर-ब-तर ये आँखें कभी होंठ बन कर तुम्हारी साँसों की आहट को चुपके से मेरे कानों में रख जाती है तुम्हारे ज़ेहन में पनप रहे हर नाज़ुक जज़्बात की ख़ुशबू है तुम्हारी आँखें मेरे काँपते होंटों पे तुम्हारे होंटों के निशान है तुम्हारी आँखें वही तो है जो हथेलियाँ बन कर मज़बूती से मेरा हाथ था में हुए है अब तक तुम्हारे दिल सी धड़कती है तुम्हारी आँखें मेरे अश्कों का हर एक क़तरा उन की नमी में डूब कर एक हो जाता है रात के सन्नाटे में मज़बूत बाहें बन कर अपनी ठंडक में सुला देती है तुम्हारे क़दम बन कर साथ चली है जैसे तुम चलते उस ने लूटा नहीं लौटाया है मुझे अपने आप को इन आँखों में एक घर बसाया है मैं ने तुम्हारे जिस्म में जुड़ी है मगर मेरी है तुम्हारी आँखें
Darshika wasani
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कुछ दिनों से मैं जब भी आईने में अपनी हल्की सफ़ेद लटें देखती हूँ एक जाना-पहचाना रास्ता नज़र आता है जिस के एक किनारे तुम चल रहे हो दूसरे पे मैं चुप-चाप अजनबी बन कर तुम्हारा धुँदला सा चेहरा वो काली फ़्रेम वाले चश्में कानों के पास उगी हुई कुछ ऐसी ही सफ़ेद लकीरें मैं तुम्हें ग़ौर से देख नहीं पा रही बस चलते जा रही हूँ तुम्हारे साथ तुम से दूर ख़ामोशी से इस बार गुल-मोहर के पेड़ की तरफ़ नहीं एक ढलती हुई शाम की ओर डूबते हुए सूरज की तरफ़ वो सफ़ेद लकीरें अब फैल रही है हल्की सुनहरी रौशनी में चाँदी सी चमकती वो चमक मेरी उँगलियों में उतर आती है तुम से दूर हूँ फिर कैसे अंदरूनी थकान धीरे धीरे बढ़ रही है मैं पुकारना चाहती हूँ तुम्हें हाथ बढ़ा कर छूना शायद तुम भी मगर काफ़ी दूर आ चुके है हम और अचानक वो शाम गहरे अँधेरे कुएँ में डूबने लगती है एक भँवर मुझे कहीं खींच रही है मैं अब तुम्हें देख नहीं पा रही और तुम भी मुझे ढूँढ़ रहे होंगे तुम अब भी दूर हो या पास किस किनारे पे हो अब तुम कहीं ये रात तो नहीं वही रात जिस का तुम ज़िक्र किया करते थे वही रात जिस का दिन नहीं होता जहाँ हम मिल सकते है क्या यहीं मिलोगे तुम मुझे
Darshika wasani
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पूरा चाँद पूरा चाँद नहीं दिया तुम ने मुझे मेरी ये नादान शिकायत याद है तुम्हें छोटे से घर की टूटी हुई छत से चाँद को टुकड़ों में देखा करती थी तुम मुझे देखते रहते मैं छत में कुछ ढूँढा करती थी हाथ बढ़ा कर छू लूँ जी करता था तुम्हारे हाथ में पिरोई उँगलियाँ छूटा नहीं करती थी कितनी रातें इसी अरमान में गुज़री टॉर्च से निकलती रौशनी की तरह मेरे चेहरे पर बिखरी थोड़ी सी चाँदनी को अपनी उँगलियों से छू कर तुम कहते थे पूरा चाँद और तुम्हारी बाहोँ की ठंडक में वो अरमान गुम-शुदा होता गया रस्सी पे टँगी तुम्हारी सफ़ेद क़मीस देखे बिना नींद नहीं आती अब तुम्हारे प्यार के उजालों से बेहतर कोई और नूर होगा रात-भर का उम्र-भर का पूरे चाँद का वो अधूरा अरमान सो गया मेरे भीतर सुकून से अपना भरा पूरा आसमान ओढ़ कर
Darshika wasani
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