चलो आज एक और कोशिश होगी फिर एक शाम डूब जाएगी शराब में ज़िंदगी के अँधेरे सर्द टुकड़े जाम में घुल कर होंठों के हवाले होंगे ज़बाँ पे थिरकती तिश्नगी धीरे धीरे हल्क़ तक फैल जाएगी ख़ामोशी का लिबास पहने कोने में क़ैद तन्हाई रिहा होगी और नस नस में दौड़ कर रक़्स करेगी मेरे लहू में बह रहे उस बे-क़ाबू शख़्स को सँभालने की मशक़्क़त होगी सुलगती रूह उस की यादों की भाप में तप कर सुर्ख़ लाल हो जाएगी आँखों से गर्म बुलबुले टपकने लगेंगे जाम-दर-जाम अंदरूनी उबाल पिघलता जाएगा जब आँखों के पैमाने बिल्कुल ख़ाली हो जाएँगे तब उस लाल बिस्तर पर मेरी नींदें तुम्हारे ख़्वाबों को आग़ोश में ले कर सो जाएगी
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
14 likes
"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं
Arpit Sharma
13 likes
"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
47 likes
More from Darshika wasani
दर्द गर बेहद हुआ तो हौसले बढ़ जाएँगे तुम ज़ख़्म कुरेदोगे हम और निखर जाएँगे तेरी रंजिशों ने साँस दी बेचैनियों ने नींद हमें ख़ुश-नुमा माहौल और सुकून काट खाएँगे ख़ुद को गले लगा कर रोना भी है हसीन अपने आप से लड़ेंगे ख़ुद की गोद में सो जाएँगे ये ना समझना के ये रफ़्तार है तुम से तेरे साथ के बग़ैर भी हम दूर तलक जाएँगे
Darshika wasani
0 likes
जा रही हूँ मैं कर रही हूँ तुम्हारा घर तुम्हारे हवाले ख़ाली हो जाएगी हर वो जगह जो मेरे अश्कों से भरी है अभी ले जाऊँगी हर अश्क अपने साथ समेट कर कुछ गमलों के फूल पे ओस से चमक रहे होंगे कुछ सज-धज के बैठे होंगे दहलीज़ पे ज़र्द थे जो कुछ जाने उड़ के कहाँ गिरे होंगे कुछ मिट्टी के अंदर बीज बन कर गिरे थे अब वो क्या बन के उगे होंगे मेरे होंटों से लिपटे थे जो अब भी टँगे होंगे वहाँ ताले बन कर कुछ तुम्हारे काँधे तक पहुँच पाने की जिद्द-ओ-जहद में जूझ रहे होंगे कुछ पूजा-घर के दिए के साथ जल रहे होंगे कुछ किताबों के धुले हुए शब्दों की सियाही से जा मिले होंगे कुछ धार बन कर मेरे कानों से गुज़रे होंगे पीछे से बालों में जा छुपे होंगे कुछ तकिए की नर्म रूई ने चूस लिए होंगे रसोई घर की भाप में तो कुछ बर्तनों में सड़े पड़े होंगे कुछ मा'सूम सह में हुए छुप के बैठे होंगे कुछ बे-फ़िक्र हक़ीक़त से टहल रहे होंगे कुछ बूढे अश्क नए जन्मों को आसरा दे रहे होंगे कुछ तुम्हारी ख़िदमत से थके ज़मीन पे सो रहे होंगे तपन से जन्में कुछ ढूँढ़ रहे होंगे ठंडक सी कुछ दीवार पे लगी हमारी तस्वीर तक रहे होंगे बाग़ी से कुछ तुम्हें छोड़ने की ज़िद पे अड़े होंगे कुछ तेरी एक नज़र की प्यास लिए नज़र-अंदाज़ खड़े होंगे कुछ ज़ेहन में होंगे मेरे जो बहना नहीं जानते कुछ है ऐसे जिन्हें ठहरना नहीं आता उन्हीं पिया है जिया है मैं ने क़िस्तों में मिले थे मुझे एक साथ कैसे ले जाऊँगी आँगन बह जाएगा तुम्हारा रास्ते भी ये बहा देंगे पर मेरे अपने है ये यक़ीन है मुझे मेरे आख़िरी मक़ाम तक पहुँचा देंगे
Darshika wasani
0 likes
उम्र और रास्ते कटते चले गए अभी अभी साँसें संभली थी न जाने कब हौसले भी सँभलते चले गए शुरुआती ये रास्ते सीधे-सरल साफ़ हुआ करते थे ऊँचाई पे बढ़ते ही पथरीले हुए काँटों से ग्रस्त हाँ कभी कोई झरना मिल जाता था पेड़ भी छाँव ले कर मेरी मदद को आते थे वो झरने वो छाँव मगर साथ न चल पाते थे वक़्त था जो साथ चला मेरे एक रोज़ वो भी चला गया तजरबे की पेटी दे कर अब उसे भी उठाए चलना है सँभाले रखना है साँसों की तरह हौसलों की तरह रास्ते में मिलेगा वो फिर से और माँगेगा मुझ से उस पेटी में से कुछ या दे जाएगा दो चार और भी उठाने को वक़्त मिलता गया मोड़ आते गए कुछ लोग भी बोझ कम होता फिर बढ़ भी जाता रास्तो में भटक भी जाता कहीं कहीं बोझ भारी हुआ था थकी आँखों का भी एक बोझ था बुढ़ापे की चोटी अब अभी मीलों दूर थी पर वहाँ शायद सुकून होगा कहीं पहुँच जाने की राहत होगी चाँद की ठंडक मेरे क़रीब होगी उस चोटी पे पहुँच कर थके हुए पैरों को किनारे रख दूँगा क्यूँँकि वहाँ से आगे अब कुछ न होगा चलने को आँख मूँदने की मुझे अब इजाज़त होगी
Darshika wasani
0 likes
तुम्हारी आँखें तुम वहीं तो बसते हो एक जिस्म को दुनिया ने तुम्हारा नाम दिया तुम्हें पाया तुम्हारी आँखों में है मैं ने उन दो पलकों ने छुआ है मुझे तुम्हारी उँगलियों के जादुई स्पर्श सी मेरे चेहरे की नर्म गुलाबी गलियों में खोई मेरी ज़ुल्फ़ों में उलझी हुई रेशम से तर-ब-तर ये आँखें कभी होंठ बन कर तुम्हारी साँसों की आहट को चुपके से मेरे कानों में रख जाती है तुम्हारे ज़ेहन में पनप रहे हर नाज़ुक जज़्बात की ख़ुशबू है तुम्हारी आँखें मेरे काँपते होंटों पे तुम्हारे होंटों के निशान है तुम्हारी आँखें वही तो है जो हथेलियाँ बन कर मज़बूती से मेरा हाथ था में हुए है अब तक तुम्हारे दिल सी धड़कती है तुम्हारी आँखें मेरे अश्कों का हर एक क़तरा उन की नमी में डूब कर एक हो जाता है रात के सन्नाटे में मज़बूत बाहें बन कर अपनी ठंडक में सुला देती है तुम्हारे क़दम बन कर साथ चली है जैसे तुम चलते उस ने लूटा नहीं लौटाया है मुझे अपने आप को इन आँखों में एक घर बसाया है मैं ने तुम्हारे जिस्म में जुड़ी है मगर मेरी है तुम्हारी आँखें
Darshika wasani
0 likes
कुछ दिनों से मैं जब भी आईने में अपनी हल्की सफ़ेद लटें देखती हूँ एक जाना-पहचाना रास्ता नज़र आता है जिस के एक किनारे तुम चल रहे हो दूसरे पे मैं चुप-चाप अजनबी बन कर तुम्हारा धुँदला सा चेहरा वो काली फ़्रेम वाले चश्में कानों के पास उगी हुई कुछ ऐसी ही सफ़ेद लकीरें मैं तुम्हें ग़ौर से देख नहीं पा रही बस चलते जा रही हूँ तुम्हारे साथ तुम से दूर ख़ामोशी से इस बार गुल-मोहर के पेड़ की तरफ़ नहीं एक ढलती हुई शाम की ओर डूबते हुए सूरज की तरफ़ वो सफ़ेद लकीरें अब फैल रही है हल्की सुनहरी रौशनी में चाँदी सी चमकती वो चमक मेरी उँगलियों में उतर आती है तुम से दूर हूँ फिर कैसे अंदरूनी थकान धीरे धीरे बढ़ रही है मैं पुकारना चाहती हूँ तुम्हें हाथ बढ़ा कर छूना शायद तुम भी मगर काफ़ी दूर आ चुके है हम और अचानक वो शाम गहरे अँधेरे कुएँ में डूबने लगती है एक भँवर मुझे कहीं खींच रही है मैं अब तुम्हें देख नहीं पा रही और तुम भी मुझे ढूँढ़ रहे होंगे तुम अब भी दूर हो या पास किस किनारे पे हो अब तुम कहीं ये रात तो नहीं वही रात जिस का तुम ज़िक्र किया करते थे वही रात जिस का दिन नहीं होता जहाँ हम मिल सकते है क्या यहीं मिलोगे तुम मुझे
Darshika wasani
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Darshika wasani.
Similar Moods
More moods that pair well with Darshika wasani's nazm.







